भारतीय अर्थव्यवस्था
भारत का ऑटोमोबाइल क्षेत्र
प्रिलिम्स के लिये:मेक इन इंडिया, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश, चाइना प्लस वन, PM ई-बस सेवा, FAME-II मेन्स के लिये:भारत में ऑटोमोबाइल क्षेत्र का विकास, भारत में इलेक्ट्रिक वाहन के स्वीकरण संबंधी चुनौतियाँ और अवसर |
स्रोत: पी.आई.बी.
चर्चा में क्यों?
‘मेक इन इंडिया’ पहल के तहत भारत के ऑटोमोबाइल क्षेत्र में वर्ष 2023-24 में रिकॉर्ड स्तर की संवृद्धि दर्ज की गई है, जहाँ कुल उत्पादन बढ़कर 28 मिलियन यूनिट हो गया है और इसी क्रम में यह क्षेत्र विशेष रूप से इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) के लिये एक वैश्विक विनिर्माण केंद्र में रूपांतरित हो रहा है।
भारत के ऑटोमोबाइल क्षेत्र का विकास पथ किस प्रकार रहा है?
- प्रारंभिक उदारीकरण (1991 के बाद): वर्ष 1991 में ऑटोमोबाइल उद्योग को लाइसेंस मुक्त कर दिया गया और उसके बाद स्वचालित मार्ग से 100% प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की अनुमति दी गई।
- इससे सुजुकी, हुंडई और होंडा जैसे वैश्विक निर्माताओं के लिये भारत में उत्पादन इकाइयाँ स्थापित करना सुकर हुआ।
- उत्पादन में वृद्धि: वाहनों का उत्पादन 2 मिलियन यूनिट (1991-92) से बढ़कर 28 मिलियन (2023-24) हो गया।
- अर्थव्यवस्था में योगदान: भारत के ऑटोमोटिव उद्योग का आवर्त 240 बिलियन अमरीकी डॉलर है और इस क्षेत्र का भारत के सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 6% का योगदान है तथा इससे लगभग 30 मिलियन रोज़गार (4.2 मिलियन प्रत्यक्ष और 26.5 मिलियन अप्रत्यक्ष) का सर्जन हुआ।
- ऑटो कंपोनेंट उद्योग: भारत के ऑटो कंपोनेंट उद्योग का सकल घरेलू उत्पाद में 2.3% का योगदान है और इससे प्रत्यक्ष रूप से 1.5 मिलियन लोगों को रोज़गार प्राप्त होता है।
- वित्त वर्ष 24 में, उद्योग का आवर्त 6.14 लाख करोड़ रुपए (74.1 बिलियन अमरीकी डॉलर) हो गया, जिसका 54% आपूर्ति घरेलू मूल उपकरण निर्माताओं और 18% निर्यात का था।
- वित्त वर्ष 2016-24 की 8.63% की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) से बढ़ते हुए, वित्त वर्ष 24 में निर्यात बढ़कर 21.2 बिलियन अमरीकी डॉलर हो गया और अनुमानतः वर्ष 2026 तक यह बढ़कर 30 बिलियन अमरीकी डॉलर हो जाएगा।
- इलेक्ट्रिक वाहन के उपयोग में वृद्धि: अगस्त 2024 तक कुल EV पंजीकरण 4.4 मिलियन से अधिक था। EV का बाज़ार में योगदान 6.6% रहा।
- व्यापार:
- निर्यात विस्तार: वित्त वर्ष 24 में निर्यात 4.5 मिलियन यूनिट हो गया। भारत का ऑटो कंपोनेंट निर्यात यूरोप, उत्तरी अमेरिका और एशिया में सर्वाधिक है।
- आयात: ऑटो कंपोनेंट उद्योग ने वर्ष 2023-24 के दौरान 21.2 बिलियन अमरीकी डॉलर का निर्यात किया और 20.9 बिलियन अमरीकी डॉलर मूल्य के कंपोनेंट का आयात किया, जिसके परिणामस्वरूप 300 मिलियन अमरीकी डॉलर का व्यापार अधिशेष हुआ।
- FDI और निवेश: भारत को 36 बिलियन अमरीकी डॉलर का FDI (2020-2024) प्राप्त हुआ, और वित्त वर्ष 28 तक, भारतीय ऑटो उद्योग ने देशज रूप से इलेक्ट्रिक मोटर्स और स्वचालित ट्रांसमिशन विकसित करने के उद्देश्य से आयात में कमी लाने और "चाइना प्लस वन" रणनीति का लाभ उठाने के लिये 7 बिलियन अमरीकी डॉलर के निवेश की योजना बनाई है।
मेक इन इंडिया के अंतर्गत ऑटो क्षेत्र की प्रमुख पहलें कौन-सी हैं?
- योजनाएँ:
- भारत में हाइब्रिड और इलेक्ट्रिक वाहनों को तेज़ी से अपनाने तथा विनिर्माण (FAME इंडिया) योजना चरण- II के अंतर्गत 16.15 लाख इलेक्ट्रिक वाहनों के लिये प्रोत्साहन और 10,985 चार्जिंग स्टेशनों को स्वीकृति देने के साथ इलेक्ट्रिक वाहनों के स्वीकरण हेतु सहायता प्रदान की गई।
- PLI-ऑटो (ऑटो और घटकों के लिये उत्पादन संबद्ध प्रोत्साहन) के अंतर्गत EV और हाइड्रोजन ईंधन-सेल घटकों सहित उन्नत ऑटोमोटिव प्रौद्योगिकी (AAT) को बढ़ावा दिया जाता है।
- PLI-ACC (एडवांस्ड केमिस्ट्री सेल बैटरी मैन्युफैक्चरिंग) का लक्ष्य 50 गीगावाट घंटे (GWh) बैटरी विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र (चार फर्मों को 40 जीडब्ल्यूएच आवंटित) निर्मित करना है।
- अभिनव वाहन संवर्द्धन में PM इलेक्ट्रिक ड्राइव क्रांति (2024-2026) के अंतर्गत EV, ई-ट्रकों, ई-बसों और चार्जिंग यूनिटों हेतु सहायता प्रदान की जाती है।
- PM ई-बस सेवा योजना (वित्त वर्ष 2024-29) का लक्ष्य 38,000 से अधिक ई-बसों की सुविधा प्रदान करना है।
- नीतिगत उपाय: वित्त मंत्रालय ने इलेक्ट्रिक वाहनों पर जीएसटी को 12% से घटाकर 5% कर दिया है तथा आवास एवं शहरी मामलों के मंत्रालय ने निजी एवं वाणिज्यिक भवनों में इलेक्ट्रिक वाहन चार्जिंग स्टेशनों को अनिवार्य बनाने के क्रम में मॉडल बिल्डिंग बाय लॉज, 2016 में संशोधन किया है।
भारत के ऑटोमोबाइल क्षेत्र के समक्ष क्या चुनौतियाँ हैं?
- आयात पर निर्भरता: भारत लिथियम-आयन सेल और सेमीकंडक्टर जैसे प्रमुख EV घटकों के आयात पर निर्भर है, जिससे लागत एवं आपूर्ति वैश्विक व्यवधानों के प्रति संवेदनशील होने से आत्मनिर्भरता सीमित हो जाती है।
- EV का सीमित प्रसार: भारत में EV का प्रसार वैश्विक स्तर पर 12% और चीन के 30% की तुलना में कम है। इसके अतिरिक्त, जीएसटी में कटौती के बावजूद बैटरी और वाहन की लागत अधिक बनी हुई है।
- विशेष रूप से टियर-2/3 शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में सीमित चार्जिंग अवसंरचना जैसी चिंताएँ वित्त वर्ष 30 तक इसके 20% प्रसार के लक्ष्य को प्राप्त करने में बाधक हैं।
- कुशल कार्यबल की कमी: व्यापक श्रम बाज़ार के बावजूद इस उद्योग में स्वचालन तथा ईंधन सेल और हाइड्रोजन तकनीक में कुशल श्रमिकों की कमी है।
- सख्त उत्सर्जन मानदंड: आगामी कॉर्पोरेट औसत ईंधन दक्षता (CAFE III और IV) मानक (2027-2032) के तहत सख्त कार्बन उत्सर्जन सीमाओं को आरोपित किया जाएगा, जिससे वाहन निर्माताओं पर महँगी प्रौद्योगिकी अपनाने का दबाव बनेगा।
- इससे आंतरिक दहन इंजन (ICE) वाहनों की कीमतों में वृद्धि होने की संभावना है, क्योंकि निर्माता स्वच्छ प्रौद्योगिकियों में निवेश कर रहे हैं।
- साझा आवागमन और सार्वजनिक परिवहन: राइड-शेयरिंग ऐप्स और बेहतर सार्वजनिक परिवहन विकल्पों के कारण कार की मांग में कमी आने से वाहनों की बिक्री प्रभावित हो सकती है।
भारत अपने ऑटोमोटिव क्षेत्र के विकास और स्थिरता को किस प्रकार गति दे सकता है?
- ऑटो घटकों का स्थानीयकरण: खान मंत्रालय के राष्ट्रीय महत्त्वपूर्ण खनिज मिशन के माध्यम से दुर्लभ मृदा तत्त्व और लिथियम के घरेलू उत्पादन में तेज़ी लाने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिये।
- बुनियादी ढाँचे को बढ़ावा देना: नीति आयोग की सिफारिश के अनुसार, शहर की योजना के साथ EV चार्जिंग बुनियादी ढाँचे को एकीकृत किया जाना चाहिये, विशेष रूप से स्मार्ट शहरों और शहरी परिवहन केंद्रों में।
- EV आपूर्ति शृंखला में MSME और स्टार्टअप्स को समर्थन देने के लिये ग्रीन मोबिलिटी क्रेडिट गारंटी फंड बनाना चाहिये।
- सर्कुलर अर्थव्यवस्था को बढ़ावा: नीति आयोग द्वारा अनुशंसित बैटरी स्वैपिंग फ्रेमवर्क को लागू करना चाहिये।
- अंतिम-मील तक EV को बढ़ावा देने के क्रम में हरित लॉजिस्टिक्स नीतियों को अपनाने के साथ लॉजिस्टिक्स दक्षता संवर्द्धन कार्यक्रम (LEEP) पर बल देना चाहिये।
- नीतिगत सामंजस्य: राष्ट्रीय इलेक्ट्रिक मोबिलिटी मिशन योजना के लक्ष्यों के साथ संरेखित करने के लिये राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों में EV नीतियों को सुव्यवस्थित करना (वर्ष 2020 से प्रतिवर्ष हाइब्रिड एवं EV वाहनों का 6-7 मिलियन तक का बिक्री लक्ष्य प्राप्त करना) चाहिये।
- व्यापार में सुलभता के लिये राष्ट्रीय एकल खिड़की प्रणाली (NSWS) का उपयोग करके विनियामक अनुमोदनों को डिजिटल बनाना चाहिये।
- ICV से EV में परिवर्तन: वित्तीय एवं तकनीकी सहायता के साथ CAFE III और IV का समर्थन (विशेष रूप से MSME के संदर्भ में) करना चाहिये।
- कौशल भारत मिशन और राष्ट्रीय प्रशिक्षुता संवर्द्धन योजना के अंतर्गत लक्षित पुनः कौशलीकरण के माध्यम से ICV पारिस्थितिकी तंत्र में श्रम विस्थापन की समस्या का समाधान करना चाहिये।
- पुराने ICV के रिटायरमेंट को प्रोत्साहित करने एवं EV खरीद के लिये छूट प्रदान करके वाहन स्क्रैपेज नीति को EV के प्रसार के साथ संरेखित करना चाहिये।
दृष्टि मुख्य परीक्षा प्रश्न: प्रश्न: भारत को वैश्विक ऑटोमोबाइल विनिर्माण केंद्र में परिवर्तित करने में 'मेक इन इंडिया' पहल की भूमिका का विश्लेषण कीजिये। |
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्नप्रश्न: भारत सरकार द्वारा विनिर्माण क्षेत्र के विकास को बढ़ावा देने हेतु हाल ही में कौन सी पहल/पहलें की गई है/हैं? (2012)
नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये: (a) केवल 1 उत्तर: (d) मेन्सप्रश्न. भारत में तीव्र आर्थिक विकास के लिये कुशल और किफ़ायती शहरी जन परिवहन कैसे महत्त्वपूर्ण है? (2019) |


भारतीय राजव्यवस्था
अवमानना पर भारतीय और अमेरिकी न्यायालय
प्रिलिम्स के लिये:न्यायालय की अवमानना, सर्वोच्च न्यायालय (SC), भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI), न्यायालय की अवमानना अधिनियम, 1971, उच्च न्यायालय, ज़िला न्यायालय। मेन्स के लिये:भारतीय संविधान की अन्य देशों से तुलना, अमेरिका और भारत की अवमानना कार्यवाही में अंतर, भारतीय न्यायपालिका में न्यायालय की अवमानना |
स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस
चर्चा में क्यों?
अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा विदेशी सहायता रोकने के अमेरिकी डिस्ट्रिक्ट कोर्ट के निर्णय की अवज्ञा ने न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच तनाव को उज़ागर किया है, जिससे शक्तियों के पृथक्करण और संभावित अवमानना कार्यवाही पर चिंताएँ बढ़ गई है।
- यह स्थिति इस बात पर प्रकाश डालती है कि विभिन्न लोकतांत्रिक प्रणालियों में न्यायालय, विशेष रूप से अमेरिका और भारत में, न्यायिक आदेशों का अनुपालन कैसे सुनिश्चित करते हैं।
अमेरिकी और भारतीय न्यायालयों की संरचना और अधिकार क्षेत्र
- 3 स्तरीय न्यायालय प्रणाली: अमेरिकी संघीय न्यायालय प्रणाली में 3 स्तर हैं: डिस्ट्रिक्ट कोर्ट (परीक्षण न्यायालय), सर्किट कोर्ट (अपील न्यायालय) और सुप्रीम कोर्ट (अंतिम अपीलीय प्राधिकारी)।
- भारत में भी त्रिस्तरीय प्रणाली है जिसमें सबसे नीचे ज़िला न्यायालय, उसके बाद उच्च न्यायालय और फिर सर्वोच्च न्यायालय, जो अपील का सर्वोच्च न्यायालय है।
- क्षेत्राधिकार और संरचना: संघीय कानून या अमेरिकी संविधान द्वारा अनुमत मामलों की सुनवाई संघीय न्यायालय द्वारा की जाती है।
- डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में न्यायाधीशों की नियुक्ति आजीवन होती है तथा वे सिविल और फौजदारी दोनों मामलों की सुनवाई करते हैं।
- सर्किट कोर्ट डिस्ट्रिक्ट कोर्ट की अपीलों पर सुनवाई करते हैं और 3 न्यायाधीशों का एक पैनल मामलों की समीक्षा करता है।
- सुप्रीम कोर्ट उच्चतम न्यायालय है, जो संवैधानिक और संघीय मामलों पर अपीलों की सुनवाई करता है, तथा उसे उत्प्रेषण रिट के माध्यम से विवेकाधीन क्षेत्राधिकार प्राप्त है।
- भारत में, भारतीय न्यायालय संविधान, IPC (भारतीय न्याय संहिता), CrPC (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) और राज्य कानूनों के तहत मामलों का निपटान करती हैं।
- अमेरिकी संघीय और भारतीय सर्वोच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार: भारतीय सर्वोच्च न्यायालय को अमेरिकी संघीय न्यायालय की तुलना में अधिक व्यापक क्षेत्राधिकार प्राप्त है, जिसमें संघ और राज्यों के बीच विवादों पर अनन्य मूल क्षेत्राधिकार (अनुच्छेद 131) और सलाहकार क्षेत्राधिकार (अनुच्छेद 143) है, जो राष्ट्रपति को सार्वजनिक महत्त्व के मामलों पर कानूनी राय लेने की अनुमति देता है, जो अमेरिकी प्रणाली में अनुपस्थित है।
- इसके अतिरिक्त, भारत के सर्वोच्च न्यायालय के पास व्यापक अपीलीय शक्तियाँ, न्यायिक समीक्षा है और यह जनहित याचिका (PIL) की अनुमति देता है, जिससे यह अधिक सुलभ और प्रभावशाली हो जाता है।
भारत और अमेरिकी न्यायालयों में अवमानना शक्तियों में क्या अंतर है?
- परिचय: न्यायालय की अवमानना न्यायपालिका को अनुचित आलोचना से बचाने तथा इसके अधिकार को कमजोर करने वालों को दंडित करने के लिये एक कानूनी तंत्र है।
- अवमानना के प्रकार:
- अमेरिकी न्यायालय में अवमानना के 2 प्रकार हैं: सिविल अवमानना (आदेशों का अनुपालन न करना), आपराधिक अवमानना (न्याय में बाधा, अवज्ञा)।
- अमेरिका में सिविल अवमानना को अनुपालन के आधार पर प्रतिवर्तित किया जा सकता है, जबकि आपराधिक अवमानना सख्त है लेकिन राष्ट्रपति द्वारा क्षमा योग्य है।
- न्यायालयों ने अवमानना के लिये अधिकारियों को दंडित किया है, लेकिन किसी वर्तमान राष्ट्रपति को कभी नहीं।
- भारतीय न्यायालय में भी अवमानना के 2 प्रकार हैं: सिविल अवमानना (न्यायालय के आदेशों की अवज्ञा), आपराधिक अवमानना (न्यायालय को बदनाम करना, न्याय में बाधा डालना)।
- भारत के मामले में, अवमानना की कार्यवाही या तो न्यायालय द्वारा स्वयं (स्वतः संज्ञान से) या अटॉर्नी जनरल (AG) की पूर्वानुमति से व्यक्ति की याचिका द्वारा शुरू की जा सकती है।
- अमेरिकी न्यायालय में अवमानना के 2 प्रकार हैं: सिविल अवमानना (आदेशों का अनुपालन न करना), आपराधिक अवमानना (न्याय में बाधा, अवज्ञा)।
- विधिक प्रावधान:
- अमेरिका में, न्यायपालिका अधिनियम, 1789 सभी न्यायालयों को अवमानना शक्तियों, प्रतिबंधों और कानूनी तंत्रों के माध्यम से आदेशों को लागू करने का अधिकार देता है।
- भारत में, अनुच्छेद 129 के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय को स्वयं की अवमानना के लिये दंडित किये जाने का प्राधिकार प्रदान किया गया है, जबकि उच्च न्यायालयों को यह शक्ति अनुच्छेद 215 के अंतर्गत प्रदान की गई है, जिनके पास अधीनस्थ न्यायालयों की अवमानना हेतु भी दंडित करने का अधिकार है।
- न्यायालय अवमान अधिनियम (1971) में न्यायालयों को अवमानना कार्यवाही करने और डिक्री के माध्यम से आदेशों को प्रवर्तित करने का प्राधिकार दिया गया है।
- अपवाद: कोई भी व्यक्ति किसी ऐसे मामले के गुणागुण पर निष्पक्ष टिप्पणी प्रकाशित करने के लिये अवमानना का दोषी नहीं होगा, जिसकी सुनवाई हो चुकी है और अंतिम रूप से निर्णय किया जा चुका है।
- न्यायालयों की अवमानना शक्ति एवं प्रवर्तन: अमेरिका में संघीय न्यायालय अवमानना कार्यवाही और वकील प्रतिबंधों के माध्यम से अनुपालन सुनिश्चित करते हैं।
- भारत में, न्यायालय अवमानना कार्यवाही के माध्यम से अनुपालन सुनिश्चित करते हैं।
अनुपालन, शास्ति और अधिकारियों की संप्रभु उन्मुक्ति
- अमेरिका में, न्यायाधीश वार्ता को प्राथमिकता देते हैं क्योंकि संप्रभु उन्मुक्ति के कारण अधिकारियों पर शास्तियों अधिरोपण सीमित होता है। वे संघीय अधिकारियों पर कदाचित ही वित्तीय शास्तियाँ अथवा कारावास का दंड अधिरोपित करते हैं।
- अमेरिका में संप्रभु उन्मुक्ति की स्थिति प्रबल है, जिसके अंतर्गत सरकार की सहमति के बिना उसके विरुद्ध मुकदमा नहीं किया जा सकता है, तथा अर्हित उन्मुक्ति के अंतर्गत अधिकारियों को व्यक्तिगत दायित्व से संरक्षण प्रदान किया गया है बशर्ते वे संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन न करें।
- अमेरिकी संविधान में न्यायालय के आदेशों का अनुपालन आवश्यक विनिर्दिष्ट किया गया है। गंभीर मामलों में, अनुनपालन तब होता है जब सरकार विधिमान्यता को स्वीकार करती है लेकिन फिर भी अनुपालन करने से इनकार कर देती है। उदाहरण के लिये, गृहयुद्ध के दौरान, अब्राहम लिंकन ने जॉन मेरीमैन मामले (बिना आरोप के निरुद्ध किया गया) में विधिमान्यता स्वीकार की किंतु न्यायालय के आदेश की अवहेलना की।
- अमेरिकी न्यायाधीश न्यायालय आदेशों पर प्रत्यक्ष प्रतिरोध का वर्जन करते हैं तथा अनुपालन सुनिश्चित करने के लिये मांगों में बदलाव करने को प्राथमिकता देते हैं।
- भारतीय न्यायालयों को दंडात्मक प्राधिकार प्राप्त हैं, जिनमें जुर्माना, कारावास और सरकारी पदाधिकारियों का प्रत्यक्ष समन शामिल है।
- सिविल प्रक्रिया संहिता (CrPC) के तहत, न्यायालयों में डिक्री और आदेशों के निष्पादन के प्रावधान हैं, जिनमें संपत्ति की कुर्की और इरादतन अनुपालन न करने के मामलों में गिरफ्तारी भी शामिल है।
- भारत में संप्रभु प्रतिरक्षा (अनुच्छेद 300 में निहित) विद्यमान है किंतु यह सुदृढ़ नहीं है, जिससे विभिन्न मामलों में सरकार के खिलाफ मुकदमा करने का विकल्प मिलता है।
- अधिकारियों को बहुव्यापी अथवा पूर्ण उन्मुक्ति नहीं प्रदान की गई है और उन्हें व्यक्तिगत रूप से जवाबदेह ठहराया जा सकता है। भारतीय न्यायालयों को अवमानना के लिये अधिक सशक्त शक्तियाँ प्राप्त हैं, जिसके तहत वे अननुपालन के लिये अधिकारियों पर जुर्माना अधिरोपित कर सकते हैं, उन्हें समन भेज सकते हैं अथवा कारावास से दंडित कर सकते हैं।
- न्यायिक समीक्षा:
- अमेरिकी न्यायालय विधियों की व्याख्या कर सकते हैं, लेकिन कार्यपालिका की कार्रवाइयों को आसानी से रद्द नहीं कर सकते।
- भारत में न्यायिक समीक्षा सुव्यवस्थित रूप से स्थापित है, जिससे न्यायालयों को असंवैधानिक कार्यों को रद्द करने की सुविधा प्राप्त होती है (उदाहरण के लिये, केशवानंद भारती मामला, 1973)।
निष्कर्ष
हालाँकि अमेरिका और भारत दोनों ही देशों में न्यायपालिका को न्यायालय के आदेशों को प्रवर्तित करने के उद्देश्य से महत्त्वपूर्ण शक्तियाँ प्रदान की गई हैं किंतु भारत की प्रणाली में व्यापक संवैधानिक प्रावधान शामिल हैं। अमेरिका अपनी अवमानना शक्तियों और संघीय प्रवर्तन संस्थाओं पर अत्यधिक निर्भर है। इन भिन्नताओं के होते हुए भी दोनों ही देश विधि सम्मत शासन सुनिश्चित करने के उद्देश्य से न्यायिक निर्णयों का पालन किये जाने के सिद्धांत को अक्षुण्ण रखते हैं।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्नप्रश्न. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2022)
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? (a) केवल 1 और 2 उत्तर: (b) |


जैव विविधता और पर्यावरण
सीसा विषाक्तता
प्रिलिम्स के लिये:सीसा, सीसा विषाक्तता, प्लंबिज्म, सैचुरिज्म, एनीमिया, भारी धातु, संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB)। मेन्स के लिये:पर्यावरण प्रदूषण एवं क्षरण, सीसा विषाक्तता एवं संबंधित चिंताएँ |
स्रोत: बिज़नेस लाइन
चर्चा में क्यों?
भारत में सीसा विषाक्तता एक महत्त्वपूर्ण लेकिन उपेक्षित सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट बना हुआ है, जो विशेष रूप से बच्चों को प्रभावित कर रहा है। यद्यपि विभिन्न क्षेत्रों में सीसा संदूषण को विनियमित करने वाले अनेक कानून हैं, तथापि इसकी रोकथाम और शमन के लिये व्यापक कानूनी ढाँचे का अभाव प्रभावी प्रवर्तन और नीतिगत सुसंगतता में बाधा डालता है।
सीसा (Lead)
- सीसा एक विषैली, प्राकृतिक रूप से पाई जाने वाली भारी धातु है, जो अपनी तन्यता, आघातवर्धनीयता तथा नीले-सफेद रंग की चमक के कारण जानी जाती है, तथा इसके संपर्क का कोई सुरक्षित स्तर निर्धारित नहीं किया गया है।
- विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने सीसे को सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिये चिंता के प्रमुख 10 रसायनों में से एक माना है।
- वर्ष 2021 में, विश्व स्वास्थ्य संगठन ने दिशा-निर्देश जारी किये थे, जिसमें सिफारिश की गई थी कि जिन व्यक्तियों के रक्त में सीसे का स्तर ≥5 µg/dL है, उनका जोखिम स्रोतों के लिये मूल्यांकन किया जाना चाहिये, और उन्हें समाप्त करने के लिये कदम उठाए जाने चाहिये।
- सीसा-आधारित पेंट, सीसा उत्सर्जन का एक प्रमुख वैश्विक स्रोत बना हुआ है। WHO और UNEP के ग्लोबल अलायंस टू एलिमिनेट लीड पेंट ने देशों से कानूनी प्रतिबंध लागू करने का आग्रह किया है; हालाँकि, जनवरी 2024 तक, केवल 48% ने ही ऐसे कानून बनाए हैं।
सीसा विषाक्तता क्या है?
- परिचय: सीसा विषाक्तता (जिसे प्लम्बिज्म और सैचुरिज्म के नाम से भी जाना जाता है ) तब होती है जब सीसा समय के साथ शरीर में संचित हो जाता है, आमतौर पर महीनों या वर्षों में, जिसके परिणामस्वरूप विषाक्त प्रभाव उत्पन्न होते हैं।
- सीसा विषाक्तता की स्थिति: सीसा विश्वभर में 1/3 बच्चों को विषाक्त कर रहा है।
- वर्ष 2020 की यूनिसेफ-प्योर अर्थ रिपोर्ट में पाया गया कि भारत के आधे बच्चों के रक्त में सीसे का स्तर (BLL) उच्च है। लगभग 275 मिलियन बच्चों में यह स्तर विश्व स्वास्थ्य संगठन की सुरक्षित सीमा (5 μg/dL) से अधिक है, तथा 64.3 मिलियन बच्चों में यह स्तर इससे भी अधिक (10 μg/dL से अधिक) है।
- CSIR-नीति आयोग की रिपोर्ट: 23 राज्यों में अनुशंसित 5 µg/dL BLL सीमा पार हो गई है।
- सीसा विषाक्तता के कारण भारत के सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 5% का नुकसान होता है।
- स्रोत:
- लक्षण एवं प्रभाव: लक्षणों में थकान, पेट दर्द, मतली, दस्त, भूख न लगना, एनीमिया, मांसपेशियों में कमज़ोरी और मसूड़ों पर एक काली रेखा (Dark Line) शामिल हैं।
पारा विषाक्तता क्या है?और पढ़ें: पारा विषाक्तता |
भारत में सीसा विषाक्तता से निपटने के लिये नीतिगत उपाय क्या हैं?
- मौजूदा नीतिगत उपाय/कानूनी प्रावधान:
- सीसायुक्त पेट्रोल पर प्रतिबंध (वर्ष 2000): भारत ने सीसायुक्त पेट्रोल को चरणबद्ध तरीके से समाप्त कर दिया, जिससे वायुजनित सीसा प्रदूषण, स्वास्थ्य जोखिम और पर्यावरणीय क्षति में कमी आई। इस परिवर्तन से इंजन नाॅकिंग, वाहन की दक्षता और इंजन की दीर्घजीविता बढ़ाने में सुधार करने में भी मदद मिली, जो स्वच्छ ईंधन और बेहतर वायु गुणवत्ता के लिये वैश्विक प्रयासों के साथ संरेखित है।
विनियम |
प्रावधान |
पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 |
यह केंद्र सरकार (CPCB) को अपशिष्टों और प्रदूषकों के लिये अनुमेय सीमा निर्धारित करके सीसा संदूषण को विनियमित करने का अधिकार देता है। |
कारखाना अधिनियम, 1948 |
यह श्रमिकों के स्वास्थ्य और सुरक्षा को सुनिश्चित करता है, तथा सीसे का उपयोग करने वाले उद्योगों में सीसे की विषाक्तता को अप्रत्यक्ष रूप से संबोधित करता है। अध्याय III श्रमिकों की सुरक्षा, कल्याण और स्वच्छता पर केंद्रित है।
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भवनों में जल आपूर्ति के लिये आचार संहिता, 1957 |
यह घरेलू जलापूर्ति के लिये सीसे की पाइपों पर प्रतिबंध लगाता है, जल में सीसे की मात्रा 10 µg/L निर्धारित करता है। हालाँकि, इसमें फ्लशिंग और ओवरफ्लो सिस्टम के लिये सीसे की पाइपिंग की अनुमति प्रदान की गई है।
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कीटनाशी अधिनियम, 1968 |
इसमें सुरक्षा और प्रभावकारिता के लिये कीटनाशकों के आयात, निर्माण, बिक्री और उपयोग के संबंध में प्रावधान किये गए हैं।
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खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006 |
इसमें FSSAI को खाद्य सुरक्षा को विनियमित करने और भोजन {जैसे, हल्दी (10), पत्तेदार सब्जियाँ (0.3), दालें (0.2), चीनी (5.0), शिशु आहार (0.2), आदि} और पेयजल (BIS के अनुसार 0.01 मिलीग्राम/लीटर) में सीसे की सीमा निर्धारित करने का प्राधिकार दिया गया है।
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परिसंकटमय अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 |
इसमें सीसा-युक्त अपशिष्ट को वर्गीकृत किया गया है तथा इसके भंडारण, उपचार और निपटान का प्रावधान किया गया है, जिसके लिये उद्योगों को SPCB/PCC प्राधिकरण प्राप्त करना आवश्यक होता है।
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औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 |
इनमें सौंदर्य प्रसाधनों में सीसे की मात्रा 20 ppm निर्धारित की गई है, तथा निर्माताओं और आयातकों के लिये उचित घटक लेबलिंग का अनुपालन अनिवार्य कर दिया गया है। |
बालक श्रम अधिनियम, 1986 |
इसमें परिसंकटमय वातावरण में बाल श्रम पर प्रतिबंध लगाया गया है जिससे सीसा विषाक्तता को कम करने में मदद मिलती है। |
भारतीय मानक ब्यूरो अधिनियम, 2016 |
इसके अंतर्गत वस्तुओं का मानकीकरण, अंकन और गुणवत्ता प्रमाणन सुनिश्चित करते हुए BIS को भारत के राष्ट्रीय मानक निकाय के रूप में नामित किया गया है।
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लीड विनियमन के कार्यान्वयन में क्या चुनौतियाँ हैं?
- कीटनाशकों में सीसा: कीटनाशी अधिनियम, 1968, में अभी भी लेड आर्सेनेट कीटनाशी के रूप में सूचीबद्ध है, जबकि स्वास्थ्य और पर्यावरणीय जोखिमों के कारण कृषि मंत्रालय द्वारा वर्ष 2019 की प्रतिबंधित कीटनाशकों की सूची में इसे प्रतिबंधित किया गया है।
- खाद्य उत्पादों में सीसा: FSSAI ने हल्दी में लेड क्रोमेट पर प्रतिबंध लगा दिया है, लेकिन 10 ppm सीसे के उपयोग की अनुमति दी है, जो एक नियामकीय खामी है, जिससे प्रतिबंध के बावजूद सीसे का संदूषण जारी है।
- पेंट्स में सीसा: वर्ष 2016 के नियमों में नए पेंट्स में सीसे की मात्रा को सीमित किया गया है, लेकिन घरों के मौजूदा सीसा-आधारित पेंट के संबंध में कोई प्रावधान नहीं किया गया।
- जल संदूषण: भवनों में जल आपूर्ति के लिये आचार संहिता (1957) और PVC पाइपों में लीड स्टेबलाइज़र नियम (2021) का प्रवर्तन सुदृढ़ता से नहीं हुआ है।
आगे की राह
- सुदृढ़ विधिक ढाँचा: पर्यावरण संरक्षण अधिनियम (EPA), 1986 के तहत नियमों का एक ऐसा समर्पित सेट प्रस्तुत किया जाना चाहिये जो व्यापक विधिक कवरेज सुनिश्चित करने के लिये सीसा उत्पादन, पुनर्चक्रण और निपटान को विनियमित करता है।
- सुरक्षित रक्त सीसा स्तर (BLL) का निर्धारण: नीतिगत हस्तक्षेपों का मार्गदर्शन करने के लिये विश्व स्वास्थ्य संगठन की अनुशंसाओं के अनुरूप BLL के लिये एक राष्ट्रीय सीमा निर्धारित कर उसका क्रियान्वन किया जाना चाहिये।
- व्यावसायिक सुरक्षा मानक: सीसा-संबंधित उद्योगों में श्रमिकों की सुरक्षा के लिये सर्वोत्तम वैश्विक प्रथाओं का अंगीकरण किया जाना चाहिये, जैसे कि अमेरिका का व्यावसायिक सुरक्षा और स्वास्थ्य प्रशासन (OSHA) विनियम तथा ब्रिटेन का कार्यस्थल पर सीसा नियंत्रण विनियम (2002)।
- सुदृढ़ प्रवर्तन: विशेष रूप से उद्योगों, जल आपूर्ति और खिलौना विनिर्माण में, यूरोपीय संघ के खिलौना सुरक्षा निर्देश मानकों के संरेखण में अननुपालन के लिये स्पष्ट दंड निर्धारित किये जाने की आवश्यकता है।
- सार्वजनिक जागरूकता और बाज़ार प्रोत्साहन: सुरक्षित विकल्पों को प्रोत्साहित करने के लिये कर प्रोत्साहन और व्यापक स्तर पर सार्वजनिक जागरूकता अभियानों के माध्यम से सीसा रहित उत्पादों को बढ़ावा देने की आवश्यकता है।
निष्कर्ष
सीसा विषाक्तता का प्रभावी रूप से निवारण करने हेतु, एक व्यापक विनियामक ढाँचा, सुदृढ़ प्रवर्तन और जन जागरूकता पहल आवश्यक हैं। स्वास्थ्य पर इसके गंभीर जोखिमों को दृष्टिगत रखते हुए, भारत में सीसा विषाक्तता को शीर्ष लोक स्वास्थ्य प्राथमिकता के रूप में माना जाना चाहिये।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्नप्रश्न. शरीर में श्वास अथवा खाने से पहुँचा सीसा (लेड) स्वास्थ्य के लिये हानिकारक होता है। पेट्रोल में सीसे का योग प्रतिबंधित होने के बाद से अब सीसे की विषाक्तता उत्पन्न करने वाले स्रोत कौन-कौन से हैं? (2012) 1- प्रगलन इकाइयाँ नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये: (a) केवल 1, 2 और 3 उत्तर: (b) |

