आंतरिक सुरक्षा
रक्षा में स्वदेशीकरण और नवाचार को प्रोत्साहन
- 26 Mar 2025
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यह एडिटोरियल 25/03/2025 को द फाइनेंशियल एक्सप्रेस में प्रकाशित “Defence moves to strengthen indigenous production with major procurement approvals” पर आधारित है। इस लेख में आत्मनिर्भर भारत के तहत तेज़ी से हो रहे रक्षा आधुनिकीकरण को दर्शाता है, जिसमें 138 बिलियन डॉलर के अपेक्षित ऑर्डर, बढ़ते उत्पादन और निर्यात शामिल हैं, साथ ही महत्त्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों में चुनौतियों पर प्रकाश डाला गया है।
प्रिलिम्स के लिये:रक्षा नवाचार और आधुनिकीकरण, आत्मनिर्भर भारत पहल, रक्षा उपकरण स्वदेशीकरण, तेजस, आकाश मिसाइल प्रणाली, भारत की सकारात्मक स्वदेशीकरण सूचियाँ, RudraM-II मिसाइल, iDEX, ADITI, रक्षा परीक्षण अवसंरचना योजना (DTIS), रक्षा उत्पादन और निर्यात संवर्द्धन नीति (DPEPP), SRIJAN पोर्टल मेन्स के लिये:भारत के लिये रक्षा स्वदेशीकरण और आधुनिकीकरण का महत्त्व, भारत के रक्षा आधुनिकीकरण और स्वदेशीकरण से जुड़ी प्रमुख बाधाएँ। |
भारत अपने आत्मनिर्भर भारत पहल के माध्यम से रक्षा नवाचार और आधुनिकीकरण को सक्रिय रूप से आगे बढ़ा रहा है, जिसका लक्ष्य स्वदेशी उत्पादन और विदेशी निर्भरता को कम करना है। रक्षा क्षेत्र को अगले दशक में 138 बिलियन डॉलर के बड़े ऑर्डर मिलने की उम्मीद है, जिसमें एयरोस्पेस, मिसाइल और आर्टिलरी में महत्त्वपूर्ण निवेश शामिल है। यद्यपि रक्षा उपकरण का उत्पादन 46,429 करोड़ रुपए से दोगुना से अधिक हो गया है और निर्यात लगभग दस गुना बढ़ गया है, फिर भी महत्त्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों को विकसित करने तथा निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने में चुनौतियाँ बनी हुई हैं।
भारत के लिये रक्षा स्वदेशीकरण और आधुनिकीकरण का क्या महत्त्व है?
- सामरिक स्वायत्तता और राष्ट्रीय सुरक्षा: विदेशी हथियारों पर निर्भरता कम करने से भारत की बाह्य आपूर्तिकर्त्ताओं या भू-राजनीतिक बदलावों का बंधक बने बिना संकट के दौरान तेज़ी से प्रतिक्रिया करने की क्षमता बढ़ जाती है।
- स्वदेशीकरण यह सुनिश्चित करता है कि प्रतिबंधों या आपूर्ति-शृंखला व्यवधानों के दौरान भी महत्त्वपूर्ण प्लेटफॉर्म उपलब्ध रहें।
- आधुनिकीकरण से सशस्त्र बलों को अस्थिर पड़ोस में युद्ध के लिये तैयार और तकनीकी रूप से श्रेष्ठ बने रहने में भी मदद मिलती है।
- 65% रक्षा उपकरण घरेलू स्तर पर निर्मित होते हैं। वर्ष 2025 में स्वदेशी ATAGS तोपों के लिये ₹7,000 करोड़ का ऑर्डर रणनीतिक आत्मनिर्भरता की ओर इस बदलाव को दर्शाता है।
- आर्थिक विकास और औद्योगिक क्षमता: रक्षा उपकरण स्वदेशीकरण एक सुदृढ़ औद्योगिक आधार बनाकर, स्थानीय विनिर्माण, MSME और स्टार्ट-अप को बढ़ावा देकर आर्थिक विकास को उत्प्रेरित करता है।
- इसका रोज़गार सृजन, कौशल विकास तथा एयरोस्पेस, धातुकर्म, इलेक्ट्रॉनिक्स और AI जैसे क्षेत्रों में नवाचार को बढ़ावा देने के माध्यम से बड़े गुणक प्रभाव होंगे।
- वित्त वर्ष 2024 में रक्षा उत्पादन बढ़कर 1.27 लाख करोड़ रुपए हो गया जो वित्त वर्ष 2015 से 174% अधिक है।
- वर्तमान में 16,000 से अधिक MSME और 430 लाइसेंस प्राप्त कंपनियाँ भारत के रक्षा उत्पादन बाज़ार में लगी हुई हैं।
- निर्यात क्षमता और वैश्विक रक्षा कूटनीति: भारत का रक्षा निर्यात उसके सामरिक प्रभाव के प्रमुख स्तंभ के रूप में उभर रहा है, जिससे सॉफ्ट पावर और द्विपक्षीय रक्षा सहयोग में सुधार हो रहा है।
- तेजस, आकाश मिसाइल सिस्टम और तीव्र गति की इंटरसेप्टर नौकाएँ जैसे स्वदेशी प्लेटफॉर्म वैश्विक रुचि को आकर्षित कर रहे हैं तथा आर्थिक एवं रणनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं को समर्थन दे रहे हैं।
- वित्त वर्ष 2024 में रक्षा निर्यात 21,083 करोड़ रुपए के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुँच गया, जो वित्त वर्ष 2014 में 686 करोड़ रुपए था अर्थात् 30 गुना वृद्धि हुई है।
- भारत अब अमेरिका और आर्मेनिया सहित 100 से अधिक देशों को निर्यात करता है।
- आपूर्ति शृंखला आघात के प्रति समुत्थानशीलन: स्वदेशी क्षमताओं का निर्माण वैश्विक आपूर्ति शृंखला व्यवधानों, प्रतिबंधों या राजनीतिक अनिश्चितता के प्रति संवेदनशीलता को कम करता है जैसा कि रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान देखा गया था।
- यह समुत्थानशीलन निर्बाध सैन्य तत्परता और अतिरिक्त सहायता के लिये महत्त्वपूर्ण है।
- भारत की सकारात्मक स्वदेशीकरण सूचियों में अब 5,500 से अधिक उपकरण शामिल हैं, जिनमें से 3,000 से अधिक का स्वदेशीकरण किया जा चुका है।
- प्रौद्योगिकीय नवाचार और अनुसंधान एवं विकास पारिस्थितिकी तंत्र: स्वदेशीकरण से घरेलू रक्षा अनुसंधान एवं विकास पारिस्थितिकी तंत्र को बढ़ावा मिलता है, जिससे भारत को निष्क्रिय उपभोक्ता के बजाय अत्याधुनिक तकनीक का उत्पादक बनने में मदद मिलती है।
- iDEX और ADITI जैसे प्लेटफॉर्म, सैन्य आवश्यकताओं को स्टार्ट-अप एवं शैक्षणिक नवाचार के साथ जोड़ते हैं तथा AI, स्वायत्त प्रणालियों एवं क्वांटम तकनीक में सफलता दिलाते हैं।
- फरवरी 2025 तक, 619 स्टार्टअप/MSME iDEX के माध्यम से जुड़े हुए हैं, जिनके लिये 449.62 करोड़ रुपए आवंटित किये गए हैं।
- RudraM-II मिसाइल, नौसेना एंटी-शिप मिसाइल और क्यूकेडी सिस्टम जैसे नवाचारों को SAMARTHYA 2025 में प्रदर्शित किया गया।
- समावेशी विकास और क्षेत्रीय औद्योगीकरण: रक्षा गलियारे और विनिर्माण क्लस्टर, विशेष रूप से अविकसित क्षेत्रों में, व्यापक प्रभाव और विकेंद्रीकृत विकास को बढ़ावा देते हैं।
- इससे क्षेत्रीय रोज़गार, स्थानीय उद्यमशीलता और टियर-2 एवं टियर-3 शहरों में निवेश को बढ़ावा मिलता है।
- उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु रक्षा गलियारों में 8,658 करोड़ रुपए से अधिक का निवेश किया गया तथा 53,439 करोड़ रुपए के 253 समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किये गए। लखनऊ, कोयंबटूर और होसुर जैसे प्रमुख केंद्र तेज़ी से रक्षा केंद्र के रूप में उभर रहे हैं।
भारत के रक्षा आधुनिकीकरण और स्वदेशीकरण से जुड़ी प्रमुख बाधाएँ क्या हैं?
- महत्त्वपूर्ण रक्षा घटकों में तकनीकी अंतराल: भारत को इंजन, अर्द्धचालक और सटीक इलेक्ट्रॉनिक्स जैसी प्रमुख प्रौद्योगिकियों के विकास में महत्त्वपूर्ण कमियों का सामना करना पड़ रहा है, जिससे उसे प्रमुख उप-प्रणालियों के लिये विदेशी आपूर्तिकर्त्ताओं पर निर्भर होना पड़ रहा है।
- बढ़ती घरेलू क्षमताओं के बावजूद, लड़ाकू जेट इंजन, AESA रडार और भारी परिवहन प्रणालियों जैसे रणनीतिक प्लेटफार्मों को अभी भी विदेशी सहयोग की आवश्यकता है।
- इससे पूर्ण-स्पेक्ट्रम स्वदेशीकरण में बाधा उत्पन्न होती है तथा जटिल रक्षा परियोजनाओं में विलंब होता है।
- भारत में लड़ाकू विमानों के लिये स्वदेशी एयरो-इंजन प्रौद्योगिकी का अभी भी अभाव है; तेजस के लिये जेट इंजन GE एयरोस्पेस (USA) से प्राप्त किये जाते हैं।
- बढ़ती घरेलू क्षमताओं के बावजूद, लड़ाकू जेट इंजन, AESA रडार और भारी परिवहन प्रणालियों जैसे रणनीतिक प्लेटफार्मों को अभी भी विदेशी सहयोग की आवश्यकता है।
- निजी क्षेत्र की कम भागीदारी और पैमाना: रक्षा उत्पादन में निजी उद्योग की भागीदारी, विशेष रूप से उच्च मूल्य या जटिल प्रणालियों में, पैमाने और दायरे के मामले में सीमित बनी हुई है।
- बाधाओं में लंबी उत्पादन अवधि, खरीद पाइपलाइनों में अनिश्चितता, अनुसंधान एवं विकास सहायता तक सीमित पहुँच तथा जोखिम से बचने वाली प्रशासनिक प्रक्रियाएँ शामिल हैं।
- इससे नवाचार और प्रतिस्पर्द्धा कमज़ोर होती है।
- कुल रक्षा उत्पादन और नवाचार में निजी फर्मों का योगदान केवल 21% है। 1.27 लाख करोड़ रुपए के रक्षा उत्पादन में DPSU का बड़ा हिस्सा है।
- बाधाओं में लंबी उत्पादन अवधि, खरीद पाइपलाइनों में अनिश्चितता, अनुसंधान एवं विकास सहायता तक सीमित पहुँच तथा जोखिम से बचने वाली प्रशासनिक प्रक्रियाएँ शामिल हैं।
- प्रशासनिक विलंब और जटिल खरीद प्रक्रियाएँ: जटिल अधिग्रहण प्रक्रियाएँ, कई अनुमोदन स्तर और समयबद्ध निर्णय लेने की कमी प्रायः आधुनिकीकरण प्रयासों को विफल कर देती है या विलंबित कर देती है।
- इससे परिचालन तत्परता प्रभावित होती है और दीर्घकालिक क्षमता विकास में निवेश करने में उद्योग का विश्वास कम होता है।
- सुधारों के बावजूद, पूंजी अधिग्रहण की समयसीमा लंबी बनी हुई है; नए DAC दिशानिर्देशों का उद्देश्य खरीद की समयसीमा को कम करना है, लेकिन इसके कार्यान्वयन का अंकेक्षण समय के साथ होगी।
- उदाहरण के लिये, LCA कार्यक्रम को वर्ष 1983 में मंजूरी दी गई थी, लेकिन विमान का पहला प्रोटोटाइप वर्ष 2001 में ही उड़ान भर सका और इसे पूर्ण रूप से क्रियान्वित होने में अब तक का समय लग गया है।
- अपर्याप्त रक्षा अनुसंधान एवं विकास निवेश और अवशोषण: हालाँकि DRDO व अन्य एजेंसियों ने स्वदेशी प्लेटफॉर्म विकसित किये हैं, लेकिन अनुसंधान एवं विकास पर खर्च सकल घरेलू उत्पाद के प्रतिशत के रूप में कम है और प्रयोगशाला स्तर के नवाचार एवं बड़े पैमाने पर उत्पादन के बीच एक विसंगति है।
- भारत समग्र रूप से अनुसंधान एवं विकास पर सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 0.7% खर्च करता है, तथा अमेरिका जैसे देशों की तुलना में रक्षा अनुसंधान एवं विकास पर बहुत कम खर्च करता है।
- प्रौद्योगिकी विकास निधि योजना की धनराशि को हाल ही में वित्त वर्ष 2025 में प्रति परियोजना 50 करोड़ रुपए तक बढ़ा दिया गया था, जो पहले की तुलना में कम वित्तपोषण को दर्शाता है।
- सामरिक उपकरणों के लिये आयात निर्भरता: सुधारों के बावजूद भारत अभी भी पनडुब्बियों, लड़ाकू जेट, वायु रक्षा प्रणालियों और ड्रोन जैसी महत्त्वपूर्ण रक्षा प्रणालियों का आयात करता है।
- यह भू-राजनीतिक संकटों के दौरान कमज़ोरियों को उजागर करता है और आत्मनिर्भर भारत के उद्देश्य का खंडन करता है।
- SIPRI की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, भारत विश्व का सबसे बड़ा हथियार आयातक बना हुआ है, जिसके आयात में 4.7% की वृद्धि हुई है। रूस इसका मुख्य आपूर्तिकर्त्ता है
- परीक्षण अवसंरचना और प्रमाणन संबंधी बाधाएँ: पर्याप्त परीक्षण और प्रमाणन सुविधाओं का अभाव स्वदेशी रूप से विकसित प्रणालियों के उत्पादन एवं उपयोग में बाधा डालता है।
- नई प्रौद्योगिकियों को तीव्र सत्यापन चक्र की आवश्यकता होती है, जो वर्तमान परीक्षण अवसंरचना द्वारा सीमित है।
- रक्षा परीक्षण अवसंरचना योजना (DTIS) में UAV, EW और इलेक्ट्रो-ऑप्टिक्स जैसे क्षेत्रों में बढ़ती ज़रूरत के बावजूद 6-8 ग्रीनफील्ड रक्षा परीक्षण अवसंरचना सुविधाओं की स्थापना की परिकल्पना की गई थी। परीक्षण की गति iDEX या मेक-I प्रोजेक्ट्स में वृद्धि से के अनुरूप नहीं है।
रक्षा आधुनिकीकरण और स्वदेशीकरण से संबंधित प्रमुख सरकारी पहल क्या हैं?
- मेक इन इंडिया (रक्षा): रक्षा उपकरणों के घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिये वर्ष 2014 में शुरू किया गया।
- आयात पर निर्भरता कम करने और स्वदेशी उत्पादन को प्रोत्साहित करने पर ध्यान केंद्रित किया गया।
- रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया (DAP) 2020: भारतीय खरीदें (IDDM) और वैश्विक खरीदें-भारत में निर्माण जैसी श्रेणियाँ शुरू की गईं।
- अनिवार्य स्वदेशी घटक सीमा के साथ घरेलू खरीद को प्राथमिकता दी जाएगी।
- रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया (DAP) 2020 2020: वर्ष 2025 तक ₹1.75 लाख करोड़ कारोबार और ₹35,000 करोड़ निर्यात का लक्ष्य।
- इसका उद्देश्य निर्यात सहित एक सुदृढ़ रक्षा औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करना है।
- रक्षा उत्कृष्टता के लिये नवाचार (iDEX): यह रक्षा आवश्यकताओं के लिये नवाचार हेतु स्टार्ट-अप्स और MSME को प्रोत्साहित करता है।
- अनुदान और खरीद सहायता प्रदान करता है; वर्ष 2025 तक 600 से अधिक स्टार्टअप इसमें शामिल होंगे।
- प्रौद्योगिकी विकास निधि (TDF): रक्षा प्रौद्योगिकियों के विकास के लिये MSME और स्टार्टअप्स को समर्थन देने हेतु DRDO द्वारा संचालित।
- वित्त वर्ष 2025 में प्रति परियोजना वित्तपोषण सीमा बढ़ाकर 50 करोड़ रुपए कर दी गई।
- SRIJAN पोर्टल: भारतीय उद्योग द्वारा स्वदेशीकरण के लिये आयातित वस्तुओं को सूचीबद्ध करने वाला ऑनलाइन मंच।
- फरवरी 2025 तक 14,000 से अधिक वस्तुओं का स्वदेशीकरण किया गया।
- सकारात्मक स्वदेशीकरण सूचियाँ (PIL): निर्धारित समय सीमा के बाद 5,500 से अधिक वस्तुओं के आयात पर प्रतिबंध लगाने वाली पाँच सूचियाँ जारी की गईं।
- केवल घरेलू स्रोतों से खरीद सुनिश्चित करने के लिये लागू किया गया।
- रक्षा औद्योगिक गलियारे (उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु): रक्षा कंपनियों के लिये बुनियादी अवसंरचना और प्रोत्साहन के साथ विशेष विनिर्माण क्षेत्र।
- ₹53,439 करोड़ की निवेश क्षमता; ₹8,600 करोड़ से अधिक का निवेश हो चुका है।
रक्षा स्वदेशीकरण और आधुनिकीकरण को बढ़ाने के लिये भारत क्या उपाय अपना सकता है?
- रक्षा अनुसंधान एवं विकास तथा प्रौद्योगिकी पारिस्थितिकी तंत्र को सुदृढ़ करना: भारत को DRDO, निजी फर्मों, शिक्षाविदों और स्टार्ट-अप्स के बीच संयुक्त अनुसंधान को प्रोत्साहित करके रक्षा अनुसंधान एवं विकास में निवेश को पर्याप्त रूप से बढ़ाना चाहिये।
- औद्योगिक गलियारों में समर्पित रक्षा प्रौद्योगिकी इन्क्यूबेशन सेंटर की स्थापना से नवाचार को बढ़ावा मिल सकता है।
- अत्याधुनिक क्षेत्रों जैसे AI, हाइपरसोनिक्स, निर्देशित ऊर्जा हथियार और स्टील्थ तकनीक की ओर ध्यान स्थानांतरित होना चाहिये।
- सार्वजनिक-निजी भागीदारी के माध्यम से प्रयोगशाला-विकसित प्रौद्योगिकियों का तेज़ी से व्यावसायीकरण आवश्यक है।
- इससे युद्धक्षेत्र की स्थितियों में नवाचार और तैनाती के बीच के अंतराल को समाप्त किया जा सकेगा।
- निजी क्षेत्र और MSME एकीकरण को सुदृढ़ करना: निजी भागीदारों और MSME के लिये आदेशों की अधिक पूर्वानुमानशीलता एवं दृश्यता सुनिश्चित करने के लिये रक्षा खरीद ढाँचे को सुव्यवस्थित करने की आवश्यकता है।
- स्वदेशी निजी फर्मों के लिये विशेष रूप से खरीद कोटा निर्धारित करने से, विशेष रूप से टियर-2 और टियर-3 शहरों में, विनिर्माण का विकेंद्रीकरण होगा।
- तीव्र भुगतान, एकल खिड़की मंजूरी और सरल अनुपालन सुनिश्चित करने से MSME की भागीदारी बढ़ेगी।
- रक्षा मंत्रालय के भीतर समर्पित सहायता प्रकोष्ठों को प्रमाणन और तकनीकी प्रक्रियाओं में MSME की सहायता करनी चाहिये। इससे ज़मीनी स्तर पर नवाचार को बढ़ावा मिलेगा तथा व्यापक आपूर्ति शृंखला नेटवर्क का निर्माण होगा।
- रक्षा अधिग्रहण सुधारों में तेजी लाना: रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया (DAP) के तहत एकीकृत परियोजना टीमों और डिजिटल निगरानी उपकरणों के माध्यम से खरीद समयसीमा को काफी कम किया जाना चाहिये।
- रणनीतिक विलंब से बचने के लिये DAC और CCS अनुमोदन को एक निश्चित कैलेंडर का पालन करना चाहिये। जीवन चक्र लागत, स्वदेशीकरण सूचकांक और मेक-I/II/III श्रेणियों को सुदृढ़ करने से खरीद की गुणवत्ता में सुधार होगा।
- उपयोगकर्त्ताओं, डेवलपर्स और निर्णयकर्त्ताओं के बीच फीडबैक लूप को संस्थागत बनाने से परिणाम-संचालित आधुनिकीकरण सुनिश्चित हो सकता है।
- परीक्षण, ट्रायल और प्रमाणन अवसंरचना को बढ़ाना: भारत को विशेष रूप से UAV, AI-संचालित प्लेटफार्मों, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध और उच्च-स्तरीय संचार प्रणालियों के लिये परीक्षण एवं प्रमाणन सुविधाओं को तेज़ी से बढ़ाना तथा आधुनिक बनाना चाहिये।
- रक्षा गलियारों में दोहरे प्रयोग वाली परीक्षण सुविधाएँ बनाने के लिये सार्वजनिक-निजी भागीदारी मॉडल अपनाया जा सकता है।
- यथार्थवादी सैन्य आवश्यकताओं के अनुसार त्वरित प्रमाणन तंत्र को एक ही तरह के दृष्टिकोण के स्थान पर अपनाया जाना चाहिये।
- वैश्विक मूल उपकरण निर्माताओं के साथ दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदारी बनाना: अस्थायी प्रौद्योगिकी अंतरण के बजाय, भारत को उभरते क्षेत्रों में रणनीतिक सह-विकास और संयुक्त उत्पादन साझेदारी को आगे बढ़ाना चाहिये।
- रक्षा कूटनीति को क्वाड, I2U2 या द्विपक्षीय प्रारूपों के तहत समान विचारधारा वाले देशों के साथ प्रौद्योगिकी समझौतों को एकीकृत करना चाहिये।
- भारत अपने विशाल रक्षा बाजार का उपयोग ToT और IP साझेदारी के लिये रणनीतिक सौदाकारी के रूप में कर सकता है।
- यह दृष्टिकोण सिर्फ असेंबली लाइनों को ही नहीं, बल्कि प्रौद्योगिकी को भी स्वदेशी बनाएगा।
- निगरानी और सूचकांक के माध्यम से स्वदेशीकरण को संस्थागत बनाना: एक वास्तविक काल रक्षा स्वदेशीकरण डैशबोर्ड को सभी प्रमुख खरीद अनुबंधों में लक्ष्यों, स्थानीयकरण स्तरों और बाधाओं पर नज़र रखनी चाहिये।
- रक्षा उत्पादन एवं निर्यात संवर्द्धन नीति (DPEPP) के अंतर्गत मंत्रालयों को आवधिक स्वदेशीकरण लक्ष्यों के प्रति जवाबदेह बनाया जाना चाहिये।
- स्वदेशीकरण प्रदर्शन सूचकांक (IPI) सेवाओं और उद्योग के हितधारकों को प्रोत्साहित कर सकता है। इससे स्वदेशीकरण प्रक्रिया में पारदर्शिता, जवाबदेही और धारणीय परिणाम सामने आएंगे।
निष्कर्ष:
सामरिक स्वायत्तता, आर्थिक विकास और वैश्विक रक्षा नेतृत्व हासिल करने के लिये रक्षा स्वदेशीकरण एवं आधुनिकीकरण के लिये भारत का प्रयास महत्त्वपूर्ण है। उन्नत अनुसंधान एवं विकास, सुव्यवस्थित अधिग्रहण और गहन उद्योग सहयोग के माध्यम से अंतर्निहित मुद्दों का समाधान गति को बनाए रखने के लिये महत्त्वपूर्ण होगा। एक मज़बूत, आत्मनिर्भर रक्षा पारिस्थितिकी तंत्र न केवल राष्ट्रीय सुरक्षा को मज़बूत करेगा बल्कि भारत को सैन्य नवाचार और निर्यात के लिये एक वैश्विक केंद्र के रूप में भी स्थापित करेगा।
दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. भारत की सामरिक स्वायत्तता और वैश्विक प्रभाव को आकार देने में इसके बढ़ते रक्षा उपकरण निर्यात के महत्त्व पर चर्चा कीजिये। |
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