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गोरखा समुदाय संबंधी चिंताएँ
- 04 Apr 2025
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स्रोत: पी.आई.बी
चर्चा में क्यों?
गृह मंत्रालय (MHA) ने गोरखा समुदाय के प्रमुख प्रतिनिधियों के साथ नई दिल्ली में एक बैठक का आयोजन किया, जिसका उद्देश्य लंबे समय से लंबित उनकी चिंताओं का समाधान करना था।
गोरखा कौन हैं?
- गोरखा (जिन्हें गुरखा भी कहते हैं) एक मार्शल समुदाय है जिसका उदय नेपाल से हुआ और यह अपनी बहादुरी, वफादारी और प्रवीण युद्ध कौशल के लिये विख्यात है।
- गोरखाओं का नाम पश्चिमी नेपाल के गोरखा साम्राज्य से उद्भूत हुआ है। गोरखा राजा पृथ्वी नारायण शाह (1743-75) ने नेपाल को एकीकृत किया और गोरखा शक्ति का विस्तार किया।
- नृजातीयता: गोरखा एक एकल जातीय समूह नहीं है अपितु इसमें नेपाल के पर्वतीय क्षेत्रों के गुरुंग, मगर, रईस, लिंबू और अन्य कई जातीय समूह शामिल हैं।
- गोरखा रेजिमेंट: क्रूर योद्धा के रूप में उनकी प्रतिष्ठा ने उन्हें विभिन्न सेनाओं, विशेषकर ब्रिटिश, भारतीय और नेपाली सेनाओं में सेवा करने के लिये प्रेरित किया।
- एंग्लो-नेपाल युद्ध (1814-1816) के बाद, जिसे गोरखा युद्ध भी कहते हैं, अंग्रेज़ों ने गोरखाओं को ब्रिटिश सेना में भर्ती किया।
- गोरखा रेजिमेंट एंग्लो-नेपाल युद्ध के बाद वर्ष 1815 से भारतीय सेना का हिस्सा रही है।
गोरखाओं की चिंताएँ क्या हैं?
- गोरखालैंड की मांग: दार्जिलिंग, तराई और दुआर (Dooars) को शामिल करते हुए एक अलग गोरखालैंड राज्य की मांग 1980 के दशक से गोरखा पहचान की राजनीति के केंद्र में रही है।
- गोरखा नेताओं का मानना है कि राज्य का दर्जा उन्हें राजनीतिक मान्यता, सांस्कृतिक स्वायत्तता और प्रशासनिक सशक्तीकरण प्रदान करेगा।
- गोरखा भारत के भीतर संवैधानिक और सांस्कृतिक मान्यता चाहते हैं, जिसमें उनकी भाषा, रीति-रिवाज और विशिष्ट जातीय पहचान की सुरक्षा भी शामिल है।
- अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा: कई गोरखा समुदाय जैसे राय, लिंबू, गुरुंग, तमांग और अन्य दशकों से ST दर्जे की मांग कर रहे हैं।
- इस मान्यता से सामाजिक न्याय, शैक्षिक अवसर और सकारात्मक कार्यवाही के लाभ प्राप्त होंगे।
- केंद्र द्वारा बार-बार आश्वासन दिये जाने के बावजूद इस प्रक्रिया में कोई सार्थक प्रगति नहीं हुई है।
- अग्निपथ योजना: भारत की अग्निपथ योजना, जो केवल चार वर्ष की सेवा प्रदान करती है, तथा सेवा में बने रहने तक कोई पेंशन नहीं देती, जिससे नेपाली गोरखाओं में नौकरी की असुरक्षा की आशंका बढ़ गई है।
- नेपाल इसे वर्ष 1947 के त्रिपक्षीय समझौते का उल्लंघन मानता है, जिसमें स्थायी सेवा और पेंशन लाभ सुनिश्चित किया गया था।
- भू-राजनीतिक तनाव: इसके अतिरिक्त, भू-राजनीतिक तनाव भी उभर कर सामने आया है, तथा रिपोर्टें (जैसे कि ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन) बताती हैं कि चीन की गोरखाओं की भर्ती में रुचि है। राजनयिक समाधान अभी भी लंबित है, तथा उम्मीदें भारत और नेपाल के बीच उच्च स्तरीय वार्ता पर टिकी हैं।
और पढ़ें: गोरखा सैनिकों पर वर्ष 1947 का त्रिपक्षीय समझौता
दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न: भारत में गोरखा समुदाय के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विकास का विश्लेषण कीजिये। |