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टू द पॉइंट

भारतीय अर्थव्यवस्था

हरित और चक्रीय अर्थव्यवस्था

  • 24 Feb 2025
  • 21 min read

प्रिलिम्स के लिये:

जलवायु परिवर्तन, परिशुद्ध खेती, शून्य बजट प्राकृतिक खेती, तटीय आवास और मूर्त आय के लिये मैंग्रोव पहल, प्रदर्शन, उपलब्धि और व्यापार (PAT) योजना, राष्ट्रीय शीतलन कार्य योजना, अटल भूजल योजना, हरित ऊर्जा गलियारा, नीति आयोग, मूल सीमा शुल्क, कार्बन सीमा समायोजन तंत्र, राष्ट्रीय निवेश और अवसंरचना कोष।  

मेन्स के लिये:

भारत की हरित अर्थव्यवस्था में परिवर्तन, चक्रीय अर्थव्यवस्था, हरित अर्थव्यवस्था और चक्रीय अर्थव्यवस्था का एकीकरण

हरित अर्थव्यवस्था क्या है? 

  • हरित अर्थव्यवस्था की अवधारणा जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता से निम्न-कार्बन अर्थव्यवस्था की ओर बदलाव पर प्रकाश डालती है, जिसका लक्ष्य स्वच्छ प्रौद्योगिकियों को अपनाकर शुद्ध-शून्य उत्सर्जन प्राप्त करना है।
    • अर्थव्यवस्था स्थिरता, समावेशिता और दीर्घकालिक विकास पर ध्यान केंद्रित करती है तथा जलवायु चुनौतियों से निपटने के लिये प्रौद्योगिकी का लाभ उठाती है। 
  • भारत का हरित ऊर्जा की ओर परिवर्तन (जैसे, नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों में वृद्धि) तथा वितरित ऊर्जा और हरित तकनीक (सौर, पवन, विद्युत गतिशीलता) के माध्यम से रोज़गार सृजन इसके प्रमुख घटक हैं।
  • हरित अर्थव्यवस्था चक्रीय अर्थव्यवस्था मॉडल को अपनाती है, जिसका लक्ष्य अपशिष्ट में कमी और संसाधनों के पुनः उपयोग के माध्यम से स्थिरता प्राप्त करना है। इसमें इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट प्रबंधन, पुराने वाहन और विषाक्त अपशिष्ट पुनर्चक्रण पहल शामिल हैं। 

हरित अर्थव्यवस्था की ओर भारत के परिवर्तन में क्या चुनौतियाँ हैं? 

  • प्रदूषण नियंत्रण: राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) के शुभारंभ के बावजूद, कई शहरों में प्रदूषण के स्तर में मामूली सुधार ही हुआ है। राज्य स्तर पर पर्याप्त धन की कमी और पर्यावरण नियमों का कमज़ोर क्रियान्वयन वायु प्रदूषण को कम करने तथा वायु गुणवत्ता में सुधार लाने में मुख्य चुनौतियाँ हैं।
  • ऊर्जा, जलवायु और विकास: जीवाश्म ईंधन और कोयले पर अपनी निरंतर निर्भरता के कारण भारत को महत्त्वपूर्ण चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। देश की ऊर्जा सुरक्षा और स्वच्छ ऊर्जा तक पहुँच प्रमुख बाधाएँ हैं। अक्षय ऊर्जा में परिवर्तन वित्तीय बाधाओं, प्रौद्योगिकी अंतराल और बुनियादी ढाँचे की कमी के कारण बाधित है। 
    • इसके अतिरिक्त, जलवायु परिवर्तन अनुकूलन के लिये चरम मौसम की घटनाओं से निपटने के लिये बुनियादी ढाँचेमें भारी निवेश की आवश्यकता होती है, जो भारत जैसे विकासशील देशों को असमान रूप से प्रभावित करता है।
  • असंगत ईंधन मिश्रण: भारत ने वर्ष 2025 तक इथेनॉल मिश्रण अनुपात को 20% तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा है, लेकिन असंगत इथेनॉल उपलब्धता के कारण, खासकर उत्पादन केंद्रों से दूर क्षेत्रों में, प्रगति धीमी है। जैव ईंधन अपनाने का समर्थन करने के लिये बुनियादी ढाँचे की कमी प्रगति को और बाधित करती है।
  • आर्थिक व्यवधान: स्लोबलाइजेशन (वैश्वीकरण की प्रक्रिया में मंदी) की ओर वैश्विक बदलाव भारत के लिये चुनौतियाँ प्रस्तुत करता है, क्योंकि व्यापार प्रतिबंध और भू-राजनीतिक तनाव (जैसे कि अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध) हरित प्रौद्योगिकियों के लिये आपूर्ति शृंखला को बाधित करते हैं। भारत का विनिर्माण क्षेत्र अभी भी अविकसित है, जिससे वैश्विक हरित अर्थव्यवस्था में पूरी तरह से भाग लेने की इसकी क्षमता सीमित हो गई है।
  • कार्यबल में परिवर्तन की चुनौतियाँ: कार्बन-प्रधान उद्योगों से हरित क्षेत्रों की ओर बदलाव से लाखों नौकरियों पर खतरा मंडरा रहा है, विशेष रूप से झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे  कोयला-निर्भर राज्यों में।
    • त्वरित डीकार्बोनाइज़ेशन से वर्ष 2050 तक 30 मिलियन से अधिक नौकरियाँ समाप्त हो सकती हैं। मज़बूत कौशल विकास कार्यक्रमों की अनुपस्थिति श्रमिकों की हरित नौकरियों में बदलाव की क्षमता को बाधित करती है।

हरित अर्थव्यवस्था की ओर संक्रमण को तीव्र करने के लिये क्या कदम उठाने की आवश्यकता है? 

  • ऊर्जा, जलवायु, विकास: भारत कार्बन मूल्य निर्धारण पर अपना ध्यान बढ़ा सकता है और नवीकरणीय ऊर्जा में परिवर्तन को बढ़ावा देने के लिये स्मार्ट ग्रिड और कार्बन बाज़ार जैसी नवीन नीतियों को लागू कर सकता है। इसमें सौर पीवी और पवन ऊर्जा क्षमता का विस्तार शामिल होना चाहिये, जिसे हरित वित्तपोषण पहलों  द्वारा समर्थित किया जाना चाहिये।
  • हरित प्रौद्योगिकियों के लिए घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देना: उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन (PLI) योजना के माध्यम से सौर पैनलों, पवन टर्बाइनों और ऊर्जा भंडारण प्रणालियों के स्थानीय विनिर्माण को बढ़ावा देने से आयात पर निर्भरता कम हो सकती है।
    • यह वर्ष 2025-26 तक 110 गीगावाट सौर मॉड्यूल विनिर्माण क्षमता का उत्पादन करने के भारत के लक्ष्य के अनुरूप है, जिससे चीनी आयात पर निर्भरता कम हो जाएगी।
    • इसे मेक इन इंडिया पहल के साथ जोड़ने से रोज़गार सृजन और हरित औद्योगिकीकरण को बढ़ावा मिल सकता है।
  • बैटरी स्वैपिंग और इलेक्ट्रिक वाहन (EV): बैटरी स्वैपिंग नीति की शुरुआत से इलेक्ट्रिक वाहन (EV) बाज़ार के विकास में मदद मिलेगी, चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और चार्जिंग चिंता जैसी चुनौतियों का समाधान होगा। इस नीति का उद्देश्य सार्वजनिक परिवहन और वस्तु वितरण में इलेक्ट्रिक मोबिलिटी के उपयोग को बढ़ाना है, जिससे परिवहन क्षेत्र से होने वाले उत्सर्जन में कमी आएगी।
  • हरित औद्योगिकीकरण और चक्रीय अर्थव्यवस्था (सर्कुलर इकोनॉमी): सतत् विनिर्माण, कृषि वानिकी और अपशिष्ट प्रबंधन जैसे उद्योगों को शामिल करके चक्रीय अर्थव्यवस्था को विकसित करना आवश्यक होगा। पर्यावरणीय स्थिरता का समर्थन करने और आर्थिक अवसर ऊत्पन्न करने के लिये, सरकार को सतत् कृषि को प्राथमिकता देनी चाहिये, जिसमें कृषि वानिकी और निजी वानिकी शामिल है।
  • मैंग्रोव और आर्द्रभूमि पुनरुद्धार कार्यक्रमों का विस्तार: भारत को कार्बन अवशोषण और तटीय अनुकूलता को बढ़ाने के लिये मैंग्रोव और आर्द्रभूमि पुनरुद्धार करके प्रकृति-आधारित समाधानों को आगे बढ़ाना चाहिये।

हरित अर्थव्यवस्था के लिये क्या पहल की गई हैं?

  • राजकोषीय और बजटीय उपकरण: बजट 2022-23 में उच्च दक्षता वाले सौर पीवी मॉड्यूल उत्पादन और बैटरी उत्पादन के लिये 1950 करोड़ रुपए आवंटित किये गए, यह कदम भारत के नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ाने के लक्ष्य के अनुरूप है। 
  • सरकारी पहल: भारत के नेतृत्व में G-20 प्रेसीडेंसी ने वैश्विक हरित विकास चुनौतियों से निपटने के लिये बहुपक्षीय सहयोग को बढ़ावा देने पर ध्यान केंद्रित किया है। वैश्विक दक्षिण में भारत के नेतृत्व ने समावेशी हरित वित्त की आवश्यकता और हरित प्रौद्योगिकियों तक पहुँचने में  विकासशील देशों के लिये समर्थन पर ज़ोर दिया है।
  • हरित ऊर्जा और औद्योगिक नीति: सौर पीवी मॉड्यूल और उच्च दक्षता वाली बैटरियों के विनिर्माण के लिये उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन (PLI) योजना का उद्देश्य भारत को स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन में वैश्विक नेता बनाना है। 
    • इसके अतिरिक्त, बायोमास ऊर्जा, वाणिज्यिक भवनों में ऊर्जा दक्षता और कोयला गैसीकरण पर ध्यान भारत के हरित औद्योगिकीकरण प्रयासों का हिस्सा है।
  • जैव विविधता और संरक्षण: भारत अपने वन क्षेत्र में सुधार जारी रख रहा है, साथ ही कुछ क्षेत्रों में  प्राकृतिक वनों के नुकसान के बारे में चिंताओं का समाधान भी कर रहा है।
    • सरकार का ग्रीन इंडिया मिशन (GIM) देश भर में वन क्षेत्र बढ़ाने और जैव विविधता बहाल करने की एक व्यापक योजना है।

चक्रीय अर्थव्यवस्था क्या है?

  • चक्रीय अर्थव्यवस्था वह है जहाँ उत्पादों को, पुनःउपयोग या पुनर्योजी और पुनर्चक्रण के लिये डिज़ाइन किया जाता है तथा इस प्रकार लगभग सभी चीजों का पुनःउपयोग, पुनःनिर्माण और पुनर्चक्रण कर उन्हें कच्चे माल के रूप में परिवर्तित किया जाता है या ऊर्जा के स्रोत के रूप में उपयोग किया जाता है।
  • चक्रीय या सर्कुलरिटी का तात्पर्य वस्तु को यथासंभव लंबी अवधि तक उपयोग में लाने से है। अंतिम लक्ष्य अपशिष्ट उत्पादन को कम करके तथा सामग्रियों या वस्तुओं को उनके उच्चतम मूल्य पर रखकर पर्यावरणीय और सामाजिक-आर्थिक प्रभावों को कम करना है।
    • इसमें 6R शामिल हैं - संसाधनों का न्यूनतम उपयोग (Reduce), पुनः उपयोग (Reduce), पुनर्चक्रण (Recycle), नवीनीकरण (Refurbishment), पुनर्प्राप्ति (Recover) और मरम्मत (Repairing of materials)। 

चक्रीय अर्थव्यवस्था (CE) के समक्ष क्या चुनौतियाँ हैं?

  • वैश्विक सामग्री का निष्कर्षण और ओवरशूट: चूँकि सामग्रियों की वैश्विक मांग तेज़ी से बढ़ रही है, वर्ष 1970 में 22 बिलियन टन से वर्ष 2010 में 70 बिलियन टन तक, और वर्ष 2060 तक दोगुनी होने की उम्मीद है, पृथ्वी की पुनर्जनन क्षमता पार हो गई है। 
    • वर्ष 2023 में संसाधनों की मानवीय मांग पृथ्वी की आपूर्ति क्षमता से अधिक हो जाएगी, जिससे प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और जैव विविधता हानि जैसी समस्याएँ और भी बढ़ जाएंगी।
  • फैशन इंडस्ट्री के समक्ष चुनौतियाँ: स्थिरता के बारे में बढ़ती जागरूकता के बावजूद, फैशन इंडस्ट्री को चक्रीय अर्थव्यवस्था को अपनाने हेतु बहुत सी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है ।
    • पिछले 15 वर्षों में फैशन की खपत दोगुनी से भी ज़्यादा हो गई है, जबकि कपड़ों का जीवनकाल छोटा हो गया है। इस प्रवृत्ति के कारण बड़े पैमाने पर कचरा और पर्यावरण को नुकसान हुआ है।
  • उच्च प्रभाव वाले क्षेत्रों में चुनौतियाँ: गतिशीलता, कपड़ा, प्लास्टिक और निर्माण जैसे उच्च प्रभाव वाले क्षेत्र चक्रीय अर्थव्यवस्था के लक्ष्यों को प्राप्त करने में महत्त्वपूर्ण बाधाएँ प्रस्तुत करते हैं। इन उद्योगों को अधिक सतत् की ओर बढ़ने के लिये प्रणालीगत परिवर्तनों की आवश्यकता है, तथा वैश्विक स्थिरता लक्ष्यों को पूरा करने के लिये वर्तमान प्रयास अपर्याप्त हैं।
  • चक्रीय अर्थव्यवस्था के लिये अस्पष्ट दृष्टिकोण: सरकार के नीतिगत प्रयासों के बावजूद प्रगति निराशाजनक रही है; प्रमुख चुनौतियों में से एक भारत के चक्रीय अर्थव्यवस्था मिशन के अंतिम लक्ष्य के प्रति स्पष्ट दृष्टिकोण की कमी तथा नीतियों के वास्तविक कार्यान्वयन में अंतर है।
  • उद्योगों की अनिच्छा: आपूर्ति शृंखला की सीमाओं, निवेश के लिये प्रोत्साहन की कमी, जटिल पुनर्चक्रण प्रक्रियाओं और पुन: उपयोग/पुनर्चक्रण/पुनः विनिर्माण प्रक्रियाओं में भागीदारी का समर्थन करने के लिये जानकारी की कमी के कारण उद्योग चक्रीय अर्थव्यवस्था मॉडल को अपनाने के लिये अनिच्छुक हैं।

चक्रीय अर्थव्यवस्था प्राप्त करने के लिये क्या पहल हैं?

  • भारत की पहल: भारत सक्रिय रूप से चक्रीय अर्थव्यवस्था नीतियों को बढ़ावा दे रहा है, जैसे कि मसौदा राष्ट्रीय संसाधन दक्षता नीति (2019), स्टील स्क्रैप रीसाइक्लिंग नीति, वाहन स्क्रैपिंग नीति और क्षेत्र-विशिष्ट कार्य योजनाएँ। 
  • मिशन लाइफ: वर्ष 2022 में लॉन्च किया गया मिशन LiFE तीन मुख्य सिद्धांतों पर केंद्रित है: ज़िम्मेदार उपभोग (मांग) के प्रति व्यवहार को बढ़ावा देना, बदलती आवश्यकताओं (आपूर्ति) के लिये बाज़ार की प्रतिक्रियाओं को सक्षम बनाना, और सतत् पहलों का समर्थन करने हेतु सरकारी और औद्योगिक नीतियों को प्रभावित करना। 
  • प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन और GTPI: भारत के दृष्टिकोण में वैश्विक पर्यटन प्लास्टिक पहल (GTPI) का शामिल होना आवश्यक है, जिसका उद्देश्य प्लास्टिक के लिये चक्रीय अर्थव्यवस्था की दिशा में संक्रमण हेतु पर्यटन क्षेत्र को एकजुट करना है। 
  • चक्रीय अर्थव्यवस्था पर वैश्विक गठबंधन: भारत चक्रीय अर्थव्यवस्था और संसाधन दक्षता पर वैश्विक गठबंधन (GACERE) का एक प्रमुख सदस्य है, जिसका उद्देश्य चक्रीय अर्थव्यवस्था के लिये वैश्विक परिवर्तन को बढ़ावा देना है।

चक्रीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिये क्या कदम उठाने की आवश्यकता है?

  • चक्रीय अर्थव्यवस्था में निवेश: चक्रीय अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ने के लिये नीतियों, बुनियादी ढाँचे, निम्न कार्बन विकल्पों और प्रौद्योगिकियों में व्यापक निवेश की आवश्यकता होती है। इसके अतिरिक्त, व्यवसाय मॉडल में सर्कुलरिटी को एकीकृत करने से अधिक सतत् प्रथाओं को खोलने में मदद मिलेगी।
  • संधारणीय जीवनशैली: ज़िम्मेदार उपभोग और उत्पादन पर SDG 12 लक्ष्यों तक पहुँचने के लिये सतत्/संधारणीय जीवनशैली अपनाना महत्त्वपूर्ण हैप्रमुख कार्यों में कार्बन फुटप्रिंट को कम करना, निम्न कार्बन विकल्पों का समर्थन करना तथा गतिशीलता, ऊर्जा उपयोग, आहार विकल्पों एवं नए व्यवसाय मॉडल में अधिक सतत् को अपनाना शामिल है।
  • हरित रोज़गार और आर्थिक अवसर: एक चक्रीय अर्थव्यवस्था में परिवर्तन से हरित नौकरियाँ उत्पन्न करने और आर्थिक विकास को बढ़ाने का अवसर प्राप्त होता है। यह अनुमान लगाया गया है कि भारत के चक्रीय अर्थव्यवस्था में परिवर्तन से वर्ष 2050 तक सालाना 624 बिलियन अमेरिकी डॉलर का शुद्ध आर्थिक लाभ हो सकता है तथा वैश्विक स्तर पर लाखों रोज़गार उत्पन्न हो सकते हैं।
  • कार्यान्वयन रणनीतियों के साथ कानूनों का समन्वय: चक्रीय अर्थव्यवस्था के लाभों को प्राप्त करने के लिये सरकार की पहलों को उद्योग सहयोग के साथ कार्यान्वयन योग्य कार्यों के साथ संयोजित करने की आवश्यकता है।
  • प्रौद्योगिकी-संचालित पुनर्चक्रण: सरकार को अपशिष्ट प्रबंधन के क्षेत्र में प्रौद्योगिकी संवर्द्धन में जनता की सक्रिय भागीदारी को बढ़ावा देने के लिये विश्वविद्यालय और स्कूल स्तर पर अपशिष्ट पुनर्चक्रण के क्षेत्र में अनुसंधान एवं विकास को प्रोत्साहित करना चाहिये।
    • इसके अलावा, जैविक कचरे के पुनः उपयोग के लिये शहरों में कम्पोस्ट केंद्र स्थापित किये जा सकते हैं, जिससे मृदा कार्बन की मात्रा बढ़ेगी और रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता समाप्त हो जाएगी।

  UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)  

प्रिलिम्स:

प्रश्न. भारतीय अक्षय ऊर्जा विकास एजेंसी लिमिटेड (IREDA) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?(2015)

  1. यह एक पब्लिक लिमिटेड सरकारी कंपनी है।
  2.  यह एक गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी है।

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:

(A) केवल 1
(B) केवल 2
(C) 1 और 2 दोनों
(D) न तो 1 और न ही 2

उत्तर: C


मेन्स:

प्रश्न. “सस्ती, विश्वसनीय, सतत् और आधुनिक ऊर्जा तक पहुँच सतत् विकास लक्ष्यों (SDG) को प्राप्त करने के लिये अनिवार्य है।” इस संबंध में भारत में हुई प्रगति पर टिप्पणी कीजिये। (2018)

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