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डेली न्यूज़

  • 05 Mar, 2025
  • 41 min read
भारतीय अर्थव्यवस्था

उच्च आय अर्थव्यवस्था की ओर भारत

प्रिलिम्स के लिये:

विश्व बैंक, महिला श्रम शक्ति भागीदारी, सकल घरेलू उत्पाद मध्यम आय जाल 

मेन्स के लिये:

भारत का उच्च आय वाली अर्थव्यवस्था बनने का मार्ग, मध्यम आय जाल और भारत के लिये इसके निहितार्थ

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

चर्चा में क्यों?

विश्व बैंक की रिपोर्ट, जिसका शीर्षक है, "बिकमिंग ए हाई इनकम इकॉनमी इन ए जनरेशन (Becoming a High-Income Economy in a Generation)" में इस बात पर प्रकाश डाला गया है कि भारत को वर्ष 2047 तक उच्च आय वाले देश (HIC) का दर्जा प्राप्त करने के लिये अगले 22 वर्षों में 7.8% की औसत वार्षिक वृद्धि दर हासिल करनी होगी। 

  • रिपोर्ट में इस बात पर बल दिया गया है कि इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये महत्त्वाकांक्षी सुधार और उनका प्रभावी कार्यान्वयन आवश्यक होगा।

उच्च आय अर्थव्यवस्था बनने पर रिपोर्ट की मुख्य बिंदु क्या हैं?

  • भारत की आर्थिक यात्रा: वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत की हिस्सेदारी 2000 में 1.6% से बढ़कर वर्ष 2023 में 3.4% हो गई है, जिससे यह विश्व की 5वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगी।
    • महामारी से पहले दो दशकों तक, भारत की अर्थव्यवस्था 6.7% की औसत वार्षिक दर से बढ़ी, जो प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में चीन के बाद दूसरे स्थान पर थी।
  • वर्ष 2047 उच्च आय अर्थव्यवस्था लक्ष्य: भारत वर्ष 2047 तक उच्च आय अर्थव्यवस्था बनने की आकांक्षा रखता है। 
  • इसे प्राप्त करने के लिये, प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय (GNI) को वर्ष 2023 में 2,540 अमेरिकी डॉलर से लगभग 8 गुना बढ़ाना होगा (वर्तमान में भारत निम्न-मध्यम आय वर्ग में है)।
    • वर्ष 2023 में, विश्व बैंक ने 14,005 अमेरिकी डॉलर से अधिक प्रति व्यक्ति GNI वाले देशों को उच्च आय के रूप में तथा 4,516-14,005 अमेरिकी डॉलर के बीच प्रति व्यक्ति GNI वाले देशों को उच्च मध्यम आय के रूप में वर्गीकृत किया है।
  • विकास परिदृश्य: रिपोर्ट में भारत के विकास पथ के लिये तीन संभावित परिदृश्यों की रूपरेखा दी गई है।

परिदृश्य

विकास दर (वास्तविक GDP)

         निष्कर्ष       

सुधार में धीमापन

6% से नीचे

भारत उच्च-मध्यम आय वाला देश बने रहने के साथ HIC से पीछे है।

हमेशा की तरह व्यापार

6.60%

भारत में सुधार तो हुआ है लेकिन यह उच्च आय की स्थिति तक नहीं पहुँच पाया है।

त्वरित सुधार

7.80%

भारत वर्ष 2047 तक उच्च आय वाला देश बन जाएगा।

  • हालाँकि, केवल कुछ ही देश (चिली, रोमानिया, पोलैंड, चेक गणराज्य और स्लोवाकिया) 20 वर्षों के अंदर उच्च आय की स्थिति में परिवर्तित हो पाए हैं जबकि ब्राज़ील, मैक्सिको और तुर्की जैसे देश उच्च-मध्यम आय श्रेणी में ही बने हुए हैं, जिससे यह एक महत्त्वाकांक्षी लेकिन प्राप्त करने योग्य लक्ष्य बन गया है।

HIC दर्जा प्राप्त करने में प्रमुख चुनौतियाँ क्या हैं?

  • घटती निवेश दर: निवेश-सकल घरेलू उत्पाद (GDP) वर्ष 2008 में 35.8% के उच्चतम स्तर पर पहुँच गया, लेकिन वर्ष 2024 में घटकर 27.5% रह गया।
  • FDI चुनौतियाँ: भारत का FDI-GDP अनुपात केवल 1.6% है, जो वियतनाम (5%) और चीन (3.1%) से काफी कम है।
  • श्रम बल भागीदारी में गिरावट: भारत की श्रम बल भागीदारी दर (LFPR) वर्ष 2023 में 55% है, जो अधिकांश उभरती अर्थव्यवस्थाओं (चीन वर्ष 2023 में 65.8%) की तुलना में कम है।
  • कार्यबल में महिलाएँ: महिला श्रम बल भागीदारी (FLFP) वर्ष 2023-24 में सुधरकर 41.7% हो गई है (वैश्विक बेंचमार्क 50% से अधिक है)।
  • रोज़गार सृजन में समस्याएँ: भारत का 45% कार्यबल अभी भी कृषि (प्रच्छन बेरोज़गारी) में संलग्न है, जो कम उत्पादकता वाला क्षेत्र है।
    • इसके विपरीत, कुल रोज़गार में विनिर्माण का हिस्सा लगभग 11% था और आधुनिक बाज़ार सेवाओं का हिस्सा केवल 7% था, जो पूर्वी एशियाई अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में बहुत कम है।
    • वर्ष 2023-24 में, भारत का 73% कार्यबल अनौपचारिक क्षेत्रों में होगा, जबकि अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं में यह आँकड़ा केवल 32.7% है।
  • व्यापार खुलेपन में गिरावट: भारत का निर्यात और आयात सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का 46% (वर्ष 2023) है, जो वर्ष 2012 में 56% था।
  • निम्न वैश्विक मूल्य शृंखला (GVC) भागीदारी: भारत ने मोबाइल फोन निर्यात में महत्त्वपूर्ण लाभ अर्जित किया है, लेकिन उच्च टैरिफ और गैर-टैरिफ बाधाएँ व्यापक व्यापार विस्तार को सीमित कर रही हैं। 
    • भारत का सेवा क्षेत्र (IT और BPO) मज़बूत है, लेकिन विनिर्माण क्षेत्र पिछड़ गया है।

HIC का दर्जा प्राप्त करने के लिये किन प्रमुख सुधारों की आवश्यकता है?

  • निवेश को बढ़ावा देना: वर्ष 2035 तक निवेश दर को सकल घरेलू उत्पाद के 33.5% से ढ़ाकर 40% करना। बेहतर ऋण प्रवाह के लिये वित्तीय क्षेत्र के विनियमन को मज़बूत करना। सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSME) की औपचारिक ऋण तक पहुँच में सुधार करना।
    • दिवालियापन समाधान और अशोध्य ऋण वसूली के लिये तंत्र को मज़बूत करना।
  • अधिक एवं बेहतर नौकरियाँ सृजित करना: वियतनाम (73%) और फिलीपींस (60%)  जैसी अर्थव्यवस्थाओं के समकक्ष श्रम बल भागीदारी बढ़ाना।
    • कृषि प्रसंस्करण, आतिथ्य, परिवहन और केयर इकोनोमी जैसे रोज़गार-समृद्ध क्षेत्रों में निजी क्षेत्र के निवेश को प्रोत्साहित करना।
    • कुशल कार्यबल का विस्तार करना और वित्त तक पहुँच में सुधार करना। आधुनिक विनिर्माण और उच्च मूल्य सेवाओं को मज़बूत करना।
  • वैश्विक व्यापार प्रतिस्पर्द्धात्मकता को बढ़ावा देना: निर्यातोन्मुख क्षेत्रों में निवेश करना और GVC में एकीकृत करना।
  • कार्यबल को औपचारिक बनाना: अनौपचारिक रोज़गार को कम करने और बेहतर मज़दूरी स्थितियों को बढ़ावा देने के लिये श्रम कानूनों का सरलीकरण।
  • मानव पूंजी और नवाचार को मज़बूत करना: उद्योग की आवश्यकताओं के अनुरूप माध्यमिक विद्यालय में नामांकन और व्यावसायिक प्रशिक्षण को बढ़ाना।

मिडिल इनकम ट्रैप

  • परिचय: विश्व बैंक (वर्ष 2007) द्वारा गढ़ा गया मिडिल इनकम ट्रैप उन अर्थव्यवस्थाओं को संदर्भित करता है जो तेज़ी से बढ़ती हैं लेकिन उच्च आय की स्थिति तक पहुँचने में विफल रहती हैं। यह उन देशों पर लागू होता है जिनकी प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय 1,000 से 12,000 अमेरिकी डॉलर (वर्ष 2011 की कीमतों) के बीच है।
    • मिडिल इनकम ट्रैप में फंसे देशों को बढ़ती श्रम लागत, कमज़ोर नवाचार, आय असमानता, जनसांख्यिकीय चुनौतियों और विशिष्ट उद्योगों पर अत्यधिक निर्भरता से जूझना पड़ता है, जिससे विकास में बाधा उत्पन्न होती है।
  • भारत के ट्रैप में फंसने का जोखिम: भारत विश्व के सबसे असमान देशों में से एक है, जहाँ शीर्ष 10% आबादी के पास कुल राष्ट्रीय आय का 57% हिस्सा है। शेष 50% लोगों का हिस्सा घटकर 13% रह गया है। 
    • उच्च GST और कॉर्पोरेट कर में कटौती से धनी लोगों को लाभ होता है, जिससे यह अंतर और बढ़ जाता है।
    • भारत में स्थिर या घटती मज़दूरी, मुद्रास्फीति, उच्च घरेलू ऋण और कम बचत के साथ मिलकर, देश को मिडिल इनकम ट्रैप के दुष्चक्र हेतु असुरक्षित बना दिया है।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न: भारत को उच्च आय वाली अर्थव्यवस्था में बदलने के लिये कौन से प्रमुख सुधार आवश्यक हैं? 

  यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा, पिछले वर्ष के प्रश्न (PYQs)  

प्रिलिम्स:

प्रश्न: 'व्यापार सुगमता सूचकांक (Ease of Doing Business Index)' में भारत की रैंकिंग समाचार-पत्रों में कभी-कभी दिखती है।  निम्नलिखित में से किसने इस रैंकिंग की घोषणा की है? (2016)

  1. आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (OECD)
  2.  विश्व आर्थिक मंच
  3.  विश्व बैंक
  4.  विश्व व्यापार संगठन (WTO)

उत्तर: C


प्रश्न. निरपेक्ष तथा प्रति व्यक्ति वास्तविक GNP में वृद्धि आर्थिक विकास की ऊँची स्तर का संकेत नहीं करती, यदि: (2018)

(a) औद्योगिक उत्पादन कृषि उत्पादन के साथ-साथ बढ़ने में विफल रह जाता है।
(b) कृषि उत्पादन औद्योगिक उत्पादन के साथ-साथ बढ़ने में विफल रह जाता है।
(c) निर्धनता और बेरोज़गारी में वृद्धि होती है।
(d) निर्यात की अपेक्षा आयात तेज़ी से बढ़ता है।

उत्तर: (c)


प्रश्न. किसी दिये गए वर्ष में भारत के कुछ राज्यों में आधिकारिक गरीबी रेखाएँ अन्य राज्यों की तुलना में उच्चतर हैं क्योंकि: (2019)

(a) गरीबी की दर अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग होती है।
(b) कीमत- स्तर अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग होता है।
(c) सकल राज्य उत्पाद अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग होता है।
(d) सार्वजनिक वितरण की गुणवत्ता अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग होती है।

उत्तर: (b)


मेन्स:

प्रश्न. "सुधार के बाद की अवधि में औद्योगिक विकास दर सकल-घरेलू-उत्पाद (जीडीपी) की समग्र वृद्धि से पीछे रह गई है" कारण बताइये। औद्योगिक नीति में हालिया बदलाव औद्योगिक विकास दर को बढ़ाने में कहाँ तक ​​सक्षम हैं? (2017)

प्रश्न. आमतौर पर देश कृषि से उद्योग और फिर बाद में सेवाओं की ओर स्थानांतरित हो जाते हैं, लेकिन भारत सीधे कृषि से सेवाओं की ओर स्थानांतरित हो गया। देश में उद्योग की तुलना में सेवाओं की भारी वृद्धि के क्या कारण हैं? क्या मज़बूत औद्योगिक आधार के बिना भारत एक विकसित देश बन सकता है? (2014)


कृषि

भारत के कृषि-निर्यात को बढ़ावा

प्रिलिम्स के लिये:

खाद्य मुद्रास्फीति, दालें, सैनिटरी एवं फाइटोसैनिटरी (SPS), व्यापार में तकनीकी बाधाएँ (TBT), MSP, WTO, डेवलपमेंट बॉक्स, FTA, कृषि निर्यात नीति (AEP) 2018

मेन्स के लिये:

भारत के कृषि निर्यात की प्रवृत्तियाँ, संबंधित चुनौतियाँ एवं आगे की राह।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

चर्चा में क्यों?

भारत का कृषि निर्यात 6.5% बढ़कर 37.5 बिलियन अमेरिकी डॉलर (अप्रैल-दिसंबर 2024) हो गया है जबकि आयात 18.7% बढ़कर 29.3 बिलियन अमेरिकी डॉलर हो गया, जिससे कृषि व्यापार अधिशेष में कमी आई है।

भारत के कृषि निर्यात से संबंधित क्या प्रवृत्तियाँ हैं?

  • कपास व्यापार में बदलाव: भारत अब कपास का शुद्ध आयातक बन गया है तथा पहले का इसका निर्यातक का दर्जा समाप्त हो गया है।
    • कभी अमेरिका के बाद दूसरे सबसे बड़े निर्यातक रहे भारत का कपास निर्यात वर्ष 2011-12 के 4.3 बिलियन अमेरिकी डॉलर से घटकर वर्ष 2023-24 में 1.1 बिलियन अमेरिकी डॉलर रह गया।
  • कृषि व्यापार अधिशेष में कमी आना: भारत का कृषि व्यापार अधिशेष वर्ष 2013-14 में 27.7 बिलियन अमेरिकी डॉलर के उच्चतम स्तर पर पहुँच गया, जो वर्ष 2023-24 में घटकर 16 बिलियन अमेरिकी डॉलर रह गया।
  • वैश्विक स्तर पर वस्तुओं की कीमतों का प्रभाव: वर्ष 2013-14 और वर्ष 2019-20 के बीच वैश्विक खाद्य कीमतों में गिरावट से भारत की कृषि-निर्यात प्रतिस्पर्द्धात्मकता में कमी आई है। 
    • कोविड-19 और रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि हुई, जिससे वर्ष 2022-23 में निर्यात बढ़कर 53.2 बिलियन अमेरिकी डॉलर हो गया। 
  • निर्यात की प्रमुख वस्तुएँ: 
    • समुद्री उत्पाद: भारत के प्रमुख कृषि निर्यात के संदर्भ में वर्ष 2023-24 में समुद्री उत्पादों के निर्यात में गिरावट आई है तथा वर्ष 2024-25 में भी गिरावट जारी रहने का अनुमान है।
    • चीनी और गेहूँ: घरेलू खाद्य मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के उद्देश्य से सरकारी प्रतिबंधों के कारण वर्ष 2023-24 में चीनी और गेहूँ के निर्यात में कमी आई।
    • चावल: सफेद चावल पर प्रतिबंध एवं उबले चावल पर निर्यात शुल्क के बावजूद चावल (विशेषकर गैर-बासमती) का निर्यात मज़बूत बना रहा।
      • बासमती चावल, मसाले, कॉफी और तंबाकू का निर्यात वर्ष 2024-25 में रिकॉर्ड ऊँचाई पर पहुँचने का अनुमान है।
    • नकदी फसलें: प्रतिकूल मौसम के कारण ब्राज़ील, वियतनाम एवं जिम्बाब्वे जैसे प्रमुख उत्पादकों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने के कारण कॉफी एवं तंबाकू के निर्यात में वृद्धि हुई है।
    • अन्य: भारत ने मिर्च, मिंट उत्पाद, जीरा, हल्दी, धनिया, सौंफ आदि के विश्व के अग्रणी निर्यातक के रूप में अपनी स्थिति मज़बूत कर ली है। 
  • प्रमुख आयात वस्तुएँ: 
    • खाद्य तेल: वर्ष 2024-25 में खाद्य तेल का आयात (मुख्य रूप से रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण) कीमतों में बढ़ोतरी के कारण सबसे अधिक रहने का अनुमान है।
    • दालें: घरेलू उत्पादन में वृद्धि के कारण दालों का आयात औसतन 1.7 बिलियन अमेरिकी डॉलर (2018-23) रहा, लेकिन वर्ष 2023-24 में दालों के कम उत्पादन के कारण वर्ष 2024-25 में इसके 5 बिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक रहने की संभावना है। 
  • प्रमुख गंतव्य: 
    • निर्यात: 
      • एशिया: वर्ष 2023 में, भारत ने 48 बिलियन अमेरिकी डॉलर के कृषि उत्पादों का निर्यात किया, जिसमें ग्लोबल साउथ (75%) और एशिया (58%) प्रमुख बाज़ार थे।
        • चीन और संयुक्त अरब अमीरात ने भारतीय कृषि उत्पादों में 3-3 बिलियन अमेरिकी डॉलर का आयात किया, जबकि वियतनाम ने 2.6 बिलियन अमेरिकी डॉलर का आयात किया।
      • यूरोप: भारतीय कृषि निर्यात में यूरोप का योगदान 12.6% है, जिसमें मुख्य रूप से तंबाकू, ताजे फल और सजावटी पौधे शामिल हैं।
      • अमेरिका: भारतीय कृषि निर्यात में अमेरिका का योगदान 13.4% है, जिसमें मुख्य रूप से चावल (बासमती और गैर-बासमती), तिल और ताजे फल शामिल हैं।
      • अफ्रीका: भारत के कुल कृषि निर्यात में अफ्रीका का योगदान 15% है।
    • आयात: 
      • वैश्विक दक्षिण: वैश्विक दक्षिण भारत के कृषि-आयात का 48% आपूर्ति करता है, जिसमें ब्राज़ील, चीन, मैक्सिको, अर्जेंटीना और इंडोनेशिया का स्थान है।
      • विकसित अर्थव्यवस्थाएँ: शीर्ष तीन आपूर्तिकर्त्ता अमेरिका, नीदरलैंड और जर्मनी हैं। 

कृषि संबंधी स्टार्ट-अप:

Agri_Start_Ups

और पढ़ें: कृषि निर्यात नीति क्या है?

भारत के कृषि निर्यात के समक्ष चुनौतियाँ क्या हैं?

  • नॉन टैरिफ बैरियर्स (NTB): विकसित देश व्यापार के लिये कठोर सैनिटरी और फाइटोसैनिटरी (SPS) और तकनीकी बाधाएँ (TBT) लगाते हैं, जिससे भारतीय कृषि निर्यात के लिये व्यापार बाधाएँ उत्पन्न होती हैं। उदाहरण के लिये
    • भारत के बासमती चावल और चाय के निर्यात को कीटनाशक संदूषण के कारण यूरोपीय प्रतिबंधों का सामना करना पड़ा है।
    • जापान ने पुष्प उत्पादों में कीटों के प्रति शून्य सहनशीलता के नियम के तहत भारत से कटे हुए फूलों के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया है, हालाँकि ऐसे कीट जापान में भी पाए जाते हैं।
  • अनुचित समान अवसर: विकसित देशों द्वारा अपने किसानों को दी जाने वाली कृषि सब्सिडी तथा भारतीय कृषि निर्यात पर उच्च टैरिफ के कारण भारतीय किसानों को नुकसान होता है। 
    • अमेरिका प्रति किसान को सालाना 61,286 अमेरिकी डॉलर प्रदान करता है, जबकि भारत केवल 282 अमेरिकी डॉलर प्रदान करता है, जिससे वैश्विक कीमतें कम हो रही हैं तथा भारतीय किसानों को नुकसान हो रहा है।
  • भारत की MSP] नीति के लिये चुनौतियाँ: अमेरिका, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे विकसित देश WTO में यह दावा करते हुए भारत की MSP को चुनौती देते हैं कि यह AOA के तहत 10% की सीमा (एम्बर बॉक्स) से अधिक है, जिससे विवादित कार्यवाही का खतरा है।
    • भारत विकासशील देशों के लिये AOA के 'डेवलपमेंट बॉक्स' के अंतर्गत असीमित इनपुट सब्सिडी प्रदान कर सकता है, लेकिन विकसित देश इसे प्रतिबंधित करना चाहते हैं, जिससे छोटे किसानों की आजीविका को खतरा हो सकता है।
  • FTA से संबंधित चुनौतियाँ: सिंगापुर, आसियान और जापान जैसे देशों के साथ भारत के FTA से आयातित कृषि उत्पादों पर टैरिफ कम हो जाता है, किसानों के लिये नई प्रौद्योगिकियों को अपनाना तथा बुनियादी ढाँचे में निवेश में बाधा उत्पन्न होती है, जिससे वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा कम हो जाती है।
  • बार-बार निर्यात प्रतिबंध: मूल्य असंतुलन को नियंत्रित करने के लिये भारत द्वारा लगाए गए निर्यात प्रतिबंध विदेशी आयातकों और फसलोत्तर प्रबंधन तथा खाद्य प्रसंस्करण में घरेलू निवेश को बाधित करते हैं।
    • प्याज पर बार-बार प्रतिबंध लगाने से आपूर्ति शृंखला बाधित होती है तथा वैश्विक बाज़ार में भारत की विश्वसनीयता कम होती है, जिससे आयात साझेदारों को विकल्प तलाशने पड़ते हैं।

WTO_Agreement_on_Agriculture

आगे की राह

  • बाज़ार आसूचना इकाइयाँ स्थापित करना: सरकार को अंतर्राष्ट्रीय निर्यात मांग पर वास्तविक समय डेटा प्रदान करने के लिये बाह्य बाज़ार आसूचना इकाइयाँ स्थापित करनी चाहिये, जिससे किसानों और निर्यातकों को वैश्विक बाज़ार की जरूरतों को पूरा करने में मदद मिल सके। 
  • कृषि-तकनीक स्टार्टअप को समर्थन: भारत का विशाल कृषि क्षेत्र स्टार्टअप को व्यापार क्षमता को अधिकतम करने के लिये पैमाने, विस्तार और नवाचार के अवसर प्रदान करता है।
  • निर्यात बाज़ारों में विविधता लाना: भारत को अफ्रीका, दक्षिण-पूर्व एशिया और मध्य-पूर्व में डेयरी, पोल्ट्री, सब्जियों और फलों को प्राथमिकता देते हुए नए उत्पादों और बाज़ारों की खोज करनी चाहिये।
    • महामारी के बाद सुपरफूड्स (जैसे बाजरा) और हर्बल उत्पादों की बढ़ती मांग को देखते हुए, भारत को उनकी कृषि और प्रसंस्करण को बढ़ावा देना चाहिये।
  • SPS उपायों का अनुपालन: भारत को कृषि-मूल्य शृंखला प्रतिभागियों (अपस्ट्रीम और डाउनस्ट्रीम दोनों) को SPS अनुपालन के बारे में शिक्षित करना चाहिये तथा गुणवत्ता और वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मकता को बढ़ावा देने के लिये प्रसंस्करण बुनियादी ढाँचे का विकास करना चाहिये।
    • सहकारी समितियाँ और FPO कीट नियंत्रण, अवशेष प्रबंधन और स्वच्छता पर कार्यशालाओं के माध्यम से किसानों को SPS विनियमों, खाद्य सुरक्षा और सर्वोत्तम प्रथाओं के बारे में शिक्षित करते हैं।
  • कृषि-जलवायु क्लस्टर विकसित करना: निर्यातोन्मुख फसलों की कृषि के लिये उपयुक्त कृषि-जलवायु क्षेत्रों की पहचान करने से उत्पादकता और गुणवत्ता को अनुकूलतम बनाया जा सकेगा। 
  • विश्वसनीय व्यापार नीति स्थापित करना: भारत को निर्यात प्रतिबंधों के बार-बार लागू होने को कम करने के लिये अपनी कृषि व्यापार नीति को सुव्यवस्थित करने की आवश्यकता है।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न: वैश्विक कृषि व्यापार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने के लिये भारत को क्या कदम उठाने चाहिये?

  UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष प्रश्न (PYQ)  

प्रिलिम्स

प्रश्न 1. भारतीय कृषि में परिस्थितियों के संदर्भ में, "संरक्षण कृषि" की संकल्पना का महत्त्व बढ़ जाता है। निम्नलिखित में से कौन-कौन से संरक्षण कृषि के अंतर्गत आते हैं? (2018)  

  1. एकधान्य कृषि पद्धतियों का परिहार  
  2.  न्यूनतम जोत को अपनाना  
  3.  बागानी फसलों की खेती का परिहार  
  4.  मृदा धरातल को ढकने के लिये फसल अवशिष्ट का उपयोग  
  5.  स्थानिक एवं कालिक फसल अनुक्रमण

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:

(a)  1,3 और 4
(b)  2,3,4 और 5
(c)  2, 4 और 5
(d)  1, 2,3 और 5 

उत्तर: (c)


मेन्स

प्रश्न: फसल विविधीकरण के समक्ष वर्तमान चुनौतियाँ क्या हैं? उभरती प्रौद्योगिकियाँ फसल विविधीकरण का अवसर कैसे प्रदान करती हैं??(2021)

प्रश्न: भारत में कृषि उत्पादों के परिवहन एवं विपणन में मुख्य बाधाएँ क्या हैं? (2020)


सामाजिक न्याय

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिव्यांगता अधिकारों को मूल अधिकार माना जाना

प्रिलिम्स के लिये:

RPwD अधिनियम 2016, मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम 2017, PM-DAKSH (दिव्यांग कौशल विकास और पुनर्वास योजना), सुगम्य भारत अभियान, दीनदयाल दिव्यांग पुनर्वास योजना, दिव्यांग छात्रों के लिये राष्ट्रीय फैलोशिप

मेन्स के लिये:

भारत में दिव्यांगता अधिकार, चुनौतियाँ, भारत में दिव्यांग व्यक्तियों को सशक्त बनाने के उपाय।

स्रोत: इकोनाॅमिक टाइम्स

चर्चा में क्यों?

सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया है कि दृष्टिबाधित उम्मीदवार न्यायिक सेवा परीक्षाओं में भाग ले सकते हैं तथा इस बात पर बल दिया है कि दिव्यांगजन अधिकार (RPwD) अधिनियम, 2016 के तहत दिव्यांगता आधारित भेदभाव के खिलाफ अधिकार को मौलिक अधिकार माना जाना चाहिये।

न्यायिक सेवाओं में दिव्यांगता अधिकारों पर सर्वोच्च न्यायालय का क्या निर्णय है?

  • भेदभावपूर्ण प्रावधानों को समाप्त करना: हाल ही में यह निर्णय मध्य प्रदेश न्यायिक सेवा परीक्षा नियम, 1994 एवं राजस्थान न्यायिक सेवा नियम, 2010 से संबंधित याचिकाओं पर निर्णय लेते हुए दिया गया तथा इन्हें RPwD अधिनियम के साथ संरेखित किया गया।
    • मध्य प्रदेश न्यायिक सेवा नियम, 1994 के नियम 6A को रद्द कर दिया गया क्योंकि इसमें शैक्षिक योग्यता के बावजूद दृष्टिबाधित अभ्यर्थियों को शामिल नहीं किया गया था।
  • दिव्यांगता अधिकारों की मान्यता: न्यायिक सेवाओं से दृष्टिबाधित उम्मीदवारों को बाहर करना संविधान में प्रदत्त समानता (अनुच्छेद 14) और भेदभाव के प्रतिषेध (अनुच्छेद 15) के अधिकार का उल्लंघन है।
  • सकारात्मक कार्रवाई: न्यायालय ने फैसला सुनाया कि राज्य को परोपकार-आधारित दृष्टिकोण के बजाय अधिकार-आधारित दृष्टिकोण अपनाना चाहिये ताकि रोज़गार तक समान पहुँच सुनिश्चित हो सके।
    • इस निर्णय में इस बात पर बल दिया गया कि दिव्यांगजनों (PwD) को उचित सुविधाएँ (पीठ ने इंद्रा साहनी निर्णय का हवाला दिया, जिसमें चयन प्रक्रिया में दृष्टिबाधित उम्मीदवारों के लिये अलग कट-ऑफ निर्धारित करने का निर्देश दिया गया) प्रदान की जानी चाहिये, जैसा कि दिव्यांगजनों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (UNCRPD) और RPwD अधिनियम, 2016 द्वारा अनिवार्य किया गया है।
    • इसमें पर्याप्त संख्या में दिव्यांग उम्मीदवार उपलब्ध न होने पर अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवारों के समान पात्रता मानदंडों में छूट की अनुमति दी गई।

दिव्यांगजनों से संबंधित ऐतिहासिक मामले  

  • सुचिता श्रीवास्तव बनाम चंडीगढ़ प्रशासन, 2009: इसमें न्यायालय ने मानसिक रूप से मंद महिला के प्रजनन अधिकारों को बरकरार रखा।  
  • भारत सरकार बनाम रवि प्रकाश गुप्ता, 2010: सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय सुनाया कि पूर्वनिर्धारित रोज़गार मानदंडों का उपयोग दृष्टिबाधित उम्मीदवारों को आरक्षण से वंचित करने के लिये नहीं किया जा सकता है, ताकि निष्पक्ष नियुक्तियाँ सुनिश्चित हो सकें।  
  • भारत संघ बनाम राष्ट्रीय दृष्टिहीन संघ, 2013: स्पष्ट किया गया कि 3% आरक्षण कुल कैडर क्षमता में रिक्तियों पर लागू होता है, न कि केवल चिन्हित पदों पर। 
  • डीफ कर्मचारी कल्याण संघ बनाम भारत संघ, 2013: श्रवण बाधित सरकारी कर्मचारियों के लिये समान परिवहन भत्ता देने का निर्देश दिया गया, साथ ही दिव्यांगजनों के बीच भेदभाव न किया जाना सुनिश्चित किया गया। 
  • ओम राठौड़ बनाम स्वास्थ्य सेवा महानिदेशक मामला, 2024: सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि उम्मीदवार की क्षमताओं के कार्यात्मक मूल्यांकन को कठोर पात्रता मानदंडों पर प्राथमिकता दी जानी चाहिये।

भारत में दिव्यांगजनों की स्थिति क्या है?

  • 2011 की जनगणना के अनुसार, दिव्यांगजनों की संख्या कुल जनसंख्या का 2.21% (2.68 करोड़) है।
    • RPwD अधिनियम, 2016 के अनुसार, दिव्यांगता के 21 मान्यता प्राप्त प्रकार हैं, जिनमें दृष्टि बाधित, श्रवण बाधित, मूक दिव्यांगता, बौद्धिक नि:शक्तता, बहु नि:शक्तता, मानसिक मंदता और बौनापन आदि शामिल हैं।
  • दिव्यांगजनों के लिये संवैधानिक प्रावधान:
  • पंचायतों और नगर पालिकाओं की ज़िम्मेदारियाँ:
    • 11वीं अनुसूची: दिव्यांगजनों सहित सामाजिक कल्याण पर ध्यान केंद्रित करती है (अनुच्छेद 243-G की प्रविष्टि 26)।
    • 12 वीं अनुसूची: दिव्यांगजनों सहित कमज़ोर वर्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करती है (अनुच्छेद 243-W की प्रविष्टि 9)।
  • दिव्यांगता अधिकार से संबंधित कानून:
    • RPwD अधिनियम, 2016: इसका उद्देश्य समान अवसर सुनिश्चित करना, अधिकारों की रक्षा करना और दिव्यांगजनों की पूर्ण भागीदारी को सक्षम बनाना है।
  • राष्ट्रीय ट्रस्ट अधिनियम, 1999: इस अधिनियम के द्वारा अन्य मामलों के अलावा ऑटिज्म, सेरेब्रल पाल्सी, मानसिक मंदता और बहु नि:शक्तताओं से ग्रस्त व्यक्तियों के कल्याण हेतु एक राष्ट्रीय निकाय की स्थापना की गई।
  • मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017: यह अधिनियम मानसिक बीमारी से पीड़ित व्यक्तियों के अधिकारों और सम्मान की रक्षा करता है।

भारत में दिव्यांगजनों के समक्ष क्या चुनौतियाँ हैं?

  • सामाजिक बाधाएँ: दिव्यांगजनों को अक्सर रोज़गार, शिक्षा और पर्याप्त आय प्राप्त करने में चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, जिससे उनके अपने अधिकारों का पूर्णतः प्रयोग करने में बाधा उत्पन्न होती है।
    • पूर्वाग्रह, भेदभाव, भय और रूढ़िवादिता सामाजिक एकीकरण में बाधा डालते है तथा बहिष्कार एवं अकेलेपन के दुष्चक्र को बढ़ावा देते हैं।
  • परिवहन बाधाएँ: दिव्यांगता पर विश्व रिपोर्ट के अनुसार, परिवहन प्रणालियों, निर्मित पर्यावरण में दुर्गमता, समाज में स्वतंत्र रूप से कार्य करने की दिव्यांगजनों की क्षमता को महत्त्वपूर्ण रूप से सीमित करती है। 
  • संचार बाधाएँ: सुनने, बोलने, पढ़ने या लिखने में अक्षम दिव्यांगजनों को गैर-मौखिक संचार कौशल की अनुपस्थिति जैसे गैर-प्रभावी संचार चैनलों के कारण प्रभावी संचार में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
  • नीतिगत और कार्यक्रम संबंधी बाधाएँ: असुविधाजनक समय-सारिणी और सुलभ उपकरणों की कमी जैसी चुनौतियाँ आवश्यक सार्वजनिक स्वास्थ्य देखभाल कार्यक्रमों के क्रियान्वयन में बाधा डालती हैं।
  • अंतर्विभागीय हाशियाकरण: दिव्यांग महिलाओं को लिंग और दिव्यांगता के आधार पर दोहरे भेदभाव का सामना करना पड़ता है, जिससे शिक्षा, रोज़गार और स्वास्थ्य सेवा तक उनकी पहुँच सीमित हो जाती है।
    • दिव्यांग जनसंख्या का 69% हिस्सा ग्रामीण क्षेत्रों में रहता है, जहाँ सहायक प्रौद्योगिकियों के अभाव में उन्हें अधिक बहिष्कार का सामना करना पड़ता है।

आगे की राह

  • प्रभावी मुख्यधारा की नीतियाँ और सेवाएँ: हितधारकों को सामान्य सार्वजनिक गतिविधियों और सेवाओं में दिव्यांगजनों की समान भागीदारी सुनिश्चित करनी चाहिये।
    • पुनर्वास और सहायता सेवाओं में अधिक निवेश की आवश्यकता है। उदाहरण के लिये, व्हीलचेयर, श्रवण यंत्र और सफेद छड़ी जैसे सहायक उपकरण दिव्यांगों की स्वतंत्रता को बढ़ाते हैं।
  • मानव संसाधन क्षमता में वृद्धि: भारतीय पुनर्वास परिषद (RCI) को दिव्यांगता -संबंधी सेवाओं में लगे पेशेवरों की योग्यता को प्रभावी ढंग से विनियमित करने और बढ़ाने के लिये प्रशिक्षण प्रक्रिया में तेज़ी लानी चाहिये।
    • जापान के डॉन कैफे में दिव्यांग कर्मचारियों को रोबोट वेटरों को दूर से नियंत्रित करने के लिये नियुक्त किया गया है, जिससे समावेशी रोज़गार के अवसर पैदा हुए हैं। भारत को दिव्यांग व्यक्तियों के लिये रोज़गार सुलभता बढ़ाने के लिये इसी तरह की प्रथाओं को अपनाना चाहिये।
  • दिव्यांगता के बारे में सार्वजनिक जागरूकता बढ़ाना: सार्वजनिक जागरूकता बढ़ाने से नकारात्मक धारणाओं को चुनौती दी जा सकती है और सामाजिक और मनोवृत्ति संबंधी बाधाओं को तोड़ा जा सकता है। 
    • शैक्षिक संस्थानों को समावेशिता और विविधता को बढ़ावा देना चाहिये, तथा यह सुनिश्चित करना चाहिये कि दिव्यांग व्यक्तियों के लिये आवश्यक भाषा कौशल सक्षम व्यक्तियों को भी सिखाया जाए, जिससे समावेशी संचार को बढ़ावा मिले।
  • दिव्यांगता डेटा संग्रह में सुधार: आयु, लिंग और सामाजिक-आर्थिक स्थिति के आधार पर बेहतर डेटा संग्रह से दिव्यांगजनों के सामने आने वाली बाधाओं की समझ में सुधार होगा।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न: दिव्यांगता आधारित भेदभाव के विरुद्ध अधिकार पर सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय सार्वजनिक सेवाओं में समावेशिता की दिशा में एक प्रगतिशील कदम है। दिव्यांग व्यक्तियों के सामने आने वाली विभिन्न चुनौतियों पर चर्चा कीजिये तथा आगे के सुधारों के लिये उपाय सुझाइए।

  UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न  

प्रिलिम्स

प्रश्न.  भारत लाखों दिव्यांग व्यक्तियों का घर है। कानून के अंतर्गत उन्हें क्या लाभ उपलब्ध हैं? (2011)

  1. सरकारी स्कूलों में 18 साल की उम्र तक मुफ्त स्कूली शिक्षा।
  2.   व्यवसाय स्थापित करने के लिये भूमि का अधिमान्य आवंटन।
  3.   सार्वजनिक भवनों में रैंप।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1                
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3       
(d) 1, 2 और 3

उत्तर: (d)


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