भारतीय राजव्यवस्था
न्यायिक स्थानांतरण और इन-हाउस इन्क्वायरी
- 26 Mar 2025
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प्रिलिम्स के लिये:कॉलेजियम प्रणाली, इन-हाउस इन्क्वायरी प्रक्रिया, भारत के मुख्य न्यायाधीश मेन्स के लिये:भारत में न्यायिक स्थानांतरण, इन-हाउस इन्क्वायरी और महाभियोग प्रक्रिया के बीच तुलना, न्यायिक नैतिकता और सत्यनिष्ठा |
स्रोत: द हिंदू
चर्चा में क्यों?
सर्वोच्च न्यायालय (SC) कॉलेजियम ने दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश (न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा) को इलाहाबाद उच्च न्यायालय में स्थानांतरित करने की सिफारिश की है। यह निर्णय उनके आवास पर "जले हुए नोटों की बोरियाँ" मिलने के आरोपों के तहत लिया गया है।
- इसके साथ ही, घटना की गहन जाँच के लिये भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) संजीव खन्ना द्वारा एक इन-हाउस इन्क्वायरी प्रक्रिया शुरू की गई।
- यह कदम न्यायिक जीवन के मूल्यों के पुनर्स्थापन को कायम रखता है, न्यायिक अखंडता और जवाबदेही सुनिश्चित करता है।
भारत में न्यायिक स्थानांतरण की प्रक्रिया क्या है?
- संवैधानिक प्रावधान: भारतीय संविधान का अनुच्छेद 222 राष्ट्रपति को मुख्य न्यायाधीश की सिफारिश के आधार पर किसी न्यायाधीश (मुख्य न्यायाधीश सहित) को एक उच्च न्यायालय से दूसरे उच्च न्यायालय में स्थानांतरित करने का अधिकार देता है।
- चाहे यह पहला स्थानांतरण हो या बाद का, न्यायाधीश की सहमति आवश्यक नहीं है।
- मुख्य न्यायाधीश और कॉलेजियम की भूमिका: मुख्य न्यायाधीश स्थानांतरण प्रस्ताव प्रस्तुत करते हैं और उनकी राय निर्णायक होती है।
- किसी न्यायाधीश (मुख्य न्यायाधीश नहीं) को स्थानांतरित करने के लिये, मुख्य न्यायाधीश स्थानांतरित करने वाले उच्च न्यायालय और प्राप्तकर्त्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श करता है तथा संबंधित न्यायाधीश के निष्पादन से परिचित एक या अधिक सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के सुझावों पर विचार करता है।
- मुख्य न्यायाधीश के स्थानांतरण के लिये, प्रस्ताव की समीक्षा CJI द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों के साथ मिलकर की जाती है, जो सामूहिक रूप से कॉलेजियम का गठन करते हैं।
- अंतिम निर्णय लेते समय कॉलेजियम न्यायाधीश के व्यक्तिगत पहलुओं, जैसे स्वास्थ्य स्थिति और स्थान संबंधी प्राथमिकताओं पर भी विचार करता है।
- कार्यपालिका की भूमिका: केंद्रीय कानून मंत्री कॉलेजियम की सिफारिश को प्रधानमंत्री के पास भेजते हैं, जो राष्ट्रपति को स्थानांतरण को मंजूरी देने की सलाह देते हैं।
- अनुमोदन के बाद, न्याय विभाग भारत के राजपत्र में स्थानांतरण को अधिसूचित करता है, और संबंधित राज्यों के मुख्य न्यायाधीशों और मुख्यमंत्रियों को सूचित किया जाता है।
- स्थानांतरण का महत्त्व: कार्यभार और विशेषज्ञता में संतुलन बनाकर उच्च न्यायालयों में न्यायिक दक्षता को अनुकूलित करने में सहायता करना।
- यह लंबे कार्यकाल से उत्पन्न होने वाले अनुचित प्रभाव या पूर्वाग्रह को रोकता है तथा निष्पक्षता और न्यायिक कदाचार के बारे में चिंताओं को दूर करके जनता के विश्वास को बनाए रखने में मदद करता है।
इन-हाउस इन्क्वायरी क्या है?
- इन-हाउस इन्क्वायरी: सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 1999 में इन-हाउस इन्क्वायरी प्रक्रिया शुरू की थी। इसकी शुरुआत सी. रविचंद्रन अय्यर बनाम न्यायमूर्ति ए.एम. भट्टाचार्य मामले (वर्ष 1995) से हुई थी, जिसमें महाभियोग (संविधान के अनुच्छेद 124 और 218) की सीमा से नीचे के न्यायिक कदाचार से निपटने के लिये किसी तंत्र के अभाव को उज़ागर किया गया था।
- पाँच सदस्यीय समिति ने वर्ष 1997 में इन-हाउस इन्क्वायरी रूपरेखा का प्रस्ताव रखा, जिसे औपचारिक रूप से वर्ष 1999 में अपनाया गया।
- अतिरिक्त ज़िला एवं सत्र न्यायाधीश 'एक्स' बनाम रजिस्ट्रार जनरल, मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय (2014) में इस प्रक्रिया की पुनः पुष्टि की गई और न्यायिक जाँच के लिये आंतरिक प्रक्रिया का विवरण दिया गया।
- प्रक्रिया: आंतरिक जाँच अथवा इन-हाउस इन्क्वायरी प्रक्रिया तब शुरू होती है जब किसी न्यायाधीश के खिलाफ शिकायत मुख्य न्यायाधीश, उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश या राष्ट्रपति को प्राप्त होती है, यह आवश्यक नहीं है कि यह संसद से शुरू हो।
- यदि मामला विश्वसनीय पाया जाता है तो मुख्य न्यायाधीश संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को प्रारंभिक जाँच किये जाने का निर्देश दे सकता है।
- इस रिपोर्ट के आधार पर, यदि गहन जाँच की आवश्यकता होती है, तो मुख्य न्यायाधीश तीन सदस्यीय समिति (दो मुख्य न्यायाधीश और एक उच्च न्यायालय के न्यायाधीश) का गठन करता है।
- समिति नैसर्गिक न्याय सुनिश्चित करते हुए जाँच करती है, जिससे न्यायाधीश को अनुक्रिया करने का अवसर प्राप्त होता है। CJI को सौंपी जाने वाली अंतिम रिपोर्ट में इसका विवरण देना आवश्यक होता है कि क्या आरोप पुष्ट हैं और क्या उन्हें हटाया जाना चाहिये।
- यदि कदाचार लघु है, तो न्यायाधीश को चेतावनी दी जा सकती है या सलाह दी जा सकती है, तथा रिपोर्ट को गोपनीय रखा जा सकता है (लेकिन रिकॉर्ड में दर्ज किया जा सकता है)।
- यदि कदाचार गंभीर सिद्ध हो जाता है, तो न्यायाधीश को इस्तीफा देने या सेवानिवृत्त होने का निर्देश दिया जा सकता है।
- इनकार करने पर न्यायाधीश को न्यायिक कर्तव्यों से मुक्त किया जा सकता है, और यदि आवश्यक हो तो मुख्य न्यायाधीश महाभियोग की अनुशंसा कर सकते हैं।
न्यायिक जीवन के मूल्यों का पुनर्स्थापन क्या है?
पढ़ने हेतु यहाँ क्लिक कीजिये: न्यायिक जीवन के मूल्यों का पुनर्स्थापन
आंतरिक जाँच बनाम सांविधानिक महाभियोग
पहलू |
आंतरिक जाँच तंत्र |
सांविधानिक महाभियोग |
आधार |
सर्वोच्च न्यायालय के प्रस्तावों के आधार पर (1999) |
संविधान का अनुच्छेद 124(4) (सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को उसके पद से हटाया जाना) और 218 (उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को उनके पद से हटाया जाना) |
प्रयोज्यता |
महाभियोग सीमा से निम्न स्तर का न्यायिक कदाचार |
केवल “सिद्ध कदाचार अथवा असमर्थता” के लिये |
द्वारा शुरू किया गया |
सी.जे.आई., उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश, या राष्ट्रपति |
संसद सदस्य |
प्रक्रिया प्रकार |
आंतरिक, गोपनीय न्यायिक तंत्र |
संसदीय और सार्वजनिक प्रक्रिया |
परिणाम |
त्यागपत्र/सेवानिवृत्ति की सलाह, चेतावनी अथवा अनुशंसा |
राष्ट्रपति आदेश द्वारा पद से हटाया जाना |
संसद की भूमिका |
कोई संलिप्तता नहीं |
दोनों सदनों में 2/3 बहुमत की आवश्यकता |
पारदर्शिता |
न्यायिक गरिमा की रक्षा हेतु गोपनीय प्रक्रिया |
सार्वजनिक और मीडिया-दृश्य प्रक्रिया |
अंतिम प्राधिकारी |
भारत के मुख्य न्यायाधीश |
भारत के राष्ट्रपति (संसद में मतदान के पश्चात् प्रधानमंत्री के परामर्श पर) |
दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. भारत में न्यायाधीशों के लिये आंतरिक जाँच की प्रक्रिया क्या है? न्यायिक कदाचार का इसमें किस प्रकार प्रावधान किया गया है? |
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्नप्रिलिम्स:प्रश्न. भारतीय न्यायपालिका के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2021)
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? (a) केवल 1 उत्तर: (c) मेन्स:प्रश्न. भारत में उच्च न्यायपालिका के न्यायाधीशों की नियुक्ति के संदर्भ में 'राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग अधिनियम, 2014' पर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिये। (2017) |