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भारतीय राजव्यवस्था

अवमानना ​​पर भारतीय और अमेरिकी न्यायालय

  • 27 Mar 2025
  • 13 min read

प्रिलिम्स के लिये:

न्यायालय की अवमानना, सर्वोच्च न्यायालय (SC), भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI), न्यायालय की अवमानना ​​अधिनियम, 1971, उच्च न्यायालय, ज़िला न्यायालय

मेन्स के लिये:

भारतीय संविधान की अन्य देशों से तुलना, अमेरिका और भारत की अवमानना ​​कार्यवाही में अंतर, भारतीय न्यायपालिका में न्यायालय की अवमानना

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

चर्चा में क्यों?

अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा विदेशी सहायता रोकने के अमेरिकी डिस्ट्रिक्ट कोर्ट के निर्णय की अवज्ञा ने न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच तनाव को उज़ागर किया है, जिससे शक्तियों के पृथक्करण और संभावित अवमानना ​​कार्यवाही पर चिंताएँ बढ़ गई है। 

  • यह स्थिति इस बात पर प्रकाश डालती है कि विभिन्न लोकतांत्रिक प्रणालियों में न्यायालय, विशेष रूप से अमेरिका और भारत में, न्यायिक आदेशों का अनुपालन कैसे सुनिश्चित करते हैं।

अमेरिकी और भारतीय न्यायालयों की संरचना और अधिकार क्षेत्र

  • 3 स्तरीय न्यायालय प्रणाली: अमेरिकी संघीय न्यायालय प्रणाली में 3 स्तर हैं: डिस्ट्रिक्ट कोर्ट (परीक्षण न्यायालय), सर्किट कोर्ट (अपील न्यायालय) और सुप्रीम कोर्ट (अंतिम अपीलीय प्राधिकारी)।
  • क्षेत्राधिकार और संरचना: संघीय कानून या अमेरिकी संविधान द्वारा अनुमत मामलों की सुनवाई संघीय न्यायालय द्वारा की जाती है।
    • डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में न्यायाधीशों की नियुक्ति आजीवन होती है तथा वे सिविल और फौजदारी दोनों मामलों की सुनवाई करते हैं।
    • सर्किट कोर्ट डिस्ट्रिक्ट कोर्ट की अपीलों पर सुनवाई करते हैं और 3 न्यायाधीशों का एक पैनल मामलों की समीक्षा करता है।
    • सुप्रीम कोर्ट उच्चतम न्यायालय है, जो संवैधानिक और संघीय मामलों पर अपीलों की सुनवाई करता है, तथा उसे उत्प्रेषण रिट के माध्यम से विवेकाधीन क्षेत्राधिकार प्राप्त है।
  • अमेरिकी संघीय और भारतीय सर्वोच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार: भारतीय सर्वोच्च न्यायालय को अमेरिकी संघीय न्यायालय की तुलना में अधिक व्यापक क्षेत्राधिकार प्राप्त है, जिसमें संघ और राज्यों के बीच विवादों पर अनन्य मूल क्षेत्राधिकार (अनुच्छेद 131) और सलाहकार क्षेत्राधिकार (अनुच्छेद 143) है, जो राष्ट्रपति को सार्वजनिक महत्त्व के मामलों पर कानूनी राय लेने की अनुमति देता है, जो अमेरिकी प्रणाली में अनुपस्थित है। 
    • इसके अतिरिक्त, भारत के सर्वोच्च न्यायालय के पास व्यापक अपीलीय शक्तियाँ, न्यायिक समीक्षा है और यह जनहित याचिका (PIL) की अनुमति देता है, जिससे यह अधिक सुलभ और प्रभावशाली हो जाता है।

भारत और अमेरिकी न्यायालयों में अवमानना ​​शक्तियों में क्या अंतर है?

  • परिचय: न्यायालय की अवमानना ​​न्यायपालिका को अनुचित आलोचना से बचाने तथा इसके अधिकार को कमजोर करने वालों को दंडित करने के लिये एक कानूनी तंत्र है।
  • अवमानना ​​के प्रकार:
    • अमेरिकी न्यायालय में अवमानना ​​के 2 प्रकार हैं: सिविल अवमानना ​​(आदेशों का अनुपालन न करना), आपराधिक अवमानना ​​(न्याय में बाधा, अवज्ञा)।
      • अमेरिका में सिविल अवमानना ​​को अनुपालन के आधार पर प्रतिवर्तित किया जा सकता है, जबकि आपराधिक अवमानना सख्त है लेकिन राष्ट्रपति द्वारा क्षमा योग्य है। 
      • न्यायालयों ने अवमानना ​​के लिये अधिकारियों को दंडित किया है, लेकिन किसी वर्तमान राष्ट्रपति को कभी नहीं।
    • भारतीय न्यायालय में भी अवमानना ​​के 2 प्रकार हैं: सिविल अवमानना ​​(न्यायालय के आदेशों की अवज्ञा), आपराधिक अवमानना ​​(न्यायालय को बदनाम करना, न्याय में बाधा डालना)।
      • भारत के मामले में, अवमानना ​​की कार्यवाही या तो न्यायालय द्वारा स्वयं (स्वतः संज्ञान से) या अटॉर्नी जनरल (AG) की पूर्वानुमति से व्यक्ति की याचिका द्वारा शुरू की जा सकती है।
  • विधिक प्रावधान: 
    • अमेरिका में, न्यायपालिका अधिनियम, 1789 सभी न्यायालयों को अवमानना ​​शक्तियों, प्रतिबंधों और कानूनी तंत्रों के माध्यम से आदेशों को लागू करने का अधिकार देता है।
    • भारत में, अनुच्छेद 129 के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय को स्वयं की अवमानना ​​के लिये दंडित किये जाने का प्राधिकार प्रदान किया गया है, जबकि उच्च न्यायालयों को यह शक्ति अनुच्छेद 215 के अंतर्गत प्रदान की गई है, जिनके पास अधीनस्थ न्यायालयों की अवमानना हेतु भी दंडित करने का अधिकार है।
      • न्यायालय अवमान ​​अधिनियम (1971) में न्यायालयों को अवमानना ​​कार्यवाही करने और डिक्री के माध्यम से आदेशों को प्रवर्तित करने का प्राधिकार दिया गया है।
      • अपवाद: कोई भी व्यक्ति किसी ऐसे मामले के गुणागुण पर निष्पक्ष टिप्पणी प्रकाशित करने के लिये अवमानना ​​का दोषी नहीं होगा, जिसकी सुनवाई हो चुकी है और अंतिम रूप से निर्णय किया जा चुका है
  • न्यायालयों की अवमानना ​​शक्ति एवं प्रवर्तन: अमेरिका में संघीय न्यायालय अवमानना ​​कार्यवाही और वकील प्रतिबंधों के माध्यम से अनुपालन सुनिश्चित करते हैं।
    • भारत में, न्यायालय अवमानना ​​कार्यवाही के माध्यम से अनुपालन सुनिश्चित करते हैं

अनुपालन, शास्ति और अधिकारियों की संप्रभु उन्मुक्ति 

  • अमेरिका में, न्यायाधीश वार्ता को प्राथमिकता देते हैं क्योंकि संप्रभु उन्मुक्ति के कारण अधिकारियों पर शास्तियों अधिरोपण सीमित होता है। वे संघीय अधिकारियों पर कदाचित ही वित्तीय शास्तियाँ अथवा कारावास का दंड अधिरोपित करते हैं।
    • अमेरिका में संप्रभु उन्मुक्ति की स्थिति प्रबल है, जिसके अंतर्गत सरकार की सहमति के बिना उसके विरुद्ध मुकदमा नहीं किया जा सकता है, तथा अर्हित उन्मुक्ति के अंतर्गत अधिकारियों को व्यक्तिगत दायित्व से संरक्षण प्रदान किया गया है बशर्ते वे संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन न करें। 
    • अमेरिकी संविधान में न्यायालय के आदेशों का अनुपालन आवश्यक विनिर्दिष्ट किया गया है। गंभीर मामलों में, अनुनपालन तब होता है जब सरकार विधिमान्यता को स्वीकार करती है लेकिन फिर भी अनुपालन करने से इनकार कर देती है। उदाहरण के लिये, गृहयुद्ध के दौरान, अब्राहम लिंकन ने जॉन मेरीमैन मामले (बिना आरोप के निरुद्ध किया गया) में विधिमान्यता स्वीकार की किंतु न्यायालय के आदेश की अवहेलना की।
    • अमेरिकी न्यायाधीश न्यायालय आदेशों पर प्रत्यक्ष प्रतिरोध का वर्जन करते हैं तथा अनुपालन सुनिश्चित करने के लिये मांगों में बदलाव करने को प्राथमिकता देते हैं।
  • भारतीय न्यायालयों को दंडात्मक प्राधिकार प्राप्त हैं, जिनमें जुर्माना, कारावास और सरकारी पदाधिकारियों का प्रत्यक्ष समन शामिल है।
    • सिविल प्रक्रिया संहिता (CrPC) के तहत, न्यायालयों में डिक्री और आदेशों के निष्पादन के प्रावधान हैं, जिनमें संपत्ति की कुर्की और इरादतन अनुपालन न करने के मामलों में गिरफ्तारी भी शामिल है।
    • भारत में संप्रभु प्रतिरक्षा (अनुच्छेद 300 में निहित) विद्यमान है किंतु यह सुदृढ़ नहीं है, जिससे विभिन्न मामलों में सरकार के खिलाफ मुकदमा करने का विकल्प मिलता है। 
    • अधिकारियों को बहुव्यापी अथवा पूर्ण उन्मुक्ति नहीं प्रदान की गई है और उन्हें व्यक्तिगत रूप से जवाबदेह ठहराया जा सकता है। भारतीय न्यायालयों को अवमानना ​​के लिये अधिक सशक्त शक्तियाँ प्राप्त हैं, जिसके तहत वे अननुपालन के लिये अधिकारियों पर जुर्माना अधिरोपित कर सकते हैं, उन्हें समन भेज सकते हैं अथवा कारावास से दंडित कर सकते हैं।
  • न्यायिक समीक्षा:
    • अमेरिकी न्यायालय विधियों की व्याख्या कर सकते हैं, लेकिन कार्यपालिका की कार्रवाइयों को आसानी से रद्द नहीं कर सकते।
    • भारत में न्यायिक समीक्षा सुव्यवस्थित रूप से स्थापित है, जिससे न्यायालयों को  असंवैधानिक कार्यों को रद्द करने की सुविधा प्राप्त होती है (उदाहरण के लिये, केशवानंद भारती मामला, 1973)।

निष्कर्ष

हालाँकि अमेरिका और भारत दोनों ही देशों में न्यायपालिका को न्यायालय के आदेशों को प्रवर्तित करने के उद्देश्य से महत्त्वपूर्ण शक्तियाँ प्रदान की गई हैं किंतु भारत की प्रणाली में व्यापक संवैधानिक प्रावधान शामिल हैं। अमेरिका अपनी अवमानना ​​शक्तियों और संघीय प्रवर्तन संस्थाओं पर अत्यधिक निर्भर है। इन भिन्नताओं के होते हुए भी दोनों ही देश विधि सम्मत शासन सुनिश्चित करने के उद्देश्य से न्यायिक निर्णयों का पालन किये जाने के सिद्धांत को अक्षुण्ण रखते हैं।

  UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न   

प्रश्न. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2022)

  1. एच.एन. सान्याल समिति की रिपोर्ट के अनुसरण में न्यायालय की अवमानना अधिनियम, 1971 पारित किया गया था। 
  2. भारत का संविधान उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों को अपनी अवमानना के लिये दंड देने हेतु शक्ति प्रदान करता है। 
  3. भारत का संविधान सिविल अवमानना और आपराधिक अवमानना को परिभाषित करता है। 
  4. भारत में न्यायालय की अवमानना के विषय में कानून बनाने के लिये संसद में शक्ति निहित है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1 और 2 
(b) 1, 2 और 4
(c) केवल 3 और 4 
(d) केवल 3

उत्तर: (b)

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