मुख्य परीक्षा
भारत में LPG सब्सिडी पहलें
स्रोत: बिज़नेस स्टैंडर्ड
चर्चा में क्यों?
प्रत्यक्ष हस्तांतरित लाभ (PAHAL) जिसे प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) योजना के रूप में भी विनिर्दिष्ट किया जाता है और 'गिव इट अप' अभियान को देशव्यापी स्तर पर कार्यान्वित हुए एक दशक पूरा हो गया है।
- इसके साथ ही, सरकार ने विशेष रूप से आर्थिक रूप से कमज़ोर परिवारों के लिये द्रवित पेट्रोलियम गैस (LPG) कवरेज का विस्तार करने के लिये वर्ष 2016 में प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना (PMUY) का भी शुभारंभ किया।
PAHAL DBT योजना क्या है?
- परिचय: वर्ष 2015 में समग्र देश में शुरू की गई PAHAL DBT योजना, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय द्वारा उपभोक्ताओं के बैंक खातों में LPG सब्सिडी का प्रत्यक्ष अंतरण सुनिश्चित करने के लिये एक पहल है।
- इस योजना का उद्देश्य लीकेज को खत्म करना, डुप्लिकेट कनेक्शनों की रोकथाम करना और सब्सिडी वितरण में पारदर्शिता बढ़ाना है।
- कार्यप्रणाली: LPG सिलेंडर का विक्रय बाज़ार मूल्य पर किया जाता है, और सब्सिडी राशि प्रत्यक्ष रूप से उपभोक्ताओं के बैंक खातों में अंतरित की जाती है।
- उपभोक्ताओं को सब्सिडी दो तरीकों से प्राप्त होती है- आधार अंतरण अनुरूप मोड और बैंक अंतरण अनुरूप मोड (आधार लिंकेज के बिना पंजीकृत बैंक खाते में जमा की जाने वाली सब्सिडी)।
- उद्देश्य: वास्तविक उपभोक्ताओं को लाभ प्रदान करने हेतु बिचौलियों और फर्जी LPG कनेक्शनों को समाप्त करना।
- लाभार्थियों को बैंक खाते खोलने के लिये प्रोत्साहित करना तथा उन्हें औपचारिक वित्तीय प्रणाली में एकीकृत करना।
- उपलब्धियाँ: वर्ष 2024 तक 30.19 करोड़ से अधिक LPG उपभोक्ता PAHAL योजना के तहत नामांकित थे। इस योजना से सब्सिडी के अपव्यय को कम करके और अयोग्य उपभोक्ताओं को हटाकर सरकार को 1.5 लाख करोड़ रुपए से अधिक बचत हुई है।
- आधार-आधारित प्रमाणीकरण से प्रणाली से डुप्लिकेट लाभार्थियों और फर्जी या धोखाधड़ी वाले LPG कनेक्शनों को हटाने में मदद मिली।
गिव इट अप अभियान क्या है?
- परिचय: गिव इट अप अभियान की शुरुआत वर्ष 2015 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा 'ऊर्जा संगम' वैश्विक ऊर्जा शिखर सम्मेलन में की गई थी।
- इसके माध्यम से संपन्न LPG उपभोक्ताओं को स्वेच्छा से अपनी सब्सिडी छोड़ने के लिये प्रोत्साहित किया गया, जिससे सरकार को निर्धन वर्गों के लिये धनराशि पुनर्निर्देशित करने में सहायता मिली।
- प्रभाव: अभियान के तहत पहले वर्ष में 10 मिलियन व्यक्तियों ने सब्सिडी नहीं ली, लेकिन वर्ष 2025 तक यह संख्या धीमी होकर 11.5 मिलियन हो गई है।
प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना क्या है?
- परिचय: इसका उद्देश्य आर्थिक रूप से कमज़ोर परिवारों की वयस्क महिलाओं को जमा-मुक्त LPG कनेक्शन प्रदान करना है।
- यह योजना स्वच्छ खाना पकाने वाले ईंधन को बढ़ावा देती है, घरेलू प्रदूषण से होने वाले स्वास्थ्य जोखिमों को कम करती है, तथा पारंपरिक ईंधन पर निर्भरता कम करती है।
- लाभार्थियों को 14.2 किलोग्राम कनेक्शन के लिये 2,200 रुपए और 5 किलोग्राम कनेक्शन के लिये 1,300 रुपए (वित्त वर्ष 2023-24 से) मिलते हैं।
- इसके अतिरिक्त, गैस स्टोव खरीदने के लिये ब्याज मुक्त ऋण उपलब्ध है, जिससे व्यापक पहुँच सुनिश्चित होती है।
- कार्यान्वयन और विस्तार:
- चरण 1 (वर्ष 2016-2019): 80 मिलियन LPG कनेक्शन का प्रारंभिक लक्ष्य, सितंबर 2019 तक हासिल किया गया।
- चरण 2 - उज्ज्वला 2.0 (वर्ष 2021-2022) : दिसंबर 2022 तक अतिरिक्त 16 मिलियन कनेक्शन प्रदान किये जाएंगे ।
- चरण 3 (वर्ष 2023-2026): सरकार ने 7.5 मिलियन और कनेक्शनों को मंजूरी दी, जुलाई 2024 तक लक्ष्य पूरा ।
- जनवरी 2025 तक, संपूर्ण भारत में कुल 103.3 मिलियन PMUY कनेक्शन जारी किये जा चुके हैं।
व्यापक पहुँच के बावजूद LPG का उपयोग अभी भी सीमित क्यों है?
- रिफिल की उच्च आवर्ती लागत: जमा-मुक्त कनेक्शन के बावजूद, LPG सिलेंडर को रिफिल करने की लागत (लगभग 1,100 रुपए प्रति सिलेंडर) कई BPL परिवारों के लिये अत्यधिक है।
- पेट्रोलियम नियोजन एवं विश्लेषण प्रकोष्ठ (PPAC, 2016) के अनुसार, 83% उत्तरदाताओं ने उच्च रिफिल लागत को एक प्रमुख बाधा बताया।
- यद्यपि PMUY कनेक्शन निःशुल्क हैं, फिर भी 86% परिवार स्टोव, होज़ (Hoses) और रेगुलेटर की लागत से जूझ रहे हैं।
- हालाँकि सरकार रिफिल सब्सिडी प्रदान करती है, फिर भी गरीब परिवारों पर नियमित LPG कनेक्शन बनाए रखने के लिये भारी लागत का बोझ रहता है।
- लाभार्थियों के बीच कम रिफिल दरें PMUY परिवार औसतन 3.95 बार/वर्ष (वर्ष 2023-24) रिफिल करते हैं, जबकि गैर-PMUY उपयोगकर्त्ताओं के लिये यह दर 6.5 बार/वर्ष है।
- अधिकतम अनुमत सीमा 12 सब्सिडीयुक्त सिलेंडर प्रति वर्ष है, जो कि अल्प उपयोग को दर्शाता है।
- पारंपरिक ईंधन की उपलब्धता: जलाऊ लकड़ी, गोबर और फसल अवशेष आसानी से उपलब्ध हैं या कम लागत पर उपलब्ध हैं, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में इन्हें पसंदीदा विकल्प माना जाता है।
- रीति-रिवाज और पाक-पद्धति के कारण, कुछ क्षेत्रों में चूल्हे (पारंपरिक स्टोव) पर खाना पकाना प्रचलित है।
और पढ़ें: प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना (PMUY)
दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न: PMUY के माध्यम से LPG की व्यापक पहुँच के बावजूद, कई परिवार पारंपरिक ईंधन पर निर्भर क्यों हैं? |
मेन्स:प्रश्न. "वहनीय (ऐफोर्डेबल), विश्वसनीय, धारणीय तथा आधुनिक ऊर्जा तक पहुँच संधारणीय (सस्टेनबल) विकास लक्ष्यों (SDG) को प्राप्त करने के लिये अनिवार्य है”। भारत में इस संबंध में हुई प्रगति पर टिप्पणी कीजिये। (2018) |


भारतीय राजव्यवस्था
न्यायिक नियुक्तियों में सुधार की आवश्यकता
प्रिलिम्स के लिये:राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC), अखिल भारतीय न्यायिक सेवा (AIJS), 99वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2014, NJAC अधिनियम, 2014, आधारभूत संरचना, ज़िला न्यायाधीश, संसदीय स्थायी समिति, सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालय मुख्य परीक्षा के लिये:कॉलेजियम प्रणाली और उससे संबंधित मुद्दे, NJAC और AIJS की आवश्यकता |
स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस
चर्चा में क्यों?
दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के आवास पर नकदी मिलने से साथ न्यायिक नियुक्तियाँ पुनः चर्चा का विषय बन गया है और कॉलेजियम प्रणाली पर सवाल किये जा रहे हैं।
- इससे राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) और अखिल भारतीय न्यायिक सेवा (AIJS) पर पुनः ध्यान केंद्रित किये जाने की आवश्यकता उजागर हुई है।
भारत में न्यायिक नियुक्तियाँ किस प्रकार की जाती हैं?
- सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति: सर्वोच्च न्यायालय (SC) के न्यायाधीश की नियुक्ति संविधान के अनुच्छेद 124 (2) के तहत राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
- राष्ट्रपति सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के आवश्यक न्यायाधीशों से परामर्श करने के उपरांत भारत के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति करते हैं, जबकि अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति मुख्य न्यायाधीश और संबंधित न्यायाधीशों के परामर्श से की जाती है।
- उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति: उच्च न्यायालय (HC) के न्यायाधीश की नियुक्ति संविधान के अनुच्छेद 217 के तहत राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
- मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति भारत के मुख्य न्यायाधीश और संबंधित राज्य के राज्यपाल के परामर्श के बाद राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
- अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिये संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से भी परामर्श किया जाता है।
- दो या अधिक राज्यों के लिये एक ही उच्च न्यायालय होने की स्थिति में राष्ट्रपति सभी संबंधित राज्यों के राज्यपालों से परामर्श करता है।
- कॉलेजियम प्रणाली: यह न्यायाधीशों (सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय) की नियुक्ति और स्थानांतरण की प्रणाली है जो संसद के किसी अधिनियम या संविधान के प्रावधान द्वारा स्थापित न होकर सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों के माध्यम से विकसित हुई है।
न्यायाधीशों की नियुक्ति की वर्तमान प्रणाली से संबंधित चुनौतियाँ क्या हैं?
- कार्यपालिका की कोई भागीदारी नहीं: न्यायिक नियुक्तियाँ केवल न्यायाधीशों द्वारा की जाती हैं, जिसमें कार्यपालिका की कोई भूमिका नहीं होती और कोई निगरानी नहीं होती, जिससे गोपनीयता संबंधी और योग्य उम्मीदवारों के वंचित रहने का खतरा रहता है।
- योग्यता आधारित चयन का अभाव: न्यायाधीशों के पद के लिये उम्मीदवारों के मूल्यांकन हेतु कोई निश्चित मानदंड न होने से पक्षपात और स्वजन पक्षपात को बढ़ावा मिलता है तथा यह अंकल जज सिंड्रोम में परिणत होता है।
- अंकल जज सिंड्रोम न्यायिक नियुक्तियों में स्वजन पक्षपात को संदर्भित करता है। यह पक्षपात और पारदर्शिता के अभाव को उजागर करता है जो न्यायपालिका में जनता के विश्वास को कमज़ोर करता है।
- नियंत्रण और संतुलन पर प्रभाव: कॉलेजियम प्रणाली से शक्ति का संकेंद्रण न्यायपालिका में होता है, जिससे नियंत्रण और संतुलन बाधित होता है और दुरुपयोग और निगरानी की कमी का जोखिम बढ़ जाता है ।
- अपारदर्शी निर्णय-प्रक्रिया: कॉलेजियम प्रणाली बिना किसी आधिकारिक सचिवालय के संचालित होती है, जिससे यह एक गुप्त अथवा अपारदर्शी प्रक्रिया बन जाती है।
- इसके अंतर्गत निर्णय सार्वजनिक जाँच के बिना लिये जाते हैं, तथा कोई भी आधिकारिक रिकॉर्ड या विवरण सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं होता।
- नियुक्तियों में विविधता का अभाव: उच्च न्यायपालिका में विशेष रूप से महिलाओं और उपांतिकीकृत समुदायों के पर्याप्त प्रतिनिधित्व का अभाव है।
- वर्तमान में, सर्वोच्च न्यायालय में दो महिला न्यायाधीश हैं, और अगस्त 2024 तक, उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों में महिलाओं का प्रतिशत केवल 14% था।
- नियुक्तियों में विलंब: कॉलेजियम प्रणाली में कोई निश्चित समय-सीमा निर्दिष्ट नहीं की गई है, जिसके कारण राष्ट्रपति द्वारा स्पष्टीकरण या पुनर्विचार अनुरोध के कारण विलंब होता है।
- वर्ष 2015 से न्यायिक नियुक्तियों में विलंब हुआ है, जो औसतन 285 दिन है, जबकि पहले यह 274 दिन थी।
राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग क्या है?
- परिचय: NJAC एक प्रस्तावित संवैधानिक निकाय था जिसका उद्देश्य सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिये कॉलेजियम प्रणाली को प्रतिस्थापित करना था।
- न्यायिक नियुक्तियों के लिये एक नई प्रणाली स्थापित करने के लिये 99वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2014 और NJAC अधिनियम, 2014 पारित किये गए थे।
- संरचना: NJAC में निम्नलिखित शामिल होंगे:
- भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) पदेन अध्यक्ष होंगे।
- सर्वोच्च न्यायालय के दो वरिष्ठतम न्यायाधीश पदेन सदस्य होंगे।
- केन्द्रीय विधि मंत्री पदेन सदस्य होंगे।
- नागरिक समाज से दो प्रतिष्ठित व्यक्ति, जिनका चयन मुख्य न्यायाधीश, प्रधानमंत्री और नेता प्रतिपक्ष (SC/ST/OBC/अल्पसंख्यकों/महिलाओं में से एक) की समिति द्वारा किया जाएगा।
- प्रमुख विशेषताएँ:
- वीटो शक्ति: यदि कोई दो सदस्य असहमत हों तो वे किसी सिफारिश को रोक सकते हैं।
- नियुक्ति मानदंड: वरिष्ठता, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व आदि शामिल।
- वर्ष 2015 में सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय: 5 न्यायाधीशों की पीठ ने 4:1 के बहुमत से NJAC को असंवैधानिक घोषित करते हुए उसे रद्द कर दिया।
- बहुमत की राय: NJAC ने न्यायिक स्वतंत्रता को कमज़ोर करके संविधान के मूल ढाँचे का उल्लंघन किया है।
- नियुक्तियों में न्यायपालिका की प्रधानता मूल संरचना का हिस्सा है, और NJAC ने कार्यपालिका (कानून मंत्री) और गैर-न्यायिक सदस्यों को वीटो शक्ति देकर इसे कमज़ोर कर दिया है।
- न्यायिक नियुक्तियों में कार्यपालिका के हस्तक्षेप का जोखिम एक बड़ी चिंता का विषय था।
- असहमति (न्यायमूर्ति चेलमेश्वर): NJAC का समर्थन किया, तर्क दिया कि कॉलेजियम प्रणाली में पारदर्शिता का अभाव है।
- बहुमत की राय: NJAC ने न्यायिक स्वतंत्रता को कमज़ोर करके संविधान के मूल ढाँचे का उल्लंघन किया है।
NJAC को कॉलेजियम प्रणाली से बेहतर क्यों माना जाता है?
- पारदर्शी एवं जवाबदेह: NJAC एक संरचित एवं प्रलेखित आयोग था, जिसमें परिभाषित प्रक्रियाएँ और रिकॉर्ड किये गए विचार-विमर्श थे।
- संतुलित कार्यपालिका-न्यायपालिका भूमिका: NJAC में कानून मंत्री और दो प्रतिष्ठित सदस्य शामिल थे, जिससे बिना किसी प्रभुत्व के कार्यकारी इनपुट सुनिश्चित हुआ।
- इसमें वीटो शक्ति निहित थी, जिसके तहत कोई भी दो सदस्य किसी उम्मीदवार को रोक सकते थे, जिससे एकतरफा निर्णय पर रोक लगती थी।
- बेहतर प्रतिनिधित्व: NJAC ने शीघ्र नियुक्तियाँ सुनिश्चित कीं और अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति/अन्य पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यकों या महिलाओं से एक प्रतिष्ठित सदस्य के साथ विविधता को अनिवार्य बनाया।
- लोकतांत्रिक वैधता: NJAC को संसद में लगभग सर्वसम्मति से पारित किया गया तथा 16 राज्यों द्वारा इसका अनुमोदन किया गया।
- अंतर्राष्ट्रीय तुलना: NJAC का उद्देश्य न्यायिक नियुक्तियों में कार्यकारी और विधायी निगरानी को शामिल करके भारत को वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं के अनुरूप बनाना है, जैसा कि अमेरिका और ब्रिटेन जैसे कई लोकतंत्रों में देखा गया है।
- उदाहरण के लिये, अमेरिका में सीनेट नामों का प्रस्ताव करती है और इसकी न्यायिक समिति पुष्टिकरण सुनवाई करती है।
अखिल भारतीय न्यायिक सेवा क्या है?
- परिचय: AIJS सभी राज्यों के अतिरिक्त ज़िला न्यायाधीशों और ज़िला न्यायाधीशों के लिये एक प्रस्तावित केंद्रीकृत भर्ती प्रणाली है।
- इसका उद्देश्य न्यायिक भर्ती को मानकीकृत करना, दक्षता में सुधार करना और अधीनस्थ न्यायपालिका में एक समान गुणवत्ता सुनिश्चित करना है।
- पृष्ठभूमि: यह विचार पहली बार विधि आयोग की रिपोर्टों (वर्ष 1958, वर्ष 1978) में प्रस्तावित किया गया था और वर्ष 2006 में संसदीय स्थायी समिति द्वारा इस पर पुनः विचार किया गया था।
- संवैधानिक आधार:
- अनुच्छेद 312, दो-तिहाई बहुमत से समर्थित राज्यसभा के प्रस्ताव के माध्यम से, केंद्रीय सिविल सेवाओं के समान, AIJS के सृजन की अनुमति देता है।
- अनुच्छेद 312(3) AIJS को ज़िला न्यायाधीश स्तर और उससे ऊपर के पदों तक सीमित करता है, जैसा कि अनुच्छेद 236 में परिभाषित किया गया है।
- अनुच्छेद 236 में शहर के सिविल न्यायालय के न्यायाधीश, अतिरिक्त ज़िला न्यायाधीश और सत्र न्यायाधीश जैसे विभिन्न न्यायिक पद शामिल हैं।
- अनुच्छेद 312, दो-तिहाई बहुमत से समर्थित राज्यसभा के प्रस्ताव के माध्यम से, केंद्रीय सिविल सेवाओं के समान, AIJS के सृजन की अनुमति देता है।
- आवश्यकता:
- वर्तमान नियुक्ति: वर्तमान में ज़िला न्यायाधीशों की नियुक्ति अनुच्छेद 233 और 234 के तहत की जाती है, जो राज्यों को राज्य लोक सेवा आयोगों और उच्च न्यायालयों के माध्यम से ज़िला न्यायाधीशों की नियुक्ति करने की शक्ति प्रदान करते हैं, जो अधीनस्थ न्यायपालिका की देखरेख करते हैं।
- अनुच्छेद 233: राज्यपाल उच्च न्यायालय के परामर्श से ज़िला न्यायाधीशों की नियुक्ति, पदस्थापना और पदोन्नति करता है।
- अनुच्छेद 234: न्यायिक अधिकारियों की भर्ती (ज़िला न्यायाधीशों को छोड़कर)।
निष्कर्ष
न्यायिक नियुक्तियों पर विवाद कॉलेजियम प्रणाली की खामियों को उज़ागर करता है, तथा NJAC और AIJS जैसे सुधारों की मांग को बल देता है। पारदर्शिता, योग्यता आधारित चयन और कार्यपालिका-न्यायिक संतुलन सुनिश्चित करना सार्वजनिक विश्वास और न्यायिक स्वतंत्रता के लिये आवश्यक है, साथ ही संवैधानिक सिद्धांतों की रक्षा करना और जाँच और संतुलन बनाए रखना भी आवश्यक है।
दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न: भारत में न्यायिक नियुक्तियों की कॉलेजियम प्रणाली का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिये। साथ ही, इस बात पर चर्चा कीजिये कि क्या राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) एक बेहतर विकल्प होता। |
UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्नप्रश्न. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2019)
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? (a) केवल 1 उत्तर: (b) प्रश्न . भारत के सर्वोच्च न्यायालय की स्वायत्तता की रक्षा के लिये क्या प्रावधान है? (2012)
उपर्युक्त में से कौन सा/से कथन सही है/हैं? (a) केवल 1 और 3 उत्तर: (a) मेन्स:प्रश्न. भारत में उच्च न्यायपालिका के न्यायाधीशों की नियुक्ति के संदर्भ में 'राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग अधिनियम, 2014' पर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिये। (2017) |


भारतीय अर्थव्यवस्था
संशोधित प्राथमिकता क्षेत्र ऋण दिशानिर्देश
प्रिलिम्स के लिये:भारतीय रिज़र्व बैंक, प्राथमिकता क्षेत्र ऋण, प्राथमिकता क्षेत्र ऋण प्रमाणपत्र, ग्रामीण अवसंरचना विकास निधि मेन्स के लिये:प्राथमिकता क्षेत्र ऋण विकास, प्रभाव और चुनौतियाँ, PSL के माध्यम से वित्तीय समावेशन |
स्रोत: फाइनेंशियल एक्सप्रेस
चर्चा में क्यों?
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 के तहत संशोधित प्राथमिकता क्षेत्र ऋण (PSL) दिशानिर्देश जारी किये हैं। इन अद्यतनों का उद्देश्य प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में ऋण प्रवाह और समावेशी विकास को बढ़ावा देना है।
संशोधित PSL दिशानिर्देश 2025 क्या हैं?
- शिक्षा के लिये उच्च ऋण सीमा: RBI ने शिक्षा के लिये PSL के तहत ऋण सीमा को 20 लाख रुपए से बढ़ाकर 25 लाख रुपए प्रति व्यक्ति कर दिया है।
- नवीकरणीय ऊर्जा ऋण: सौर ऊर्जा, बायोमास और सूक्ष्म जल विद्युत संयंत्रों जैसी नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं के लिये ऋण सीमा प्रति उधारकर्त्ता 30 करोड़ रुपए से बढ़ाकर 35 करोड़ रुपए कर दी गई।
- नवीकरणीय ऊर्जा के लिये व्यक्तिगत परिवारों के लिये ऋण की सीमा प्रति उधारकर्त्ता 10 लाख रुपए तक बनी रहेगी।
- शहरी सहकारी बैंकों (UCB) के लिये PSL लक्ष्य: UCB के लिये संशोधित PSL लक्ष्य को समायोजित निवल बैंक ऋण (ANBC) या ऑफ-बैलेंस शीट एक्सपोजर (CEOBE) के समतुल्य ऋण के 60% (75% से) तक घटा दिया गया है, जो भी अधिक हो।
- आवास क्षेत्र: किफायती आवास को बढ़ावा देने के लिये ऋण सीमा बढ़ाई गई है, विशेष रूप से टियर-III से टियर-VI शहरों में।
- 'कमज़ोर वर्ग' श्रेणी का विस्तार: 'कमज़ोर वर्ग' श्रेणी के अंतर्गत पात्र उधारकर्त्ताओं की सूची का विस्तार किया गया है, इसमें अब ट्रांसजेंडर को भी शामिल किया गया है, जिससे वंचित समूहों के लिये वित्तीय समावेशन और बेहतर ऋण पहुँच को बढ़ावा मिलेगा।
नोट: ANBC आवश्यक कटौती और समायोजन के बाद कुल शुद्ध बैंक ऋण है, और CEOBE वह राशि है जो गारंटी और ऋण पत्र जैसे ऑफ-बैलेंस शीट मदों के ऋण जोखिम जोखिम का प्रतिनिधित्व करती है।
प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र ऋण क्या है?
- परिचय: PSL RBI द्वारा निर्धारित एक अनिवार्य शर्त है जिसके तहत बैंकों को अपने ऋणों का एक निश्चित हिस्सा उन प्रमुख प्राथमिकता वाले क्षेत्रों को आवंटित करना होता है, जो ऋण की कमी का सामना कर रहे हैं, लेकिन समावेशी आर्थिक विकास के लिये महत्त्वपूर्ण हैं।
- प्राथमिकता क्षेत्र ऋण प्रमाणपत्र (PSLC) प्राथमिकता क्षेत्र के ऋणों के बदले जारी किये जाने वाले व्यापार योग्य प्रमाणपत्र हैं।
- PSL का विकास: गाडगिल समिति (वर्ष 1969) ने 'क्षेत्रीय दृष्टिकोण' का प्रस्ताव रखा, जिसके परिणामस्वरूप क्षेत्रीय ऋण योजना के लिये अग्रणी बैंक योजना (LBS) का विकास हुआ।
- नरीमन समिति (वर्ष 1969) ने गाडगिल समिति की सिफारिशों का समर्थन किया और सिफारिश की कि सार्वजनिक क्षेत्र के प्रत्येक बैंक को PSL को बढ़ावा देने के लिये कुछ ज़िलों को 'अग्रणी बैंक' के रूप में अपनाना चाहिये।
- PSL को वर्ष 1972 में RBI के अनौपचारिक अध्ययन समूह की रिपोर्ट (वर्ष 1971) के आधार पर औपचारिक रूप दिया गया था। प्रारंभ में कोई लक्ष्य निर्धारित नहीं किया गया था, लेकिन वर्ष 1974 में बैंकों को वर्ष 1979 तक PSL को 33.3% तक बढ़ाने की सलाह दी गई।
- कृष्णास्वामी समिति (वर्ष 1980) ने वर्ष 1985 तक 40% PSL लक्ष्य की सिफारिश की, जिसमें कृषि और कमज़ोर वर्गों के लिये उप-लक्ष्य भी शामिल थे।
- उषा थोराट समिति (2009) ने PSL के विस्तार में इसकी भूमिका के लिये LBS को जारी रखने का समर्थन किया।
बैंकों के लिये PSL लक्ष्य:
बैंक श्रेणी |
लक्ष्य |
अनुसूचित वाणिज्यिक बैंक (SCB) और विदेशी बैंक (भारत में 20+ शाखाओं के साथ) |
ANBC या CEOBE का 40%, जो भी अधिक हो |
विदेशी बैंक (20 से कम शाखाएँ) |
ANBC या CEOBE का 40% (निर्यात ऋण: न्यूनतम 32%, और गैर-निर्यात क्षेत्र 8%) |
क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक (RRB) और लघु वित्त बैंक (SFB) |
ANBC या CEOBE का 75%, जो भी अधिक हो |
- लक्ष्य पूरा न कर पाने की स्थिति में बैंकों के लिये प्रावधान: यह सुनिश्चित करने के लिये कि प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्रों तक धनराशि की उपलब्धता बनी रही, PSL लक्ष्य पूरा करने में विफल रहने वाले बैंकों को ग्रामीण अवसंरचना विकास निधि (RIDF) और अन्य निर्दिष्ट निधियों में निश्चित ब्याज दरों पर योगदान करना होगा।
नोट: विदेशी बैंक (भारत में 20 से कम शाखाओं के साथ) गैर-निर्यात क्षेत्रों के लिये अपने 8% लक्ष्य को पूरा करने के लिये PSLC जनरल का क्रय नहीं कर सकते हैं, लेकिन कृषि, MSME और लघु तथा सीमांत किसानों के लिये PSLC का क्रय कर सकते हैं।
PSL से संबंधित चुनौतियाँ क्या हैं?
- क्षेत्रीय असंतुलन: बैंक सामान्यतः PSL के अंतर्गत MSME या आवास क्षेत्रों को ऋण प्रदान करने को प्राथमिकता देते हैं, क्योंकि वे व्यावसायिक रूप से अधिक व्यवहार्य होते हैं।
- लघु एवं सीमांत कृषि जैसे क्षेत्र, PSL का मुख्य घटक होने के बावजूद, वर्तमान में भी अपर्याप्त वित्त-पोषित क्षेत्र हैं।
- उच्च अनर्जक परिसंपत्तियाँ (NPA): बैंकों को विशेष रूप से कृषि क्षेत्र में PSL ऋणों की वसूली में चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, जिसके कारण उच्च NPA और वित्तीय तनाव उत्पन्न होता है।
- अध्ययनों के अनुसार PSL के कारण उधारकर्त्ताओं की सुभेद्यता के कारण चूक में वृद्धि होती है तथा राजनीतिक हस्तक्षेपों (ऋण माफी जैसी पहलों के साथ) के कारण बैंक ऋण प्रदान करने हेतु निरुत्साहित होते हैं।
- बैंकों के लिये अल्प लाभप्रदता: PSL ऋणों में प्रायः ब्याज दरें कम होती हैं और चूक का जोखिम अधिक होता है, जिससे वे बैंकों के लिये अल्प लाभदायक होते हैं।
- लक्ष्य-संचालित दृष्टिकोण: PSL परिणाम-उन्मुख होने के बजाय लक्ष्य-संचालित हो गया है। बैंक प्रायः अप्रत्यक्ष या गैर-प्राथमिकता वाले तरीकों से कोटा पूरा करने पर ध्यान केंद्रित करते हैं, जिससे वास्तविक विकासात्मक प्रभाव कम हो जाता है।
PSL का वर्द्धन करने हेतु क्या किया जा सकता है?
- निष्पादन-आधारित प्रोत्साहन: कोटा-आधारित ऋण प्रदान किये जाने के स्थान पर निर्धनता निवारण, आजीविका सृजन और सामाजिक परिणामों पर केंद्रित प्रभाव-संचालित दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है।
- केवल ऋण वितरण आँकड़ों के बजाय सामाजिक प्रभाव लेखापरीक्षा और विकास संकेतकों के माध्यम से निष्पादन आकलन शुरू किया जाना चाहिये।
- जोखिम न्यूनीकरण को बढ़ावा देना: PSL के अंतर्गत उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों के लिये समर्पित ऋण गारंटी योजनाओं के माध्यम से, जैसे कि सूक्ष्म और लघु उद्यमों योजना हेतु संशोधित क्रेडिट गारंटी फंड ट्रस्ट (CGTMSE) की स्थापना, NPA के जोखिम को व्यापक स्तर तक कम किया जा सकता है।
- डिजिटल और तकनीकी एकीकरण: उधारकर्त्ताओं की प्रोफाइल बनाने, जोखिमों की पूर्वानुमान करने और ऋण उत्पादों को वैयक्तिकृत करने के लिये बिग डेटा को उपयोग में लाया जाना चाहिये। कृषि-ऋण विश्वसनीयता को बढ़ाते हुए कृषि उत्पादन का आकलन करने के लिये जियोटैगिंग का उपयोग किया जाना चाहिये।
दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र ऋण (PSL) का वित्तीय समावेशन और आर्थिक विकास में किस प्रकार योगदान होता है? |
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्नमेन्स:प्रश्न. प्रधानमंत्री जन धन योजना (पी.एम.जे.डी.वाई.) बैंकरहितों को संस्थागत वित्त में लाने के लिये आवश्यक है। क्या आप सहमत हैं कि इससे भारतीय समाज के गरीब तबके का वित्तीय समावेश होगा? अपने मत की पुष्टि के लिये तर्क प्रस्तुत कीजिये। (2016) |


भारतीय अर्थव्यवस्था
विमानन क्षेत्र में भारत की प्रगति
प्रिलिम्स के लिये:UDAN, डिजी यात्रा, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश, विमानन टरबाइन ईंधन, सतत् विमानन ईंधन, नागरिक विमानन महानिदेशालय, भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण मेन्स के लिये:भारत के विमानन उद्योग का विकास, भारत के नागरिक विमानन के समक्ष चुनौतियाँ और संभावित सुधार, क्षेत्रीय कनेक्टिविटी और समावेशी विकास |
स्रोत:हिंदुस्तान टाइम्स
चर्चा में क्यों?
भारत जून 2025 में 81वीं अंतर्राष्ट्रीय वायु परिवहन संघ (IATA) वार्षिक आम बैठक और विश्व वायु परिवहन शिखर सम्मेलन की मेज़बानी करेगा।
- यह आयोजन भारत के तेज़ी से विकसित होते विमानन क्षेत्र पर प्रकाश डालता है, जो अनुमानतः इस दशक में विश्व का तीसरा सबसे बड़ा विमानन बाज़ार बनेगा।
भारत के विमानन क्षेत्र का परिदृश्य कैसा है?
- बाज़ार संवृद्धि और वैश्विक स्थिति: अमेरिका और चीन के बाद भारत तीसरा सबसे बड़ा घरेलू विमानन बाज़ार है। दक्षिण एशिया के एयरलाइन यातायात में भारत की वर्तमान हिस्सेदारी 69% है।
- भारत अनुमानित रूप से वर्ष 2030 तक तीसरा सबसे बड़ा वायु यात्री बाज़ार (अंतर्राष्ट्रीय और घरेलू) होगा।
- वित्त वर्ष 2025 (सितंबर 2024 तक) के दौरान वायु यात्रा करने वाले यात्रियों (अंतर्राष्ट्रीय और घरेलू) की संख्या 196.91 मिलियन रही।
- रोजगार सृजन: विमानन उद्योग से प्रत्यक्ष रूप से 369,700 लोगों को रोजगार प्राप्त है और आर्थिक उत्पादन में इसका 5.6 बिलियन अमेरिकी डॉलर का योगदान है।
- यदि पर्यटन और संबंधित उद्योगों को शामिल किया जाए, तो विमानन क्षेत्र द्वारा प्रदत्त रोज़गार 7.7 मिलियन है और इसका 53.6 बिलियन अमरीकी डालर का योगदान है, जो भारत के सकल घरेलू उत्पाद का 1.5% है।
- बुनियादी ढाँचा: परिचालनगत हवाई अड्डों की संख्या वर्ष 2014 में 74 थी जो वर्ष 2024 में बढ़कर 157 हो गई, तथा वर्ष 2047 तक 350 से 400 हवाई अड्डों को क्रियाशील बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इसके अतिरिक्त, 21 ग्रीनफील्ड हवाई अड्डों को स्वीकृति दी गई, जिनमें से 11 पहले से ही परिचालन में हैं।
- विमानों का गमनागमन 3.85% की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) के साथ वित्त वर्ष 17 के 2.05 मिलियन से बढ़कर वित्त वर्ष 24 में 2.67 मिलियन हो गया।
- नये टर्मिनल और ग्रीनफील्ड हवाई अड्डों का विकास जारी है (जैसे, बागडोगरा सिविल एन्क्लेव, देहरादून टर्मिनल)।
भारत के विमानन विकास के प्रमुख चालक क्या हैं?
- मध्यम वर्ग का निरंतर विस्तार: भारत में मध्यम वर्ग के निरंतर विस्तार से एक दशक में घरेलू वायु यात्रा में दोगुना वृद्धि हुई है, जो वित्त वर्ष 24 में 15% वार्षिक वृद्धि के साथ 37.6 करोड़ हो गया है।
- इस जनांकिकीय बदलाव के कारण, विशेष रूप से घरेलू मार्गों पर, संवहनीय और सुलभ वायु यात्रा की मांग में वृद्धि हुई है।
- बेड़े का विस्तार: इंडिगो और एयर इंडिया जैसी एयरलाइनों ने व्यापक स्तर पर विमानों के ऑर्डर दिये हैं। परिचालनगत वाणिज्यिक विमानों की संख्या वर्ष 2027 तक 1,100 होने की उम्मीद है, जो वर्ष 2023 में 771 थी।
- पर्यटन और व्यावसायिक यात्रा: धार्मिक, चिकित्सा और साहसिक पर्यटन के बढ़ने के साथ-साथ व्यावसायिक यात्रा में वृद्धि से भारत के विमानन क्षेत्र के समग्र विकास को बढ़ावा मिला है।
- प्रतिभा पूल: वैश्विक औसत 5% की तुलना में भारत में महिला पायलटों की हिस्सेदारी 15% है, जो विमानन लैंगिक समानता में महत्त्वपूर्ण प्रगति को दर्शाता है।
- निजी क्षेत्र की भागीदारी में वृद्धि: सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) हवाई अड्डों की संख्या वर्ष 2014 में मात्र 5 थी जो वर्ष 2024 में बढ़कर 24 हो गई है। राष्ट्रीय मुद्रीकरण पाइपलाइन में 25 हवाई अड्डों का निजीकरण करना शामिल है।
- सरकारी पहल: UDAN (उड़े देश का आम नागरिक) के माध्यम से वायु यात्रा के किराए में सब्सिडी देकर और अल्प सुविधा वाले हवाई अड्डों को विकसित कर क्षेत्रीय कनेक्टिविटी में विस्तार हुआ है।
- UDAN के अंतर्गत 519 से अधिक मार्गों को क्रियाशील बनाया गया है, जिससे समग्र देश के दूरदराज़ और आंतरिक क्षेत्रों तक पहुँच में सुधार हुआ है।
- डिजी यात्रा, चेहरे की पहचान तकनीक के माध्यम से संपर्क रहित, पेपरलेस हवाई यात्रा को सुगम यात्री प्रसंस्करण के लिये सक्षम बनाती है।
- सरकार अनुसूचित घरेलू एयरलाइनों में 100% प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की अनुमति देती है (स्वचालित मार्ग से 49% तक), जबकि अनिवासी भारतीय (NRI) अनुसूचित वायु परिवहन सेवा में स्वचालित मार्ग से 100% निवेश कर सकते हैं।
- वर्ष 2000 से वर्ष 2024 के बीच भारत ने हवाई परिवहन क्षेत्र में 3.85 बिलियन अमरीकी डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आकर्षित किया।
- भारत ने घरेलू रखरखाव, मरम्मत और ओवरहाल (MRO) उद्योग को बढ़ावा देने के लिये विमान भागों पर एक समान 5% एकीकृत वस्तु एवं सेवा कर लागू किया है, जिसके वर्ष 2030 तक 4 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँचने का अनुमान है।
भारतीय विमानन क्षेत्र को किन चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है?
- उच्च ईंधन लागत: विमानन एक कम मार्जिन वाला उद्योग है जिसका वैश्विक शुद्ध लाभ मार्जिन केवल 3.6% है। भारत में एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) पर अत्यधिक कर लगाया जाता है, जो एयरलाइन के परिचालन व्यय का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है और वित्तीय बोझ बढ़ाता है।
- विनिमय दर में अस्थिरता: अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपए के मूल्य में गिरावट से एयरलाइनों की लागत बढ़ जाती है, क्योंकि विमान पट्टे और ईंधन आयात जैसे प्रमुख खर्च डॉलर में ही होते हैं।
- स्थिरता: वैश्विक विमानन उद्योग वर्ष 2050 तक शुद्ध शून्य कार्बन उत्सर्जन प्राप्त करने के लिये प्रतिबद्ध है।
- हालाँकि, भारत के प्रयासों में सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल (SAF) को धीमी गति से अपनाने और हरित हवाई अड्डे के सीमित बुनियादी ढाँचे के कारण बाधा आ रही है, जिससे उत्सर्जन और पर्यावरणीय प्रभाव को कम करने की दिशा में इसकी प्रगति प्रभावित हो रही है।
- क्षेत्रीय संपर्क में कमी: उड़ान योजना के अंतर्गत प्रगति के बावजूद, कई टियर-II और टियर-III शहर, विशेषकर तेलंगाना जैसे विकासशील राज्यों में, अभी भी कनेक्टिविटी से वंचित हैं।
- कुशीनगर (उत्तर प्रदेश) और सिंधुदुर्ग (महाराष्ट्र) जैसे हवाई अड्डे कम मांग के कारण संघर्ष कर रहे हैं, जिससे एयरलाइनों को परिचालन में कटौती करने पर मज़बूर होना पड़ रहा है।
- विनियामक जटिलता और ओवरलैप: विमानन क्षेत्र की देखरेख कई एजेंसियाँ करती हैं (नागरिक उड्डयन महानिदेशालय, भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण, नागरिक विमानन मंत्रालय), जिसके कारण कार्य-क्षेत्र में ओवरलैपिंग होती है और मंजूरी में विलंब होता है।
- एयरलाइनों को कराधान, पर्यावरण मंजूरी और हवाई अड्डा शुल्क सहित जटिल अनुपालन बोझ का सामना करना पड़ता है।
- अविकसित विमानन क्षेत्र आधुनिकीकरण: विमानों की संख्या में तीव्र वृद्धि के साथ-साथ वायु यातायात नियंत्रण और विमानन क्षेत्र अनुकूलन का आधुनिकीकरण नहीं किया गया है, विशेष रूप से व्यस्त क्षेत्रों में, जिसके कारण उड़ानों के मार्ग में परिवर्तन और विलंब हो रहा है।
- इसके अतिरिक्त, बढ़ती मांग के बावजूद कमजोर कार्गो बुनियादी ढाँचे के कारण माल ढुलाई की वृद्धि बाधित हो रही है।
भारत के विमानन विकास को मज़बूत करने के लिये किन उपायों की आवश्यकता है?
- ATF कराधान का युक्तिकरण: ATF को वस्तु एवं सेवा कर (GST) व्यवस्था के अंतर्गत लाना, ताकि व्यापक करों को कम किया जा सके तथा राज्यों में एक समान मूल्य निर्धारण सुनिश्चित किया जा सके।
- विमानन क्षेत्र का आधुनिकीकरण: विमानन क्षेत्र के उपयोग को अनुकूलित करने और विलंबता को कम करने के लिये उन्नत-सतही संचलन मार्गदर्शन और नियंत्रण प्रणाली के साथ प्रस्तावित नागरिक हवाई यातायात प्रबंधन प्रणाली को शीघ्रता से क्रियान्वित करना।
- स्थिरता को बढ़ावा देना: भारत, जो विश्व का तीसरा सबसे बड़ा इथेनॉल उत्पादक और उपभोक्ता है, में अल्कोहल-टू-जेट (AtJ) मार्ग (अल्कोहल को वैकल्पिक जेट ईंधन में रूपांतरित करना) के माध्यम से SAF उत्पादन में अग्रणी बनने की प्रबल क्षमता है।
- कार्गो अवसंरचना को प्रोत्साहित करना: ग्रामीण आय और निर्यात को बढ़ावा देने के लिये शीघ्र खराब होने वाले और उच्च मूल्य वाले सामानों के लिये कोल्ड चेन और वेयरहाउसिंग के साथ कृषि उड़ान 2.0 के अंतर्गत समर्पित एयर कार्गो हब विकसित करना।
निष्कर्ष
भारत का विमानन क्षेत्र ऐतिहासिक मोड़ पर है और वैश्विक विमानन क्षेत्र में अग्रणी बनने की स्थिति में है। लागत संबंधी चिंताओं का समाधान करके और स्थिरता को बढ़ावा देकर, भारत इस महत्त्वपूर्ण उद्योग में दीर्घकालिक सफलता सुनिश्चित कर सकता है।
दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न: भारत के विमानन क्षेत्र के विकास को गति देने वाले प्रमुख कारक क्या हैं? यह अर्थव्यवस्था में किस प्रकार योगदान देता है? |
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्नमेन्सप्रश्न. सार्वजनिक-निज़ी भागीदारी (पीपीपी) मॉडल के तहत संयुक्त उद्यमों के माध्यम से भारत में हवाई अड्डों के विकास की जाँच कीजिये। इस संबंध में अधिकारियों के सामने क्या चुनौतियाँ हैं? (2017) |

