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सामाजिक न्याय

भारत में सिंथेटिक ड्रग की तस्करी

  • 03 Apr 2025
  • 13 min read

प्रिलिम्स के लिये:

सिंथेटिक ड्रग, नए साइकोएक्टिव पदार्थ, डार्क नेट, गोल्डन क्रिसेंट, नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो, नशा मुक्त भारत अभियान

मेन्स के लिये:

ड्रग की तस्करी और राष्ट्रीय सुरक्षा, ड्रग पर नियंत्रण के लिये कानूनी और नीतिगत रूपरेखा, सार्वजनिक स्वास्थ्य और ड्रग की लत

स्रोत:बिज़नेस लाइन

चर्चा में क्यों?

भारत सिंथेटिक ड्रग तस्करी में वृद्धि का सामना कर रहा है। प्रतिक्रियास्वरूप, हरियाणा के नारकोटिक्स नियंत्रण ब्यूरो ने नेटवर्क पर नज़र रखने, प्रीकर्सर केमिकल्स की निगरानी करने तथा राज्य में अवैध प्रयोगशालाओं को नष्ट करने के लिये एक एंटी-सिंथेटिक नारकोटिक्स टास्क फोर्स का गठन किया है।

सिंथेटिक ड्रग्स क्या हैं? 

  • परिचय: सिंथेटिक ड्रग पूर्णतः प्रयोगशालाओं में प्रीकर्सर केमिकल्स (एक यौगिक जो रासायनिक अभिक्रिया में भाग लेता है जिससे एक अन्य यौगिक बनता है) का उपयोग करके बनाई जाती हैं और इसमें किसी भी पादप-आधारित घटक की आवश्यकता नहीं होती है।
  • ड्रग्स का वर्गीकरण:

वर्ग

स्रोत

उदाहरण

नेचुरल ड्रग्स

सीधे पादपों से

अफीम पोस्ता (पैपावर सोमनीफेरम), कैनबिस, कोका

सेमी-सिंथेटिक ड्रग्स

नेचुरल ड्रग्स से रासायनिक रूप से संशोधित

मॉर्फिन, कोडीन, हेरोइन, कोकीन

सिंथेटिक ड्रग्स

पूर्णतः प्रयोगशाला में निर्मित

एम्फेटामाइन्स, एक्स्टसी, डायज़ेपाम, मेथाक्वालोन 

सिंथेटिक ड्रग्स के संबंध में चिंताएँ क्या हैं?

  • तीव्र नवप्रवर्तन से खामियाँ: सिंथेटिक ड्रग्स को प्रायः नए साइकोएक्टिव पदार्थ (NPS) बनाने के लिये संशोधित किया जाता है, जो स्वापक औषधि और मन:प्रभावी पदार्थ अधिनियम (NDPS), 1985 के दायरे से बाहर होते हैं ।
    • उदाहरण के लिये, फेंटानिल के अनुरूप पदार्थ भारतीय एजेंसियों द्वारा मादक द्रव्यों के रूप में वर्गीकृत करने से पहले ही तेज़ी से सामने आ गए हैं, जिससे प्रवर्तन प्रयासों में बाधा उत्पन्न हो रही है।
  • उत्पादन में आसानी: पादप-आधारित मादक द्रव्यों के विपरीत, सिंथेटिक ड्रग्स का उत्पादन आसानी से उपलब्ध प्रीकर्सर केमिकल्स का उपयोग करके छोटी, अवैध प्रयोगशालाओं में किया जा सकता है।
    • यह विकेंद्रीकृत मॉडल पता लगाने और उसे नष्ट करने को अधिक कठिन बना देता है।
  • पहचान में कठिनता: हेरोइन, कैनबिस और पोस्ता भूसी जैसी पारंपरिक ड्रग्स के लिये व्यापक आपूर्ति शृंखला की आवश्यकता होती है, जिसमें प्रायः सीमा पार से तस्करी शामिल होती है। हालाँकि, सिंथेटिक ड्रग्स को अक्सर वैध औद्योगिक या फार्मास्युटिकल खेपों के भीतर छिपा दिया जाता है।
    • सीमा पर जाँच और स्निफर डॉग जैसे पारंपरिक तरीके कम प्रभावी हैं।
    • तस्करी करने वाले नेटवर्क एन्क्रिप्टेड वित्तीय लेनदेन चैनलों के लिये डार्क नेट, क्रिप्टोकरेंसी और ब्लॉकचेन तकनीक पर तेज़ी से निर्भर हो रहे हैं। इससे वित्तीय लेनदेन और आपूर्ति शृंखलाओं पर नज़र रखना काफी जटिल हो जाता है।
  • उच्च क्षमता और घातकता: फेंटानिल जैसी सिंथेटिक ड्रग्स अत्यंत शक्तिशाली होती हैं, यहाँ तक ​​कि इनकी छोटी खुराक भी घातक हो सकती है।
    • विशेषकर युवाओं में सिंथेटिक ड्रग्स की कम कीमत और उच्च उपलब्धता के कारण बड़े पैमाने पर ड्रग की लत का खतरा बढ़ जाता है। भारतीय राज्यों में सिंथेटिक ड्रग्स से प्रेरित मनोविकृति, अपराध और पढ़ाई छोड़ने वालों की संख्या में वृद्धि देखी जा रही है।
  • भारत पर वैश्विक सिंथेटिक ड्रग्स का प्रभाव: सिंथेटिक ड्रग्स उत्पादन में वैश्विक बदलाव के कारण भारत को कम जोखिम वाले, उच्च पहुँच वाले क्षेत्रों में महत्त्वपूर्ण चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। 
    • भारत, चीन के साथ सक्रिय दवा सामग्री (API) के प्रमुख उत्पादकों में से एक है, तथा गोल्डन क्रीसेंट और गोल्डन ट्राइंगल के बीच स्थित होने के कारण, वैध रसायनों को अवैध ड्रग्स निर्माण में बदलने से रोकने के लिये संघर्ष करता है।
    • ऑनलाइन मंचों और ट्यूटोरियल्स के उदय ने गैर-विशेषज्ञों के लिये सिंथेटिक ड्रग्स का संश्लेषण करना आसान बनाकर कानून प्रवर्तन प्रयासों और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रतिक्रियाओं को और अधिक जटिल बना दिया है।

भारत में औषधि के उपयोग संबंधी विधिक ढाँचा

  • भारत में स्वापक औषधियों और मन:प्रभावी पदार्थों पर राष्ट्रीय नीति भारतीय संविधान के अनुच्छेद 47 पर आधारित है, जो राज्य को औषधीय प्रयोजनों के अतिरिक्त मादक पदार्थों के सेवन पर प्रतिबंध लगाने का अधिकार देता है।
  • भारत की औषधि नियंत्रण नीति तीन प्रमुख अधिनियमों- औषधि और प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940, स्वापक औषधि और मन:प्रभावी पदार्थ (NDPS) अधिनियम, 1985, तथा स्वापक औषधि और मन:प्रभावी पदार्थ अवैध व्यापार निवारण अधिनियम, 1988- द्वारा विनियमित है। 
  • औषधियों के दुरुपयोग पर नियंत्रण करने का कार्य एक केंद्रीय कार्य है। वित्त मंत्रालय, राजस्व विभाग के माध्यम से, NDPS अधिनियम, 1985 और NDPS अधिनियम, 1988 में अवैध तस्करी की रोकथाम के कार्यान्वयन की देखरेख करता है। 
    • प्रवर्तन को सुदृढ़ बनाने हेतु, वर्ष 1986 में स्वापक नियंत्रण ब्यूरो (NCB) की स्थापना की गई, जो मादक द्रव्यों की तस्करी के खिलाफ कार्रवाई के समन्वय और औषधि के उपयोग संबंधी नियंत्रण उपायों को लागू करने के लिये ज़िम्मेदार केंद्रीय प्राधिकरण है।

भारत में सिंथेटिक ड्रग को विनियमित करने हेतु किन सुधारों की आवश्यकता है?

  • विधायी आधुनिकीकरण: उभरते रासायनिक रूपों पर पहले से नियंत्रण करने के लिये दवाओं की जेनेरिक अनुसूची को शामिल करने के लिये NDPS अधिनियम में संशोधन करने की आवश्यकता है, जिससे तस्करों द्वारा विधायी विलंब के कारण इसका दुरुपयोग किये जाने की संभावना को कम किया जा सकेगा।
    • उभरते NPS को वर्गीकृत करने के लिये गृह मंत्रालय के अंतर्गत एक फास्ट-ट्रैक तंत्र स्थापित किया जाना चाहिये।
  • राष्ट्रीय प्रीकर्सर नियंत्रण नेटवर्क: हरियाणा का सिंथेटिक नारकोटिक्स-रोधी टास्क फोर्स, अवैध डायवर्जन का पता लगाने और उसकी रोकथाम करने हेतु राज्य खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) के सहयोग से वास्तविक समय में रासायनिक ट्रैकिंग प्रणाली का उपयोग करता है।
    • इसका विस्तार करते हुए, एक राष्ट्रीय अग्रदूत निगरानी प्रणाली के अंतर्गत राज्य FDA और निर्माताओं को एकीकृत किया जाना चाहिये तथा यह सुनिश्चित करना चाहिये कि प्रत्येक लेनदेन को लॉग किया जाए, उसका विश्लेषण किया जाए, और अनियमितताओं को चिह्नित किया जाए और साथ ही संदिग्ध थोक लेनदेन के लिये AI-संचालित अलर्ट भी जारी किया जाए।
  • डिजिटल निगरानी: क्रिप्टोकरेंसी-चालित दवा भुगतानों का पता लगाने के लिये चेनैलिसिस जैसे वैश्विक ब्लॉकचेन फोरेंसिक उपकरणों को एकीकृत करने तथा डिजिटल वित्तीय निगरानी में सुधार करने एवं सिंथेटिक दवा तस्करी से निपटने के प्रयासों को सुदृढ़ करने की आवश्यकता है।
  • अंतर्राष्ट्रीय समन्वय: भारत को वैश्विक सिंथेटिक ड्रग कार्टेल से निपटने के लिये नारकोटिक ड्रग्स पर एकल कन्वेंशन (1961), साइकोट्रोपिक पदार्थों पर कन्वेंशन (1971) और अवैध तस्करी के विरुद्ध संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन (1988) जैसे संयुक्त राष्ट्र अभिसमयों में अपनी भागीदारी का लाभ उठाना चाहिये।
    • पारराष्ट्रीय प्रयासों को सुदृढ़ करने तथा मादक पदार्थ नियंत्रण उपायों में सुधार करने हेतु आसूचना  साझा करने तथा सर्वोत्तम प्रथाओं के लिये INTERPOL के साथ सहयोग किया जाना चाहिये।
  • स्वास्थ्य और जागरूकता उपाय: मादक पदार्थों की मांग में कमी के लिये राष्ट्रीय कार्य योजना (NAPDDR) के तहत नशामुक्ति के बुनियादी ढाँचे का विस्तार करने और विशेष रूप से युवाओं और नगरीय क्षेत्रों में सिंथेटिक दवाओं के खतरों पर नशा मुक्त भारत अभियान (NMBA) के तहत लक्षित अभियान शुरू करने की आवश्यकता है।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न. सिंथेटिक ड्रग्स परंपरागत नार्कोटिक ड्रग्स से किस प्रकार भिन्न हैं तथा उन्हें विनियमित करना अधिक कठिन क्यों है? 

  UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न  

मेन्स:

प्रश्न. केस स्टडी: एक सीमांत राज्य के एक ज़िले में स्वापकों (नशीले पदार्थों) का खतरा अनियंत्रित हो गया है। इसके परिणामस्वरूप काले धन का प्रचलन, पोस्त की खेती में वृद्धि, हथियारों की तस्करी व्यापक हो गई है तथा शिक्षा व्यवस्था लगभग ठप हो गई है। संपूर्ण व्यवस्था एक प्रकार से समाप्ति के कगार पर है। इन अपुष्ट खबरों से कि स्थानीय राजनेता और कुछ पुलिस उच्चाधिकारी भी ड्रग माफिया को गुप्त संरक्षण दे रहे हैं, स्थिति और भी बदतर हो गई है। ऐसे समय परिस्थिति को सामान्य करने के लिये एक महिला पुलिस अधिकारी जो ऐसी परिस्थिति से निपटने के लिये अपने कौशल के लिये जानी जाती है, पुलिस अधीक्षक के पद पर नियुक्त किया जाता है।

प्रश्न. यदि आप वही पुलिस अधिकारी हैं तो संकट के विभिन्न आयामों को चिह्नित कीजिये। अपनी समझ के अनुसार, संकट का सामना करने  के उपाय भी सुझाइये। (2019)

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