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पर्सपेक्टिव: विश्व जल दिवस 2025 | ग्लेशियर संरक्षण और जल प्रबंधन

  • 02 Apr 2025
  • 12 min read

प्रिलिम्स के लिये:

विश्व जल दिवस, ग्लेशियर, ग्लोबल वार्मिंग, जलवायु परिवर्तन, जल चक्र, समुद्र स्तर में वृद्धि, गंगा, ब्रह्मपुत्र, सिंधु, पर्माफ्रॉस्ट, ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड

मेन्स के लिये:

ग्लेशियरों का महत्त्व, ग्लेशियरों पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव 

चर्चा में क्यों?

प्रतिवर्ष 22 मार्च को मनाए जाने वाले विश्व जल दिवस पर प्रमुख वैश्विक जल मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया जाता है। इस साल ग्लेशियरों (जो सबसे महत्त्वपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्रों में से एक हैं) पर प्रकाश डाला गया। ग्लेशियर और हिम परतें, जिनमें विश्व का लगभग 70% ताज़ा जल संग्रहीत है, वैश्विक जल उपभोग और सुरक्षा में प्रमुख भूमिका निभाते हैं। हालाँकि, बढ़ते वैश्विक तापमान के कारण ये ग्लेशियर तेज़ी से पिघल रहे हैं।

ग्लेशियरों का क्या महत्त्व है? 

  • परिचय 
    • ग्लेशियर में हिम का संचय रहता है जिसका प्रवाह धीरे-धीरे भूमि पर होता है। अधिक ऊँचाई पर, आमतौर पर पिघलने की तुलना में बर्फ का जमाव अधिक होने से इसकी मात्रा में वृद्धि हो जाती है।
    • अंततः, अतिरिक्त हिम का नीचे की ओर प्रवाह होता है। कम ऊँचाई पर आमतौर पर पिघलने की दर अधिक होती है या हिमखंड टूटकर हिम को विखंडित कर देते हैं।
    • उच्च अक्षांशों पर कम सौर विकिरण के कारण ग्लेशियर मुख्य रूप से ग्रीनलैंड, कनाडाई आर्कटिक और अंटार्कटिका जैसे ध्रुवीय क्षेत्रों में मिलते हैं।
    • उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में ग्लेशियर भूमध्य रेखा के पास उच्च ऊँचाई वाली पर्वत शृंखलाओं में मिलते हैं, जैसे कि दक्षिण अमेरिका में एंडीज़।
    • पृथ्वी के कुल जल का लगभग 2% भाग ग्लेशियरों में संग्रहीत है।
    • ग्लेशियर, हिम परतों के किनारों पर भी मौजूद होते हैं। लगभग 20,000 साल पहले, हिमनद की अधिकता (वह समय जब पृथ्वी पर हिम परतें सबसे अधिक क्षेत्र पर थीं) के दौरान, लॉरेंटाइड हिम परत का विस्तार उत्तरी अमेरिका के अधिकांश हिस्से पर था। इस हिम के घनत्व से बेसिन बने जो बाद में जल से भर गए तथा ग्रेट लेक्स बन गए।
    • ग्लेशियरों को विश्व का जल मीनार कहा जाता है जो गंगा, ब्रह्मपुत्र और सिंधु जैसी नदियों को जल प्रदान करते हैं, जिससे विशाल आबादी के लिये कृषि, जल विद्युत एवं पेयजल हेतु जल मिलता है।
    • वर्ल्ड ग्लेशियर मॉनिटरिंग सर्विस (WGMS), जिसके द्वारा 210,000 ग्लेशियरों की निगरानी की जाती है, ने वर्ष 1976 से 2023 तक, विशेष रूप से हाल के वर्षों में ग्लेशियर क्षेत्र में गिरावट पर प्रकाश डाला। 
  • महत्त्व: 
    • मीठे जल का स्रोत: ग्लेशियर मीठे जल के भंडार हैं, जिसमें विश्व का लगभग 70% मीठा जल संग्रहीत है। इस प्रकार ये वैश्विक जल चक्र के लिये अपरिहार्य हैं। ये विश्व भर में अरबों लोगों के लिये पीने, सिंचाई, ऊर्जा उत्पादन और पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं हेतु जल के आवश्यक स्रोत के रूप में कार्य करते हैं।
    • जलवायु संकेतक: ग्लेशियर अतीत की जलवायु के बारे में बहुमूल्य जानकारी प्रदान करते हैं, जिससे ये जलवायु परिवर्तन के महत्त्वपूर्ण संकेतक बन जाते हैं। उनका पिघलना प्रत्यक्ष तौर पर ग्लोबल वार्मिंग और बढ़ते समुद्री जल स्तर से संबंधित है।
    • जल सुरक्षा: हिंदू कुश हिमालय (HKH) और एंडीज़ जैसे क्षेत्रों में ग्लेशियर बड़ी आबादी को जल उपलब्ध कराते हैं। यह जल कृषि, जलविद्युत और दैनिक जीवन के लिये आवश्यक है।
    • पर्यावरणीय और आर्थिक स्थिरता: पर्वतीय क्षेत्रों में कृषि को बनाए रखने के लिये ग्लेशियरों का पिघला हुआ जल महत्त्वपूर्ण है, जो सिंचाई के लिये मौसमी बर्फ पिघलने पर निर्भर है। ये क्षेत्र जलविद्युत उत्पादन के लिये भी ग्लेशियरों पर निर्भर हैं।
    • समुद्र के जल स्तर में योगदान: ग्लेशियरों के पिघलने से समुद्र के जल स्तर में वृद्धि में योगदान मिलता है। इससे तटीय क्षेत्रों पर विनाशकारी प्रभाव पड़ सकता है, जिसमें बाढ़, कटाव और पारिस्थितिकी तंत्र का विनाश शामिल है।

ग्लेशियरों के संरक्षण में क्या चुनौतियाँ हैं? 

  • ग्लेशियरों का तेज़ी से पिघलना: बढ़ते तापमान के कारण ग्लेशियर पहले से कहीं अधिक तेज़ी से पिघल रहे हैं। धूल भरे तूफानों और वनाग्नि से यह समस्या और भी बढ़ जाती है।
  • पर्माफ्रॉस्ट का पिघलना: बढ़ते तापमान के कारण पर्माफ्रॉस्ट तेज़ी से पिघल रहा है, जिससे कार्बनिक और अन्य तत्त्व वातावरण में उत्सर्जित होने से जलवायु परिवर्तन में और वृद्धि हो रही है। इसके पिघलने से पहाड़ी ढलान भी अस्थिर हो रहे हैं, जिससे भूस्खलन का खतरा बढ़ रहा है।
  • अनियमित बर्फबारी पैटर्न: तापमान वृद्धि से बर्फबारी पैटर्न बदल रहा है। इससे जल चक्र बाधित होने के साथ पिघले जल के समय और उपलब्धता पर प्रभाव पड़ता है।
  • ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF): पिघलते हुए ग्लेशियर से हिमनद झीलों का निर्माण होता है जिनके विखंडन से विनाशकारी बाढ़ आ सकती है। इससे निचले इलाकों के समुदायों के साथ बुनियादी ढाँचे को खतरा हो सकता है।
  • राष्ट्रीय जल सुरक्षा चुनौतियाँ: भारत (जिसके हिमालयी क्षेत्र में लगभग 10,000 ग्लेशियर हैं) जल सुरक्षा की गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है। विश्व की 18% आबादी होने के बावजूद, भारत के पास वैश्विक जल संसाधनों का केवल 4% है, जिससे इसकी जल प्रणालियों एवं संसाधनों पर दबाव बढ़ रहा है।
  • जल उपलब्धता में कमी: ग्लेशियरों के पिघलने से विभिन्न क्षेत्रों के लिये दीर्घकालिक जल उपलब्धता में कमी आ रही है। कृषि, जलविद्युत एवं पेयजल के लिये ग्लेशियरों का पिघला हुआ जल महत्त्वपूर्ण है। जल प्रवाह में कमी से निचले क्षेत्रों में जल सुरक्षा का खतरा बढ़ रहा है।

आगे की राह

  • ग्लेशियर संरक्षण और जल संसाधन प्रबंधन: ग्लेशियर संरक्षण के चल रहे प्रयासों को जल प्रबंधन योजनाओं में एकीकृत (विशेष रूप से लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश जैसे क्षेत्रों में) किया जाना चाहिये, ताकि जनसंख्या वृद्धि एवं बढ़ते तापमान की दोहरी चुनौतियों का समाधान किया जा सके।
  • उन्नत पूर्व चेतावनी प्रणालियाँ: GLOF और भूस्खलन जैसी आपदाओं के लिये पूर्व चेतावनी प्रणालियों में निवेश बढ़ाने से संवेदनशील आबादी पर ग्लेशियर से संबंधित खतरों के प्रभाव को कम किया जा सकता है।
  • जन जागरूकता और वैश्विक सहयोग: वर्ष 2025 को अंतर्राष्ट्रीय ग्लेशियर संरक्षण वर्ष और विश्व ग्लेशियर दिवस के रूप में घोषित करने जैसी पहल, ग्लेशियरों के महत्त्व और उन्हें संरक्षित करने के क्रम में तत्काल कार्रवाई की आवश्यकता के बारे में वैश्विक जागरूकता बढ़ाने में निर्णायक हैं।
  • नेशनल मिशन ऑन सस्टेनिंग हिमालयन ईकोसिस्टम (NMSHE): यह पहल, जलवायु परिवर्तन पर भारत की राष्ट्रीय कार्य योजना का हिस्सा है, जो हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र पर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को समझने पर केंद्रित है। इसका उद्देश्य ग्लेशियरों की निगरानी करना तथा इन महत्त्वपूर्ण जल स्रोतों की रक्षा के लिये रणनीति विकसित करना है। 
  • अनियमित बर्फबारी पैटर्न: पेरिस समझौते जैसे वैश्विक जलवायु समझौतों को मज़बूत करके एवं यूरोपीय संघ की उत्सर्जन व्यापार प्रणाली (ETS) जैसे कार्बन मूल्य निर्धारण तंत्र को लागू करके क्षेत्रीय जलवायु को स्थिर करने पर बल देना चाहिये।
  • नीति एकीकरण: राष्ट्रीय तथा क्षेत्रीय जलवायु रणनीतियों, जल प्रबंधन नीतियों और आपदा जोखिम न्यूनीकरण (DRR) ढाँचे के तहत ग्लेशियर संरक्षण को शामिल करने पर बल देना चाहिये।

  यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्षों के प्रश्न (PYQs)  

प्रिलिम्स

प्रश्न. पृथ्वी ग्रह पर जल के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये:

  1. नदियों और झीलों में जल की मात्रा, भू-जल की मात्रा से अधिक है।
  2.  ध्रुवीय हिमच्छद और हिमनदों में जल की मात्रा, भू-जल की मात्रा से अधिक है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1      
(b)  केवल 2
(c)  1 और 2 दोनों  
(d)  न तो 1 और न ही 2

उत्तर: (b)


प्रश्न: भारत के संदर्भ में डीडवाना, कुचामन, सरगोल और खाटू किनके नाम हैं?

(a) हिमनद       
(b)  गरान (मैंग्रोव) क्षेत्र
(c) रामसर क्षेत्र    
(d)  लवण झील

उत्तर: (d)


मेन्स

Q. आर्कटिक की बर्फ और अंटार्कटिका के ग्लेशियरों के पिघलने से पृथ्वी पर मौसम प्रतिरूप और मानवीय गतिविधियों पर किस तरह से अलग-अलग प्रभाव पड़ता है? समझाइए। (2021)

Q. हिमालय के ग्लेशियरों के पिघलने से भारत के जल संसाधनों पर किस प्रकार दूरगामी प्रभाव पड़ेगा? (2020)

Q. हिमालय के सिकुड़ते ग्लेशियरों एवं भारतीय उपमहाद्वीप में जलवायु परिवर्तन के बीच संबंधों पर प्रकाश डालिये। (2014)

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