भारत की प्राचीन जल संचयन प्रणाली | 09 Dec 2024

प्रिलिम्स:

श्रीकृष्ण देवराय, नल्लामाला की पहाड़ियाँ, पूर्वी घाट, कुरुमा जनजाति, बावली, कुहल, शोम्पेन जनजाति, ग्रेट निकोबार द्वीप समूह, धोलावीरा, लोथल, अर्थशास्त्र, सातवाहन, चोल काल, फिरोज शाह तुगलक, जल जीवन मिशन, झालारा, अहार पाइंस, ज़िंग, ज़ाबो।

मेन्स:

भारत की प्राचीन जल संचयन प्रणाली की विभिन्न विधियाँ।

चर्चा में क्यों? 

हाल ही में आंध्रप्रदेश का कुंबुम टैंक अपनी प्राचीन जल संचयन प्रणाली के कारण चर्चा में था।

  • कुंबुम टैंक, जो कि एक मध्यम सिंचाई परियोजना है, यह एशिया में दूसरा तथा विश्व में तीसरा सबसे बड़ा मानव निर्मित जलाशय है।

कुंबुम टैंक से संबंधित मुख्य बातें क्या हैं?

  • निर्माण: टैंक का निर्माण 1522-1524 ईस्वी के दौरान श्रीकृष्ण देवराय की पत्नी अर्थात् विजयनगर की राजकुमारी वरदराजम्मा (जिन्हें रुचिदेवी के नाम से भी जाना जाता है) द्वारा किया गया था।
    • इसका निर्माण एक घाटी पर बांध बनाकर किया गया था, जिसके माध्यम से गुंडलकम्मा और जम्पलेरु नदियाँ प्रवाहित होती हैं।
  • भौगोलिक विशेषताएँ: इस जलाशय को नल्लामल्लावगु (Nallamallavagu) से जल की प्राप्ति होती है, जो पूर्वी घाट में नल्लामाला की पहाड़ियों से निकलने वाली एक धारा है और गुंडलकम्मा नदी परितंत्र का भाग है।
  • तकनीकी और स्वदेशी ज्ञान: ब्रिटिश इंजीनियर सर आर्थर कॉटन (दक्षिण भारत में सिंचाई कार्यों के अग्रणी) ने पाया कि बगैर किसी सुदृढ़ या सघन तटों के बनाए गए मिट्टी के बाँध (तटबंध) लंबे समय तक प्रभावी रूप से स्थिर रहते हैं।
    • पोखरी तट मूल भूमि स्तर एवं इसके ऊपर किसी भी नवीन सामग्री के बीच मिट्टी की एक ऊर्ध्वाधर दीवार बनी हुई है।
  • पुनरुद्धार के प्रयास: आंध्रप्रदेश सरकार ने जापानी अंतर्राष्ट्रीय सहयोग एजेंसी (JICA) के सहयोग से टैंक का आधुनिकीकरण किया है।

भारत की प्राचीन जल संचयन प्रणालियाँ क्या हैं?

संरचना

विवरण

क्षेत्र

प्रमुख विशेषताऐं

बावली

मेहराब, नक्काशीदार आकृतियाँ और कमरों के साथ सीढ़ीनुमा संरचना। न्यून वर्षा वाले क्षेत्रों में शहरी जल भंडारण का अभिन्न अंग।

राजस्थान, दिल्ली, गुजरात, कर्नाटक। जैसे, चंडी बावड़ी, राजस्थान, अग्रसेन की बावली, दिल्ली

नक्काशी, कमरे, स्तरित सीढ़ियाँ, मौसमी जल संग्रह।

झालारा

तीन या चार तरफ स्तरित सीढ़ियों वाली आयताकार बावड़ियाँ, जिन्हें जलाशयों या झीलों से जल एकत्रित करने के लिये बनाया गया है।

राजस्थान

स्तरित सीढ़ियाँ, आयताकार।

तालाब/बांधी (Bandhi)

मध्यम आकार के जलाशय , प्राकृतिक या मानव निर्मित, जल प्रवाह को नियंत्रित करते हैं और बाढ़ को रोकते हैं।

विभिन्न क्षेत्र

जलाशय, जल प्रवाह विनियमन।

टाँका (Taanka)

छतों या जलग्रहण क्षेत्रों से वर्षा जल एकत्र करने के लिये बनाया गया बेलनाकार भूमिगत कुआँ।

थार रेगिस्तान, राजस्थान

भूमिगत, बेलनाकार, पक्का।

अहार पाइंस

बाढ़ के जल को संचय करने के लिये डायवर्सन चैनलों के अंत में तटबंधों के साथ जलाशय बनाए जाते हैं।

दक्षिण बिहार

तटबंध, बाढ़ जल संचयन।

जोहड़

तीन तरफ से ऊँचे क्षेत्रों की खुदाई करके मृदा के भंडारण गड्ढे बनाए जाते हैं, जिनमें चौथी तरफ मिट्टी का उपयोग किया जाता है।

विभिन्न क्षेत्र

मिट्टी के गड्ढे, ऊँचे क्षेत्र में खुदाई।

पनाम केनी

ताड़ी के पेड़ के भीगे हुए तने से बने बेलनाकार कुएं पवित्र माने जाते हैं।

वायनाड, केरल

बेलनाकार, पवित्र, ताड़ी ताड़ के तने।

खड़ीन (धोरा)

पहाड़ी ढलानों पर लम्बे मिट्टी के तटबंध , जो कृषि के लिए सतही जल को एकत्रित करते हैं।

जैसलमेर, राजस्थान

मिट्टी के तटबंध, सतही अपवाह संग्रहण।

कुंड

तश्तरी के आकार का जलग्रहण क्षेत्र जिसमें एक केंद्रीय गोलाकार भूमिगत कुआँ है, जो पारंपरिक रूप से चूने और राख से बना है।

भारत भर के विभिन्न क्षेत्रों में।

जलग्रहण क्षेत्र, वृत्ताकार कुआँ, पारंपरिक अस्तर।

जिंग

लद्दाख में छोटे-छोटे तालाब ग्लेशियर के पिघले पानी को इकट्ठा करते हैं, जो दोपहर तक धाराओं में बदल जाता है।

लद्दाख

छोटे टैंक, ग्लेशियर जल संग्रहण।

कुहल्स

हिमाचल प्रदेश में सतही जल चैनल हिमनदों के जल को खेतों तक ले जाते हैं।

हिमाचल प्रदेश

सतही चैनल, हिमनद जल.

ज़ाबो

नगालैंड में जल संरक्षण को वानिकी, कृषि और पशु देखभाल के साथ संयोजित करने वाली प्रणाली।

नगालैंड

वर्षा जल संग्रहण, तालाब जैसी संरचनाएँ, सीढ़ीदार पहाड़ी ढलानें।

जैकवेल्स

शोम्पेन जनजाति द्वारा अपनाई जाने वाली प्रथा, दृढ़ लकड़ी के लट्ठों से बने बांधों से घिरे गड्ढे।

ग्रेट निकोबार द्वीप समूह

गड्ढे, दृढ़ लकड़ी के बाँध।

Baoli Jhalara

भारतीय इतिहास में जल प्रबंधन

  • सिंधु घाटी सभ्यता: धौलावीरा में वर्षा जल एकत्र करने के लिये जलाशय थे, जबकि लोथल और इनामगाँव में सिंचाई तथा पीने के पानी को संग्रहीत करने हेतु छोटे बाँध बनाए गए थे।
  • मौर्य साम्राज्य: कौटिल्य के अर्थशास्त्र में बाँधों सहित व्यापक सिंचाई प्रणालियों का उल्लेख है, जिन्हें सख्त नियमों के तहत प्रबंधित किया जाता था।
    • जल के स्रोत और निष्कर्षण की विधि के आधार पर कर लगाए गए।
  • प्रारंभिक मध्यकालीन भारत: सातवाहनों ने ईंट और रिंग कुओं का प्रचलन शुरू किया।
    • चोल काल में कुशल जल वितरण के लिये चेन टैंक (अंतरसंबंधित टैंक) जैसी उन्नत प्रणालियाँ देखी गईं।
    • राजपूतों ने बड़े जलाशयों का निर्माण किया, जैसे कि राजा भोज के अधीन भोपाल झील, जबकि पाल और सेन राजवंशों ने पूर्वी भारत में कई टैंक और झीलों का निर्माण किया।
  • मध्यकालीन काल: फिरोज शाह तुगलक ने पश्चिमी यमुना नहर का निर्माण किया, जबकि सम्राट शाहजहाँ ने बारी दोआब या हस्ली नहर का विकास किया।
    • विजयनगर साम्राज्य ने अनंतराज सागर और कोरंगल बाँध जैसे टैंकों का निर्माण किया।
    • सुल्तान ज़ैनुद्दीन ने कश्मीर में एक व्यापक नहर नेटवर्क स्थापित किया।

जल संचयन प्रणाली क्या है?

  • परिचय: जल संचयन प्रणाली एक ऐसी तकनीक या संरचना है जिसे वर्षा जल, सतही अपवाह या जल के अन्य स्रोतों को विभिन्न प्रयोजनों, जैसे कृषि, घरेलू उपयोग और भू-जल पुनर्भरण हेतु संग्रहित करने और उपयोग करने के लिये डिज़ाइन किया गया है। 
    • यह एक स्थायी जल प्रबंधन पद्धति है जिसका उद्देश्य जल संरक्षण और जल की कमी को दूर करना है।
  • प्रकार:  
    • वर्षा जल संचयन (RWH): जल संरक्षण के क्रम में छत एवं भूमिगत भंडारण जैसी विधियों के माध्यम से वर्षा जल को एकत्रित एवं संग्रहीत करना।
    • भू-जल पुनर्भरण प्रणालियाँ: इसमें ऐसी तकनीकें शामिल हैं जो भू-जल स्तर को बनाए रखने तथा उसमें सुधार करने के क्रम में वर्षा जल को भूमि में पहुँचाने में सहायक हैं।
    • सतही जल संचयन: सिंचाई एवं अन्य उपयोगों हेतु तालाबों तथा जलाशयों का उपयोग करके भूमि या खेतों से प्रवाहित होने वाले वर्षा जल को एकत्र करना।
    • शहरी जल संचयन: शहरों में छतों तथा भूमि से वर्षा जल को संग्रहित करना, जिससे नगरपालिका की जल प्रणालियों पर दबाव कम होने के साथ जल का प्रबंधन हो सके।
  • महत्त्व: 
    • विश्वसनीय जल स्रोत: इससे दैनिक उपयोग हेतु जल आपूर्ति सुनिश्चित होती है। इसके साथ ही भू-जल की गुणवत्ता बेहतर होने के साथ तटीय क्षेत्रों में समुद्री जल जमाव की समस्या का समाधान होता है।
    • बाढ़ की रोकथाम: बाढ़ के जोखिम के साथ जलभराव की समस्या का समाधान होने से संपत्ति एवं बुनियादी ढाँचे की सुरक्षा होती है। इससे भूमि कटाव एवं बाढ़ में कमी आने से पर्यावरण तथा संपत्ति की रक्षा होती है।
    • भू-जल पुनर्भरण: इससे शुष्क अवधि के दौरान जल की उपलब्धता बढ़ती है। इसके साथ ही यह सतही अपवाह को कम करने, मृदा को संरक्षित करने तथा जल निकायों में अवसादन को रोकने में सहायक है।
    • स्थिरता: यह जल संरक्षण के साथ बढ़ते शहरीकरण के आलोक में जल सुरक्षा सुनिश्चित करने पर केंद्रित है।

जल संरक्षण से संबंधित भारत की पहल क्या हैं? 

निष्कर्ष

जल संचयन में भारत का समृद्ध इतिहास (बावड़ियों जैसी प्राचीन प्रणालियों से लेकर जल जीवन मिशन जैसी आधुनिक पहलों तक) रहा है। ऐतिहासिक एवं समकालीन, दोनो ही दृष्टिकोण अभिनव जल संरक्षण को बढ़ावा देने तथा जल की सुलभता सुनिश्चित करने के साथ देश भर के विविध जलवायु क्षेत्रों में कृषि को समर्थन देने पर केंद्रित हैं।

दृष्टि मुख्य परीक्षा प्रश्न:

प्रश्न: भारत के विभिन्न भागों में प्रचलित पारंपरिक जल संरक्षण प्रणालियों पर चर्चा कीजिये।

  UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्षों के प्रश्न  

प्रिलिम्स:

Q. 'एकीकृत जलसंभर विकास कार्यक्रम' को कार्यान्वित करने के क्या लाभ हैं? (2014)

  1. मृदा अपवाह की रोकथाम
  2.  देश की बारहमासी नदियों को मौसमी नदियों से जोड़ना
  3.  वर्षा-जल संग्रहण तथा भौम-जलस्तर का पुनर्भरण
  4.  प्राकृतिक वनस्पतियों का पुनर्जनन

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:

(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2, 3 और 4
(c) केवल 1, 3 और 4
(d) 1, 2, 3 और 4

उत्तर: (c)


मेन्स

Q. जल तनाव क्या है? भारत में यह क्षेत्रीय स्तर पर कैसे और क्यों भिन्न है? (2019)

Q. “भारत में घटते भू-जल संसाधनों का आदर्श समाधान जल संचयन प्रणाली है”। इसे शहरी क्षेत्रों में किस प्रकार प्रभावी बनाया जा सकता है? (2018)