गिद्धों की गणना | मध्य प्रदेश | 26 Feb 2025
चर्चा में क्यों?
मध्य प्रदेश में गिद्धों की संख्या और उनकी स्थिति का आकलन करने के लिये गिद्ध गणना 17 फरवरी 2025 से प्रारंभ हुई।
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मुख्य बिंदु
- गणना के बारे में:
- यह गणना दो चरणों में की जाएगी। गिद्दों के आंकलन की गणना वर्ष में दो बार की जाती है।
- आधिकारिक जानकारी के अनुसार शीतकालीन गिद्ध गणना 17, 18 एवं 19 फरवरी को की गई और ग्रीष्मकालीन गिद्ध गणना 29 अप्रैल 2025 को की जाएगी।
- प्रशिक्षण कार्यक्रम:
- 2024-25 के लिये 11 मास्टर ट्रेनरों द्वारा एक दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया।
- भागीदार:
- प्रशिक्षण में 900 से अधिक वन अधिकारी-कर्मचारियों, गिद्ध विशेषज्ञों और पक्षी पक्षी विशेषज्ञों ने भाग लिया।
- उद्देश्य:
- गिद्धों की संख्या का आंकलन और उनकी स्थिति का अध्ययन करना।
- शीतकालीन गिद्ध गणना
- मंदसौर ज़िले के गांधीसागर अभयारण्य (GSWLS) में तीन दिवसीय शीतकालीन गिद्ध गणना प्रारंभ हो गई है।
- राज्य वन विभाग के अनुसार, राज्य में कुल 12,981 गिद्ध पाए गए।
- ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य
- मध्य प्रदेश में गिद्धों की गणना पहली बार वर्ष 2016 में हुई थी, जब राज्य में 6,999 गिद्ध थे।
- इसके बाद वर्ष 2018, 2019, 2021, 2024 और 2025 में भी गणना की गई है।
गिद्धों के बारे में:
- परिचय
- गिद्ध पारिस्थितिकी तंत्र में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, क्योंकि वे मृत जीवों को खाते हैं।
- ये प्राकृतिक सफाईकर्मी (Scavenger) के रूप में कार्य करते हैं।
- ये मुख्य रूप से उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में रहते हैं।
- भारत, गिद्धों की 9 प्रजातियों जैसे ओरिएंटल व्हाइट-बैक्ड, लॉन्ग-बिल्ड, स्लेंडर-बिल्ड, हिमालयन, रेड-हेडेड, इज़िप्शियन, बियर्डेड, सिनेरियस और यूरेशियन ग्रिफाॅन का निवास स्थान है।
- इन 9 प्रजातियों में से अधिकांश के विलुप्त होने का खतरा है।
- प्रजनन और जीवन चक्र
- गिद्ध साल में एक ही बार अंडे देते हैं और यह प्रक्रिया चट्टानों या ऊँचे पेड़ों पर होती है। गिद्ध का जीवनकाल औसतन 15 से 30 वर्ष तक होता है।
- संख्या में कमी
- इनकी संख्या में कमी का मुख्य कारण 1990 के दशक के अंत और 2000 के दशक की शुरुआत में पशुओं के उपचार में दर्द निवारक दवा डाईक्लोफेनाक का व्यापक उपयोग था।
- इसके परिणामस्वरूप कुछ क्षेत्रों में आबादी में 97% से अधिक की कमी देखी गई, जिससे पारिस्थितिक संकट उत्पन्न हुआ।
- गांधीसागर वन्यजीव अभयारण्य
- गांधीसागर वन्यजीव अभयारण्य, उत्तर-पश्चिमी मध्य प्रदेश (मंदसौर और नीमच ज़िलों) में राजस्थान की सीमा के पास स्थित है।
- इसे वर्ष 1974 में वन्यजीव अभयारण्य के रूप में अधिसूचित किया गया।
- चंबल नदी, गांधीसागर अभयारण्य से होकर बहती है और इसे दो भागों में विभाजित करती है।
- गांधीसागर अभयारण्य गिद्धों के लिये एक महत्त्वपूर्ण प्राकृतिक आश्रय स्थल है। यहाँ की जैवविविधता, ऊँची चट्टानें और भोजन की उपलब्धता गिद्धों के जीवन के लिये आदर्श वातावरण प्रदान करती हैं।
फीकल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया | उत्तर प्रदेश | 26 Feb 2025
चर्चा में क्यों?
प्रयागराज में गंगा-यमुना में कई स्थानों पर फीकल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया का स्तर काफी बढ़ गया है, जिसके कारण गंगा-यमुना का पानी नहाने लायक नहीं रहा है।
मुख्य बिंदु
- CPCB की रिपोर्ट:
- केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) की एक रिपोर्ट के अनुसार, प्रयागराज संगम पर फीकल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया का स्तर प्रति 100 मिलीलीटर जल में 2,500 यूनिट की सुरक्षित सीमा से कहीं अधिक है।
- यह पानी पीने और नहाने के लिये पूरी तरह से अनुपयुक्त है, जिससे स्वास्थ्य पर गंभीर असर हो सकता है।
- NGT की टिप्पणी:
- इस मुद्दे पर NGT (नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल) सुनवाई कर रहा है और संबंधित अधिकारियों से रिपोर्ट मांगी जा रही है।
- महाकुंभ मेले के दौरान सीवेज प्रबंधन योजना को लेकर NGT पहले ही उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश चुका है।
फीकल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया के बारे में
- परिचय
- यह सूक्ष्मजीवों (Microorganism) का एक संग्रह है जो, मुख्यतः गर्म रक्त वाले जानवरों एवं मनुष्यों द्वारा उत्सर्जित मल या अपशिष्ट में पाया जाता है।
- इन्हें आमतौर पर पानी में संभावित प्रदूषण के संकेतक के रूप में माना जाता है।
- अन्य कॉलिफोर्म बैक्टीरिया में एस्चेरिचिया (Escherichia), क्लेबसिएला (Klebsiella) और ई. कोली (E. coli) आदि शामिल हैं।
- जलस्रोत में इनकी उपस्थिति से जल में हानिकारक रोगाणु, जैसे- वायरस, परजीवी या अन्य संक्रामक बैक्टीरिया आदि का भी पता चलता है।
स्वास्थ्य पर प्रभाव
- इस बैक्टीरिया से अनेक बीमारियाँ जैसे जठरांत्र संक्रमण, त्वचा और नेत्र संक्रमण, टाइफाइड, हेपेटाइटिस ए और श्वसन संबंधी समस्याएँ हो सकती हैं।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड:
उपासना स्थल अधिनियम, 1991 | उत्तर प्रदेश | 26 Feb 2025
चर्चा में क्यों?
हाल ही में सांसद इकरा चौधरी ने उपासना स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 के प्रभावी क्रियान्वयन के लिये सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया है।
मुख्य बिंदु
- गौरतलब है कि यह अधिनियम किसी भी पूजा/उपासना स्थल की स्थिति को उसी अवस्था में रोक देता/बनाए रखता है, जैसा कि वह 15 अगस्त, 1947 को थी।
- उपासना स्थल (विशेष उपबंध) अधिनियम, 1991:
- यह पूजा स्थलों (राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद के मामले को छोड़कर, जिसका मामला पहले से ही अदालत में था) की "धार्मिक प्रकृति" को वर्ष 1947 की स्थिति के अनुरूप बनाए रखने का प्रयास करता है।
- उद्देश्य:
- इस अधिनियम का उद्देश्य उपासना स्थलों की धार्मिक स्थिति को संरक्षित रखना तथा विभिन्न धार्मिक संप्रदायों के बीच या एक ही संप्रदाय के भीतर धर्मांतरण को रोकना है।
- इस अधिनियम की धारा 3 के तहत पूजा स्थल या यहाँ तक कि उसके खंड को एक अलग धार्मिक संप्रदाय या एक ही धार्मिक संप्रदाय के अलग वर्ग के पूजा स्थल में परिवर्तित करने को प्रतिबंधित किया गया है।
- इस अधिनियम की धारा 4(2) में कहा गया है कि पूजा स्थल की प्रकृति को परिवर्तित करने से संबंधित सभी मुकदमे, अपील या अन्य कार्रवाईयाँ (जो 15 अगस्त, 1947 को लंबित थी) इस अधिनियम के लागू होने के बाद समाप्त हो जाएंगी और ऐसे मामलों पर कोई नई कार्रवाई नहीं की जा सकती।
- यह अधिनियम सरकार के लिये भी एक सकारात्मक दायित्व निर्धारित करता है कि वह हर पूजा स्थल के धार्मिक चरित्र/प्रकृति को उसी प्रकार बनाए रखे जैसा कि वह स्वतंत्रता के समय था।
- अपवाद:
- अयोध्या का विवादित स्थल (राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद) को इस अधिनियम से छूट दी गई थी। इसी छूट के कारण इस कानून के लागू होने के बाद भी अयोध्या मामले में मुकदमा आगे बढ़ सका।
- इसके अलावा इस अधिनियम में कुछ अन्य मामलों को भी छूट दी गई:
- कोई भी पूजा स्थल जो ‘प्राचीन स्मारक और पुरातात्त्विक स्थल अवशेष अधिनियम, 1958’ के तहत शामिल प्राचीन और ऐतिहासिक स्मारक या एक पुरातात्त्विक स्थल है।
- ऐसे मुकदमे जिनका निस्तारण हो चुका है या जिन पर अंतिम फैसला दिया जा चुका है।
- दंड:
- इस अधिनियम की धारा 6 के तहत अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन करने पर जुर्माने के साथ अधिकतम तीन वर्ष के कारावास के दंड का प्रावधान है।
- सर्वोच्च न्यायालय का मत:
- वर्ष 2019 में अयोध्या मामले के फैसले में सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक पीठ ने इस कानून का उल्लेख करते हुए कहा कि यह संविधान के धर्मनिरपेक्ष मूल्यों को प्रकट करता है और इसकी प्रतिगामिता को सख्ती से प्रतिबंधित करता है।.
- याचिका में दिये गए तर्क:
- याचिका में इस अधिनियम को इस आधार पर चुनौती दी गई है कि यह अधिनियम धर्मनिरपेक्षता का उल्लंघन करता है।
- इस याचिका में यह तर्क दिया गया है कि 15 अगस्त, 1947 की कट-ऑफ तिथि "मनमाना, तर्कहीन और पूर्वव्यापी" है तथा यह हिंदुओं, जैन, बौद्धों और सिखों को अपने "पूजा स्थलों" पर पुनः दावा करने के लिये अदालत जाने से रोकती है, जिन पर "कट्टरपंथी बर्बर आक्रमणकारियों" द्वारा "आक्रमण" कर "अतिक्रमण" कर लिया गया था।
- याचिका में यह तर्क दिया गया है कि केंद्र के पास "तीर्थस्थल" या "कब्रिस्तान" पर कानून बनाने की कोई शक्ति नहीं है, जो राज्य सूची के तहत आते हैं।
- हालाँकि सरकार के अनुसार, वह इस कानून को लागू करने के लिये संघ सूची की प्रविष्टि 97 के तहत अपनी अवशिष्ट शक्ति का उपयोग कर सकती है।
- संघ सूची की प्रविष्टि 97 केंद्र को उन विषयों पर कानून बनाने के लिये अवशिष्ट शक्ति प्रदान करती है जिन्हें (जिन विषयों को) तीनों में से किसी भी सूची में शामिल नहीं किया गया है।
कढ़ाई और सतह अलंकरण प्रदर्शनी | राजस्थान | 26 Feb 2025
चर्चा में क्यों ?
हाल ही में कढ़ाई और सतह अलंकरण को समर्पित भारत की पहली प्रदर्शनी जोधपुर में तीन स्थानों, अचल निवास, लक्ष्मी निवास, अनूप सिंहजी की हवेली में आयोजित की गई।
मुख्य बिंदु
- प्रदर्शनी के बारे में
- यह प्रदर्शनी शहरी पुनरुद्धार पहल JDH के सहयोग से टैक्सटाइल डिजाइनर मयंक मान सिंह कौल द्वारा आयोजित की गई है।
- प्रदर्शनी में भारत और विदेश के 20 से अधिक कलाकारों की 60 कलाकृतियाँ प्रदर्शित की गई।
- यह प्रदर्शनी कलाकारों की शिल्पकला को उजागर करती है और उनके काम को एक मंच प्रदान करती है।
- इस प्रदर्शनी में बिहार की खेता रजाई, पश्चिम बंगाल की कांथा, लखनऊ की चिकनकारी और गुजरात के कच्छ की जटिल शैलियों जैसे विभिन्न कढ़ाई के रूपों को प्रदर्शित करके भारतीय हस्तशिल्प की समृद्धि और विविधता को उजागर किया गया है।
- उद्देश्य:
- शिल्पकला को उजागर करना: प्रदर्शनी का प्रमुख उद्देश्य कढ़ाई को केवल कपड़ों तक सीमित न रखते हुए, इसे एक गतिशील और अभिव्यंजक कला के रूप में प्रस्तुत करना है।
- विविध कढ़ाई तकनीकों का प्रदर्शन करना
- प्रदर्शनी में कढ़ाई की तकनीकों को शिल्पकला और समकालीन वस्त्रों के बीच के संबंध को दिखाना।
- कारीगरों को सशक्त बनाना
जोधपुर
- परिचय
- जोधपुर थार मरुस्थल का प्रवेश द्वार है। ’ब्लू सिटी’ के नाम से लोकप्रिय ‘जोधपुर’ राजस्थान का दूसरा सबसे बड़ा शहर है।
- जोधपुर को ’सूर्य नगरी’ के नाम से भी जाना जाता है।
- स्थापना:
- जोधपुर की स्थापना वर्ष 1459 में राव जोधा ने की थी। इसे पहले मंडोर के स्थान पर बसाया गया था और यह राठौड़ वंश का मुख्यालय बन गया।
- भौगोलिक स्थिति:
- जोधपुर 26°-27°37' उत्तरी अक्षांश और 72°55'-73°52' पूर्वी देशांतर पर स्थित है।
- प्रमुख दर्शनीय स्थल:
- मेहरानगढ़ दुर्ग – एक विशाल किला जो पहाड़ी चट्टान पर स्थित है।
- जसवंत थड़ा – एक स्मारक, जो महाराज जसवंत सिंह की याद में बनाया गया।
- उम्मेद भवन पैलेस – एक शानदार महल जो आजकल होटल के रूप में भी कार्यरत है।
- घंटाघर और मंडोर गार्डन – जोधपुर के प्रसिद्ध स्थल हैं।
- सच्चियाय माता मंदिर, माचिया बायोलॉजिकल पार्क, कायिलाना झील – धार्मिक और प्राकृतिक स्थल।
- गणेश मंदिर – प्रसिद्ध धार्मिक स्थल।
- संस्कृति और अर्थव्यवस्था: जोधपुर की संस्कृति समृद्ध है, जो पारंपरिक राजस्थानी वास्तुकला, संगीत, नृत्य और कला से भरी हुई है। शहर की प्रसिद्ध नील रंग की इमारतों ने इसे "ब्लू सिटी" का नाम दिलवाया है।
अंतरिक्ष विकास के लिये छत्तीसगढ़ ने इसरो के साथ समझौता किया | छत्तीसगढ़ | 26 Feb 2025
चर्चा में क्यों?
छत्तीसगढ़ सरकार ने शासन, कृषि, पर्यावरण प्रबंधन और आपदा तैयारी के लिये अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी का उपयोग करने हेतु प्रमुख क्षेत्रों में उन्नत अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी को लागू करने के लिये भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के साथ साझेदारी की है।
मुख्य बिंदु
- छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री ने इस बात पर ज़ोर दिया कि यह सहयोग प्रमुख चुनौतियों का समाधान करने, संसाधन प्रबंधन को अनुकूलित करने और राज्य की प्रगति में तेज़ी लाने के लिये वैज्ञानिक प्रगति को बढ़ावा देगा।
- अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के एकीकरण से किसानों को सक्षमता मिलेगी, जलवायु अनुकूलन रणनीतियों में सुधार होगा तथा वैज्ञानिक प्रगति और वास्तविक दुनिया में कार्यान्वयन के बीच की खाई को पाटा जा सकेगा।
- कृषि: परिशुद्ध खेती, फसल निगरानी और जलवायु अनुकूल रणनीतियाँ बनाने में सहायक।
- मृदा स्वास्थ्य आकलन: सटीक मृदा आँकड़ों के साथ कृषि उत्पादकता बढ़ाना।
- जल संसाधन मानचित्रण: नदियों और भूजल का सतत् प्रबंधन सुनिश्चित करना।
- आपदा तैयारी: बाढ़, सूखा और जलवायु विसंगतियों के लिये पूर्व चेतावनी प्रणाली।
- स्मार्ट गवर्नेंस: कुशल निर्णय लेने के लिये स्थान-आधारित समाधान का कार्यान्वयन।
- पर्यावरण संरक्षण: वनों की कटाई और अवैध भूमि अतिक्रमण को रोकने के लिये वास्तविक समय उपग्रह निगरानी।
- शहरी नियोजन: स्थानिक विश्लेषण के माध्यम से स्मार्ट शहर विकास और परिवहन मॉडल का समर्थन करना।
- वैज्ञानिक सशक्तीकरण: अनुसंधान संस्थानों और युवा वैज्ञानिकों को अंतरिक्ष आधारित अनुप्रयोगों में अवसर प्रदान करना।
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO):
- परिचय
- इसरो भारत की अंतरिक्ष एजेंसी है। यह संगठन भारत और मानव जाति के लिये बाहरी अंतरिक्ष के लाभों को प्राप्त करने के लिये विज्ञान, इंजीनियरिंग और प्रौद्योगिकी में शामिल है।
- इसरो भारत सरकार के अंतरिक्ष विभाग (DOS) का एक प्रमुख घटक है। यह विभाग मुख्य रूप से इसरो के विभिन्न केंद्रों या इकाइयों के माध्यम से भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम को क्रियान्वित करता है।
- इसरो पहले भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष अनुसंधान समिति (INCOSPAR) था, जिसकी स्थापना वर्ष 1962 में भारत सरकार द्वारा डॉ. विक्रम ए. साराभाई की परिकल्पना के अनुसार की गई थी।
- इसरो का गठन 15 अगस्त, 1969 को हुआ था और अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी का उपयोग करने के लिये इसकी भूमिका को विस्तारित करते हुए INCOSPAR का स्थान लिया गया था।
- 1972 में DOS की स्थापना की गई तथा इसरो को DOS के अधीन लाया गया।
- उद्देश्य:
- इसरो का मुख्य उद्देश्य विभिन्न राष्ट्रीय आवश्यकताओं के लिये अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी का विकास और अनुप्रयोग करना है।
- इसरो ने संचार, टेलीविज़न प्रसारण और मौसम संबंधी सेवाओं, संसाधनों की निगरानी और प्रबंधन, अंतरिक्ष आधारित नेविगेशन सेवाओं के लिये एक प्रमुख अंतरिक्ष प्रणाली स्थापित की है।
- इसरो ने उपग्रहों को अंतरिक्ष की कक्षाओं में स्थापित करने के लिये उपग्रह प्रक्षेपण वाहन, पीएसएलवी और जीएसएलवी विकसित किये हैं।
उत्तराखंड के जैविक निर्यात में गिरावट | उत्तराखंड | 26 Feb 2025
चर्चा में क्यों?
जैविक खाद्य उत्पादकों एवं विपणन एजेंसियों के परिसंघ (COII) ने उत्तराखंड से जैविक उत्पादों के निर्यात में 66% की तीव्र गिरावट पर चिंता व्यक्त की।
मुख्य बिंदु
- गिरावट के कारण:
- निर्यात में गिरावट मुख्य रूप से राज्य सरकार द्वारा घोषित "उत्तराखंड ऑर्गेनिक" नीति का क्रियान्वयन न किये जाने के कारण है
- आजीविका की तलाश में लोगों का निरंतर पलायन जारी है, क्योंकि वे कृषि को आर्थिक रूप से लाभप्रद नहीं मानते।
- यदि राज्य सरकार किसानों को प्रोत्साहन, मंडियों, प्रशिक्षण और प्रदर्शन कार्यक्रमों के माध्यम से समर्थन नहीं देती है, तो स्थिति और खराब हो जाएगी और समय के साथ खेत खेती योग्य नहीं रह जाएंगे।
- उठाए गए कदम:
- किसानों को जैविक खेती की तकनीक उपलब्ध कराने के लिये COII और जीबी पंत विश्वविद्यालय के बीच समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर।
- 500 किसानों को प्रशिक्षण तथा जैविक प्रमाणीकरण प्राप्त करने में सहायता।
- APEDA को राज्य के आंतरिक भागों में नियमित आधार पर प्रशिक्षण कार्यक्रम और क्रेता-विक्रेता बैठकें आयोजित करने में मदद करनी चाहिये।
- राज्य सरकार को जैविक खेती अपनाने वाले किसानों को तीन वर्षों तक वित्तीय सहायता देनी चाहिये तथा बुनियादी ढाँचे को मज़बूत करना चाहिये।
- अपेक्षित परिणाम:
- जैविक खेती को लाभदायक बनाने से बागवानी और हस्तशिल्प को बढ़ावा मिल सकता है, कृषि आधारित लघु उद्योगों का विकास हो सकता है, जिससे अंततः आजीविका के लिये लोगों का पलायन कम हो सकता है।
जैविक खेती:
परिचय
- जैविक कृषि से अभिप्राय कृषि की ऐसी प्रणाली से है, जिसमें रासायनिक खादों एवं कीटनाशक दवाओं का प्रयोग नहीं हो बल्कि उसके स्थान पर जैविक खाद या प्राकृतिक खादों का प्रयोग हो।
- यह कृषि की एक पारंपरिक विधि है, जिसमें भूमि की उर्वरता में सुधार होने के साथ ही पर्यावरण प्रदूषण भी कम होता है।
- जैविक कृषि पद्धतियों को अपनाने से धारणीय कृषि, जैवविविधता संरक्षण आदि लक्ष्यों को प्राप्त किया जा सकता है। जैविक कृषि को बढ़ावा देने के लिये किसानों को प्रशिक्षण देना महतत्त्वपूर्ण है।
राष्ट्रीय जैविक उत्पादन कार्यक्रम (NPOP:
- वर्ष 2001 में शुरू की गई NPOP, वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के तहत कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (APEDA) द्वारा कार्यान्वित की जाती है, जो जैविक उत्पादन मानकों और जैविक खेती को बढ़ावा देने पर केंद्रित है।
- यह जैविक खेती में भारत की वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मकता को बढ़ाता है। उत्पादन और मान्यता के लिये NPOP मानकों को यूरोपीय आयोग और स्विट्ज़रलैंड द्वारा मान्यता प्राप्त है, जिससे भारतीय जैविक उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार किया जा सकता है।
जैविक खाद्य उत्पादक एवं विपणन एजेंसी परिसंघ (COII):
- जैविक खाद्य उत्पादकों एवं विपणन एजेंसियों का परिसंघ, जिसे लोकप्रिय रूप से COII के नाम से जाना जाता है, भारत में सभी हितधारकों का एक समन्वित और एकीकृत निकाय है, जिसमें किसान, उत्पादक, संग्रहण केंद्र, प्रसंस्करणकर्त्ता, क्रेता, विक्रेता, आयातक, निर्यातक, बीज और प्रौद्योगिकी प्रदाता, बैंक और वित्तीय संस्थान, राज्य और केंद्र सरकारें इत्यादि शामिल हैं।
- अपनी स्थापना के बाद से ही परिसंघ जैविक खाद्य उद्योग के सभी हितधारकों के हितों को बढ़ावा देने और उनकी रक्षा करने तथा उद्योग के लिये एक सामूहिक मदद प्रदान करने में लगा हुआ है।
- परिसंघ उद्योग के सामान्य आदर्श, वाणिज्यिक और व्यावसायिक हितों को बढ़ावा देता है, विशेष रूप से अनुचित प्रतिस्पर्द्धा से लड़कर और प्रौद्योगिकी में जानकारी तथा परिवर्तन प्रदान करके।
हरियाणा ने त्रिभाषा फार्मूला अपनाया | हरियाणा | 26 Feb 2025
चर्चा में क्यों?
हरियाणा सरकार ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 के अनुसार, भिवानी विद्यालय शिक्षा बोर्ड के अंतर्गत आने वाले स्कूलों में त्रिभाषा फार्मूला लागू किया है।
मुख्य बिंदु:
- कक्षा 9वीं और 10वीं के विद्यार्थियों को अंग्रेज़ी और हिंदी भाषाएँ अनिवार्य रूप से पढ़नी होंगी, जबकि तीसरी भाषा के लिये उन्हें तीन भाषाओं में से एक अर्थात संस्कृत, पंजाबी या उर्दू चुनने का विकल्प होगा।
- अन्य अनिवार्य विषयों में गणित, विज्ञान और सामाजिक विज्ञान शामिल हैं।
- इन विद्यार्थियों को व्यावसायिक विषयों, शारीरिक शिक्षा, चित्रकला, संगीत आदि में से एक विषय चुनने का विकल्प होगा।
- आदेश में यह भी स्पष्ट किया गया है कि नया विषय संयोजन शैक्षणिक सत्र 2025-26 से कक्षा IX में लागू होगा और तत्पश्चात शैक्षणिक सत्र 2026-27 से कक्षा IX और X दोनों के लिये लागू होगा।
- पंजाबी शिक्षकों और भाषा संवर्द्धन सोसायटी ने इस निर्णय का स्वागत किया।
- हरियाणा NEP 2020 के तहत त्रिभाषा फार्मूला लागू करने वाला पहला राज्य है।
- अतिरिक्त सुधारों की मांग
- पंजाबी अध्यापक लंबे समय से पदोन्नति का इंतजार कर रहे हैं और उन्होंने आग्रह किया कि उन्हें योग्यता के आधार पर पदोन्नति दी जाए।
- उन्होंने सरकार से हरियाणा बोर्ड के स्कूलों में कक्षा 9 से 12 तक CBSE पंजाबी पाठ्यक्रम लागू करने का आग्रह किया।
- पंजाबी भाषी ज़िलों (पंचकूला, अंबाला, कुरुक्षेत्र, यमुनानगर, फतेहाबाद, सिरसा, करनाल, कैथल) में पंजाबी शिक्षकों की नियुक्ति।
- इन ज़िलों के लिये शिक्षक स्थानांतरण अभियान में प्राथमिकता।
- राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP), 2020 के अनुरूप इन ज़िलों में कक्षा III से पंजाबी को एक विषय के रूप में शुरू किया जाएगा।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020
- परिचय:
- राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 का उद्देश्य भारत की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करते हुए 21वीं सदी के लक्ष्यों और सतत विकास लक्ष्य 4 (SDG 4) को पूरा करने के लिये शिक्षा प्रणाली में सुधार करके भारत की उभरती विकास आवश्यकताओं को पूरा करना है।
- इसने राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1986 का स्थान लिया, जिसे वर्ष 1992 में संशोधित किया गया था।
- मुख्य विशेषताएँ:
- सार्वभौमिक पहुँच: इसका उद्देश्य पूर्वस्कूल से लेकर माध्यमिक स्तर तक शिक्षा तक पहुँच प्रदान करना है।
- प्रारंभिक बाल्यावस्था शिक्षा: 10+2 से 5+3+3+4 प्रणाली में परिवर्तन, जिसमें प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा पर ज़ोर देते हुए 3-6 वर्ष की आयु के बच्चों को स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल किया जाएगा।
- बहुभाषावाद: कक्षा 5 तक शिक्षा के माध्यम के रूप में मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषाओं के उपयोग को बढ़ावा दिया जाएगा, जिसमें संस्कृत और अन्य भाषाओं के लिये विकल्प भी शामिल होंगे। भारतीय सांकेतिक भाषा को मानकीकृत किया जाएगा।
- समावेशी शिक्षा: सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित समूहों, विकलांग बच्चों और "बाल भवनों" की स्थापना के लिये समर्थन पर ज़ोर दिया जाता है।
- सकल नामांकन अनुपात वृद्धि: वर्ष 2035 तक सकल नामांकन अनुपात को 26.3% से बढ़ाकर 50% करने का लक्ष्य, 3.5 करोड़ नई सीटें जोड़ना।