हिम विगलन और जलवायु व्यवधान | 24 Feb 2025

प्रिलिम्स के लिये:

आर्कटिक सागर, अंटार्कटिक सागर, महासागर का तापमान, सौर विकिरण, महासागर की लवणता, महासागर परिसंचरण, झेलम, करेवा, गुज्जर-बकरवाल  

मेन्स के लिये:

समुद्री हिम का विगलन और महासागर एवं जलवायु पर इसका प्रभाव, भारत पर निवर्तनी हिमनदों का प्रभाव

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

चर्चा में क्यों?

अमेरिकी नेशनल स्नो एंड आइस डेटा सेंटर (NSIDC) के अनुसार, आर्कटिक और अंटार्कटिक सागर के हिम क्षेत्र सहित वैश्विक हिम आवरण फरवरी 2025 में घटकर 15.76 मिलियन वर्ग किमी. रह गया है।

  • NASA के अनुसार, वर्ष 1981 से वर्ष 2010 की अवधि में आर्कटिक सागर के हिम आवरण में प्रति दशक 12.2% की दर से विगलन हुआ है।
  • इसके अतिरिक्त, हिमालय के हिमनदों के निवर्तन से भारत का जम्मू-कश्मीर (J&K) प्रतिकूल रूप से प्रभावित हो रहा है।

समुद्री हिम क्या है?

  • परिचय: समुद्री हिम मुक्‍तप्रवाही ध्रुवीय हिम है जिसका शीत ऋतु में विस्तारण और ग्रीष्म ऋतु में विगलन होता है तथा यह अंशतः वर्ष भर बनी रहती है।
    • यह मुख्यतः आर्कटिक महासागर और अंटार्कटिका महासागर में पाई जाती है।
  • विशेषताएँ: समुद्री हिम हिमित लवणीय जल से बनती है, जबकि हिमखंड, ग्लेशियर और हिम परत थल पर उत्पन्न होती हैं।
    • समुद्री हिम बनने पर अधिकांश लवण बाहर निकल जाता है, जिससे समुद्री हिम समुद्री जल की तुलना में अल्प लवणीय हो जाता है।
    • शेष लवण छोटे-छोटे खंडों में रह जाता है, जिससे हिम की एक छिद्रयुक्त संरचना बनती है। 

क्लिक टू रीड: ग्लेशियर क्या हैं?

आर्कटिक और अंटार्कटिक सागर के हिम आवरण में गिरावट के क्या कारण हैं?

  • विलंबित हिमन: असामान्य रूप से ऊष्ण महासागरीय तापमान के कारण शीतलन प्रक्रिया मंद हो गई, जिससे हिम निर्माण में देरी हुई। उदाहरण के लिये, हडसन खाड़ी (उत्तरपूर्वी कनाडा) के समीप धीमी गति से हिम का निर्माण।
  • समुद्री उष्ण तरंगें (MHW): आर्कटिक MHW और तापित गल्फ स्ट्रीम्स से आर्कटिक की ओर अतिरिक्त उष्णता का गमन होता है और समुद्री हिम का विगलन होता है जिससे आर्कटिक सागर के हिम आवरण में गिरावट होती है।
  • हिम विभंजी पवनें: बैरेंट्स सागर और बेरिंग सागर में आए तूफानों से हिम का विभंजन हुआ, जिससे उनके विगलन की संभावना बढ़ गई।
    • अंटार्कटिक सागर का हिम आवरण विशेष रूप से हिम विभंजी पवनों के प्रति सुभेद्य है क्योंकि यह समुद्र में प्रवहमान रहती है जिससे पवनों द्वारा इसका विभंजन सरलता से  हो जाता है। उदाहरण के लिये, कोलोसस A23a एक विशाल अंटार्कटिक हिमखंड है जो 2020 से दक्षिणी महासागर में प्रवहमान है।
  • हिम में कमी: आर्कटिक की हिम समय के साथ पतली और भंगुर होती जा रही है, जिससे तूफानों और तापमान परिवर्तनों के प्रति इसकी संवेदनशीलता बढ़ गई है।
    • उष्ण वायु के कारण अंटार्कटिका की हिम की चादर (आइस शेल्फ) के किनारे पिघलने लगे, जो सागर तक फैले हुए थे।

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  • उच्च वायु तापमान: स्वालबार्ड, नॉर्वे जैसे क्षेत्रों में सामान्य से अधिक तापमान का अनुभव हुआ, जिसके कारण समुद्री हिम में अतिरिक्त कमी आई।
    • दक्षिणी गोलार्द्ध की गर्मियों के अंत में वायु और जल के तापमान में वृद्धि के कारण अंटार्कटिक क्षेत्र में हिम के पिघलने की गति तीव्र हो गई।

आर्कटिक और अंटार्कटिक सागर के हिम आवरण में गिरावट के परिणाम क्या हैं?

  • ग्लोबल वार्मिंग में वृद्धि: समुद्री हिम के आवरण में कमी का अर्थ है कि जल सूर्य के संपर्क में आ रहा है और जल द्वारा अधिक ऊष्मा ( सौर विकिरण ) अवशोषित हो रही है, जिससे जल के तापमान में और वृद्धि हो रही है।
    • 1980 के दशक के प्रारम्भ से मध्य तक चमकदार और परावर्तक हिम (Bright And Reflective Ice) में कमी आने के कारण ध्रुवीय समुद्री हिम ने अपने प्राकृतिक शीतलन प्रभाव का लगभग 14% हिस्सा खो दिया है।
  • वैश्विक महासागरीय परिसंचरण में व्यवधान: समुद्री हिम पिघलने से स्वच्छ जल निसृत होता है, जिससे सागरीय लवणता और सतही जल घनत्व में कमी आती है। 
    • इससे महासागरीय परिसंचरण धीमा हो जाता है, जिससे सागरीय पारिस्थितिकी तंत्र और वैश्विक जलवायु पैटर्न बाधित हो जाता है।
  • जलवायु विनियमन की हानि: समुद्री हिम, सागर की सतह पर एक इन्सुलेटिंग कैप बनाकर वाष्पीकरण और वायुमंडल में ऊष्मा की हानि को कम करके ग्रह को शीतल करती है। हिम में कमी इस प्रभाव को कमज़ोर करती है, जिससे जलवायु परिवर्तन में तेज़ी आती है।
  • चरम मौसमी घटनाएँ: हिम में कमी होने और तापमान बढ़ने से तूफानों की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ सकती है।

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हिमालय के ग्लेशियरों के निवर्तन से जम्मू-कश्मीर पर क्या प्रभाव पड़ेगा?

  • परिचय: भारत में, जम्मू और कश्मीर (J&K) में प्रचुर मात्रा में हिमनद (ग्लेशियर) हैं, जिनके पिघलने से क्षेत्र के जल संसाधनों, अर्थव्यवस्था, कृषि और पारिस्थितिकी पर गहरा प्रभाव पड़ता है।
  • प्रभाव:
    • जल स्तर में गिरावट: जलवायु परिवर्तन के कारण बर्फबारी और ग्लेशियर पिघलने में कमी आई है, जिसके कारण क्षेत्र की प्रमुख नदियों और झरनों के जल स्तर में 75% की गिरावट आई है।
    • कृषि में व्यवधान: बढ़ते तापमान ने 8,000 करोड़ रुपए के सेब उद्योग को क्षति पहुँचाया, जिससे जल्दी पकने, गुणवत्ता में कमी और कीमतें कम हो गईं। 
      • जल की कमी से सिंचाई में कमी आती है, जिससे फसल की पैदावार और खाद्य सुरक्षा प्रभावित होती है। 
    • आर्द्रभूमि पर खतरा: हिमनदों में कमी आने से वुलर जैसी आर्द्रभूमि (जो प्राकृतिक जलवायु अवरोधक के रूप में कार्य करती हैं) के क्षेत्रफल में कमी आ रही है।
      • जम्मू-कश्मीर में 99.2% जल निकाय ग्रामीण क्षेत्रों में हैं और उनमें से कई सूख रहे हैं या अनुपयोगी हो रहे हैं।
    • भूमि क्षरण: ग्लेशियरों के तेज़ी से पिघलने से अपवाह में वृद्धि होने के कारण मृदा क्षरण को बढ़ावा मिलता है।
  • पलायन को बढ़ावा: ग्लेशियर में कमी आने के कारण चरागाह भूमि के कम होने से गुज्जर-बकरवाल जैसे समुदायों को पलायन के लिये मजबूर होना पड़ रहा है, जिससे पारंपरिक आजीविका पर संकट बढ़ रहा है।

पृथ्वी पर आइस कैप का निर्माण

  • साइंस एडवांसेज़ में प्रकाशित शोध से इस धारणा को चुनौती मिलती है कि यदि उत्सर्जन रोक दिया जाए तो पृथ्वी पर स्वाभाविक रूप से शीत जलवायु हो जाएगी।
    • ऐतिहासिक रूप से पृथ्वी पर ऊष्ण एवं उच्च-CO₂ की स्थितियाँ रही हैं।
  • इस शोध में पृथ्वी पर आइस कैप के निर्माण के लिये ज़िम्मेदार निम्नलिखित कारकों की पहचान की गई है।
    • ज्वालामुखीय CO₂ का कम उत्सर्जन: कम ग्रीनहाउस गैसों से वार्मिंग सीमित होती है।
    • कार्बन भण्डारण में वृद्धि: वन क्षेत्र से अधिक CO₂ का अवशोषण होता है।
    • रासायनिक अपक्षय: CO₂ की चट्टानों के साथ अभिक्रिया से वायुमंडलीय कार्बन और कम हो जाता है।
    • भूगोल: व्यापक रूप से फैले महाद्वीपों एवं विशाल पर्वत शृंखलाओं के कारण वर्षा में वृद्धि होती है, जिससे कार्बन निष्कासन में तेज़ी के कारण शीतलन को बढ़ावा मिलता है।

निष्कर्ष

वैश्विक स्तर पर समुद्री हिम में कमी के कारण जलवायु परिवर्तन तीव्र हो रहा है, समुद्री परिसंचरण बाधित हो रहा है और चरम मौसमी घटनाओं को बढ़ावा मिल रहा है। भारत में (विशेष रूप से जम्मू और कश्मीर में) ग्लेशियर पिघलने से जल की गंभीर कमी, कृषि में नुकसान, आर्द्रभूमि क्षेत्र में कमी और मजबूरन पलायन जैसी समस्याओं को बढ़ावा मिल रहा है। इन प्रभावों को कम करने के लिये तत्काल जलवायु कार्रवाई के साथ धारणीय नीतियाँ आवश्यक हैं।

दृष्टि मुख्य परीक्षा प्रश्न:

प्रश्न: भारत की जल सुरक्षा, कृषि एवं आजीविका के संबंध में हिमनद पिघलने से उत्पन्न चुनौतियों का परीक्षण कीजिये।

  UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)  

प्रश्न. ‘मीथेन हाइड्रेट’ के निक्षेपों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों में से कौन-से सही हैं? 

  1. भूमंडलीय तापन के कारण इन निक्षेपों से मीथेन गैस का निर्मुक्त होना प्रेरित हो सकता है। 
  2.  ‘मीथेन हाइड्रेट’ के विशाल निक्षेप उत्तरी ध्रुवीय टुंड्रा में तथा समुद्र अधस्तल के नीचे पाए जाते हैं। 
  3.  वायुमंडल में मीथेन एक या दो दशक के बाद कार्बन डाइऑक्साइड में ऑक्सीकृत हो जाती है। 

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये: 

केवल 1 और 2
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3 

उत्तर: (d) 


मेन्स

प्रश्न. आर्कटिक क्षेत्र के संसाधनों में भारत क्यों रुचि ले रहा है? (2018)

प्रश्न. हिममंडल वैश्विक जलवायु को कैसे प्रभावित करता है? (2017)