अंतर्राष्ट्रीय संबंध
‘काबुल’ पर तालिबान का नियंत्रण
प्रिलिम्स के लियेउत्तरी अटलांटिक संधि संगठन, तालिबान, अफगानिस्तान की भौगोलिक अवस्थिति मेन्स के लियेअफगानिस्तान संघर्ष की पृष्ठभूमि और भारत के लिये इसके निहितार्थ |
चर्चा में क्यों?
हाल ही में तालिबान ने अफगानिस्तान की राजधानी काबुल पर कब्ज़ा कर लिया, जिससे अमेरिका और ‘नाटो’ (उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन) द्वारा प्रशिक्षित अफगान बलों पर प्रश्न उठ रहे हैं।
- तालिबान ने घोषणा की है कि किसी के साथ भी हिंसा नहीं की जाएगी और वह शांतिपूर्ण ट्रांज़िशन प्रक्रिया का सम्मान करेगा, साथ ही भविष्य में ऐसी इस्लामी व्यवस्था के लिये काम किया जाएगा, जो सभी को स्वीकार्य हो।
तालिबान
- तालिबान (पश्तो भाषा में ‘छात्र’) 1990 के दशक की शुरुआत में अफगानिस्तान से सोवियत सैनिकों की वापसी के बाद उत्तरी पाकिस्तान में उभरा एक आतंकवादी संगठन है।
- वर्तमान में यह अफगानिस्तान में सक्रिय एक इस्लामी कट्टरपंथी राजनीतिक और सैन्य संगठन है। यह काफी समय से अफगान राजनीति में एक महत्त्वपूर्ण स्थिति में था।
- तालिबान बीते लगभग 20 वर्षों से काबुल में अमेरिकी समर्थित सरकार के खिलाफ लड़ रहा है। वह अफगानिस्तान में इस्लाम के सख्त रूप को फिर से लागू करना चाहता है।
प्रमुख बिंदु
पृष्ठभूमि
- आतंकवादी हमले
- 11 सितंबर, 2001 को अमेरिका में हुए आतंकवादी हमलों में लगभग 3,000 लोग मारे गए थे।
- इस हमले के लगभग एक महीने बाद अमेरिका ने अफगानिस्तान (ऑपरेशन एंड्योरिंग फ्रीडम) के खिलाफ हवाई हमले शुरू कर दिये।
- अफगानिस्तान में ट्रांज़िशनल सरकार
- हमलों के बाद नाटो गठबंधन सैनिकों ने अफगानिस्तान के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी। कुछ ही समय में अमेरिका ने तालिबान शासन को उखाड़ फेंका और अफगानिस्तान में एक ट्रांज़िशनल सरकार की स्थापना की।
- अमेरिका बहुत पहले इस निष्कर्ष पर पहुँच गया था कि यह युद्ध अजेय है और शांति वार्ता ही इसे खत्म करने का एकमात्र उपाय है।
- शांति वार्ता
- ‘मुरी' वार्ता
- वर्ष 2015 में अमेरिका ने तालिबान और अफगान सरकार के बीच पहली बैठक में एक प्रतिनिधि भेजा था, जिसकी मेज़बानी पाकिस्तान द्वारा वर्ष 2015 में ‘मुरी’ में की गई थी।
- हालाँकि 'मुरी' वार्ता से कुछ प्रगति हासिल नहीं की जा सकी थी।
- वर्ष 2015 में अमेरिका ने तालिबान और अफगान सरकार के बीच पहली बैठक में एक प्रतिनिधि भेजा था, जिसकी मेज़बानी पाकिस्तान द्वारा वर्ष 2015 में ‘मुरी’ में की गई थी।
- दोहा वार्ता
- वर्ष 2020 में दोहा वार्ता की शुरुआत से पूर्व तालिबान ने स्पष्ट किया कि वे केवल अमेरिका के साथ प्रत्यक्ष वार्ता करेंगे, न कि काबुल सरकार के साथ।
- इसके पश्चात् हुए एक समझौते में अमेरिकी प्रशासन ने वादा किया कि वह 1 मई, 2021 तक अफगानिस्तान से सभी अमेरिकी सैनिकों को वापस बुला लेगा।
- कुछ समय बाद इस समयसीमा को बढ़ाकर 11 सितंबर, 2021 कर दिया गया है।
- इस समझौते के कारण तालिबान को एक जीत का संकेत मिला और साथ ही अफगान सैनिकों का मनोबल भी काफी प्रभावित हुआ।
- समझौते के तहत तालिबान ने हिंसा को कम करने, अंतर-अफगान शांति वार्ता में शामिल होने और विदेशी आतंकवादी समूहों के साथ सभी संबंधों को समाप्त करने का वादा किया।
- ‘मुरी' वार्ता
- अमेरिका की वापसी
- अमेरिका ने दावा किया कि उसने जुलाई 2021 तक अपने 90% सैनिकों को वापस बुला लिया था और तालिबान इस समय तक अफगानिस्तान के 85% से अधिक क्षेत्र को अपने नियंत्रण में ले चुका था।
वर्तमान परिदृश्य:
- तालिबान ने काबुल पर कब्ज़ा कर लिया है और पूर्व राष्ट्रपति सहित कई मंत्री देश छोड़कर भाग गए हैं।
- 20 वर्ष पहले 9/11 के हमलों के मद्देनज़र उनके निष्कासन के बाद यह पहली बार है कि तालिबान लड़ाके शहर में प्रवेश कर चुके हैं, तालिबान ने पहली बार वर्ष 1996 में राजधानी पर कब्ज़ा कर लिया था।
- कब्ज़ा किये जाने वाले शहरों में पूर्व में स्थित जलालाबाद है और कई शहर निशाने पर हैं।
आत्मसमर्पण का कारण:
- अमेरिका की 'अशर्त निकासी':
- अमेरिका ने बिना किसी बातचीत के राजनीतिक समाधान की प्रतीक्षा किये बिना अपने सैनिकों को बिना शर्त वापस बुलाने का निर्णय लिया।
- अफगान का मनोवैज्ञानिक इनकार:
- अफगानिस्तान का मनोवैज्ञानिक तौर पर यह इनकार करना कि अमेरिका वास्तव में उन्हें छोड़ देगा, सैन्य रणनीति की कमी, खराब आपूर्ति और रसद, अनिश्चित और कम मानवयुक्त पद, अवैतनिक पद और विश्वासघात, परित्याग और मनोबल में कमी, सभी ने समर्पण में भूमिका निभाई।
- अफगान की अमेरिका पर हवाई सहायता, हथियार प्रणाली, खुफिया आदि के लिये तकनीकी निर्भरता थी।
- तैयारी का अभाव:
- अफगान सेना तैयार नहीं थी और तालिबान के आक्रमण से चकित रह गई।
- अफगान बलों के प्रशिक्षण की कमी:
- अफगान राष्ट्रीय सेना वास्तव में कभी भी प्रशिक्षित नहीं थी और ऊबड़-खाबड़ इलाकों के लिये पर्याप्त गतिशीलता, तोपखाने, कवच, इंजीनियरिंग, रसद, खुफिया, हवाई समर्थन आदि के साथ क्षेत्र की रक्षा करने में सक्षम राष्ट्रीय सेना की सामान्य विशेषताओं से सुसज्जित नहीं थी।
वर्तमान स्थिति में अमेरिका की भूमिका:
- आतंकवाद के खिलाफ युद्ध में निवेश:
- अमेरिका का अधिकांश समय शहरी आतंकवादी हमलों के लक्ष्यों को पुनर्प्राप्त करने के लिये विशेष बल इकाइयों को तैयार करने में चला गया, जिस पर उन्होंने खुद के लिये सराहनीय कार्य किया लेकिन आक्रामक अभियान नहीं।
- संक्षेप में उन्होंने आतंकवाद के खिलाफ युद्ध हेतु पर्याप्त निवेश किया, लेकिन अफगानिस्तान की रक्षा के लिये नहीं, हालाँकि वह तालिबान के पोषण में पाकिस्तानी भूमिका में दोनों के बीच संबंध से पूरी तरह अवगत था।
- कोई सामरिक महत्त्व नहीं:
- सोवियत हस्तक्षेप की समाप्ति और सोवियत संघ के पतन के बाद अमेरिका ने वास्तव में कभी भी अफगानिस्तान के सामरिक महत्त्व को नहीं माना।
- आर्थिक क्षेत्र को एकीकृत करने का कोई प्रयास नहीं:
- अफगानिस्तान में अपने सभी 1 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर के निवेश और अफगानिस्तान की खनिज संपदा के बारे में अमेरिका ने कभी भी अफगान अर्थव्यवस्था में निवेश नहीं किया या इसे अपने प्रभाव के आर्थिक क्षेत्र (भारत सहित) में एकीकृत करने का प्रयास नहीं किया, जैसा कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद इसके हस्तक्षेप के बाद हुआ था।
भारत के लिये निहितार्थ:
- भारतीयों की सुरक्षा:
- पहली चिंता अफगानिस्तान में स्थित भारतीय राजनयिकों, कर्मियों और नागरिकों की है।
- सामरिक चिंता:
- तालिबान के नियंत्रण का मतलब पाकिस्तानी सेना और खुफिया एजेंसियों के लिये देश के परिणामों को प्रभावित करने हेतु एक बड़ा कारक साबित होगा, जो पिछले 20 वर्षों में अपनी सद्भावना बनाए रखने में भारतीय विकास और बुनियादी ढाँचा कार्यों हेतु बहुत छोटी-सी भूमिका का निर्वहन करता है।
- कट्टरपंथ का खतरा:
- भारत के पड़ोस में बढ़ता कट्टरपंथ और अखिल इस्लामी आतंकवादी समूहों से क्षेत्र को खतरा है।
आगे की राह
- भारत के लिये पहला विकल्प काबुल में केवल लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार का समर्थन करने तथा राजनीतिक और मानवीय सहायता प्रदान करने के अपने सिद्धांत पर टिके रहना है।
- साथ ही भारत अमेरिका-तालिबान वार्ता से सीख ले सकता है जहाँ दो विरोधी पक्ष अफगानिस्तान के भविष्य पर बातचीत हेतु संधि-वार्ता मंच पर एकजुट हुए थे।
- भारत के लिये अफगानिस्तान की सफलता में उसकी स्थायी रुचि और अपने लोगों के लिये पारंपरिक गर्मजोशी को देखते हुए उस छलांग को थोड़ा आसान बनाना चाहिये। इस प्रकार भारत एक विशेष दूत की नियुक्ति पर विचार कर सकता है तथा तालिबान के साथ ट्रैक II कूटनीति शुरू कर सकता है।
- भारत को आपातकालीन वीज़ा और खतरे में पड़े भारतीयों को वहाँ से निकालने के लिये सुविधा प्रदान करनी चाहिये।
स्रोत : इंडियन एक्सप्रेस
शासन व्यवस्था
तपस पहल
प्रिलिम्स के लिये:तपस पहल, राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा संस्थान मेन्स के लिये:डिजिटल शिक्षा को बढ़ावा देने हेतु भारत सरकार की पहलें |
चर्चा में क्यों?
हाल ही में सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने एक ऑनलाइन पोर्टल 'उत्पादकता एवं सेवाओं को बढ़ाने के लिये प्रशिक्षण' (Training for Augmenting Productivity and Services- TAPAS) लॉन्च किया है।
- TAPAS के विचार की अवधारणा ऐसे समय में की गई थी जब कोविड-19 महामारी के प्रकोप के कारण कार्य करने और शिक्षा के लिये ऑनलाइन माध्यम की खोज करना अनिवार्य हो गया था।
प्रमुख बिंदु:
संदर्भ:
- यह हितधारकों की क्षमता निर्माण के लिये सामाजिक रक्षा के क्षेत्र में विभिन्न पाठ्यक्रम प्रदान करता है। यह राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा संस्थान (NISD) की एक पहल है।
- सामाजिक सुरक्षा को प्रायः राज्य और नागरिक समाज दोनों द्वारा व्यवस्थित तथा सुसंगत कार्रवाई के माध्यम से अपराध के खिलाफ समाज की सुरक्षा के रूप में समझा जाता है।
- यह एक मानक मैसिव ओपन ऑनलाइन कोर्स (MOOC) प्लेटफॉर्म है जिसमें फिल्माए गए व्याख्यान और ई-अध्ययन सामग्री जैसी पाठ्यक्रम सामग्री होती है।
- MOOC एक मुफ्त वेब-आधारित दूरस्थ शिक्षा कार्यक्रम है जिसे बड़ी संख्या में विभिन्न क्षेत्रों के छात्रों की भागीदारी के लिये डिज़ाइन किया गया है।
- इसमें छात्रों और पाठ्यक्रम समन्वयकों के बीच बातचीत और प्रोत्साहित करने के लिये चर्चा मंच भी शामिल है।
- यह अध्ययन सामग्री के आधार पर विषय विशेषज्ञों के व्याख्यान तक पहुँच प्रदान करेगा, इस प्रकार यह शिक्षण की गुणवत्ता से समझौता किये बिना भौतिक कक्षा के पूरक का काम करता है।
- जो भी अपने विभिन्न विषयों पर ज्ञान को बढ़ाना चाहता है इसे प्रयोग कर सकता है और इसमें शामिल होने के लिये कोई शुल्क नहीं है।
- मंच को निम्नलिखित दृष्टिकोण के साथ विकसित किया गया है:
- वीडियो, टेक्स्ट, सेल्फ असेसमेंट और चर्चाएँ।
कोर्सेज:
- पाँच बुनियादी कोर्स जैसे- नशीली दवाओं (पदार्थ) के दुरुपयोग की रोकथाम, जरा चिकित्सा/बुजुर्गों की देखभाल, मनोविकृति की देखभाल एवं प्रबंधन, ट्रांसजेंडर और सामाजिक सुरक्षा संबंधी मुद्दों पर व्यापक पाठ्यक्रम उपलब्ध हैं।
उद्देश्य :
- इसका मुख्य उद्देश्य प्रतिभागियों के क्षमता निर्माण के लिये प्रशिक्षण प्रदान करना और ज्ञान एवं कौशल को बढ़ाना है।
महत्त्व :
- हमारी शिक्षा प्रणाली में जहाँ अध्यापन की ऑफलाइन विधा की पैठ काफी गहरी है, उसके लिये यह पाठ्यक्रम परिवर्तन सुनिश्चित करने के साथ ही नई संभावनाओं के लिये मार्ग प्रशस्त करेगा।
- यह सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय द्वारा ऑनलाइन माध्यम से सामाजिक सुरक्षा के साथ सीखने और काम करने में बड़ी संख्या में लोगों को सक्षम बनाएगा।
अन्य डिजिटल लर्निंग पहल:
- स्वयं (SWAYAM) :
- ऑनलाइन पाठ्यक्रमों के लिये एक एकीकृत मंच और पोर्टल प्रदान करने हेतु शिक्षा मंत्रालय द्वारा 9 जुलाई, 2017 को स्टडी वेब्स ऑफ एक्टिव लर्निंग फॉर यंग एस्पायरिंग माइंड्स (SWAYAM) लॉन्च किया गया था।
- स्वयं प्रभा (SWAYAM Prabha) :
- यह 24X7 आधार पर देश में सभी जगह डायरेक्ट टू होम (Direct to Home- DTH) के माध्यम से 32 उच्च गुणवत्ता वाले शैक्षिक चैनल प्रदान करने की एक पहल है।
- इसमें पाठ्यक्रम आधारित पाठ्य सामग्री होती है जो विविध विषयों को कवर करती है।
- प्रौद्योगिकी के लिये राष्ट्रीय शैक्षिक गठबंधन (NEAT) :
- इस योजना का उद्देश्य कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence) की सहायता से सीखने वाले की व्यक्तिगत आवश्यकताओं के अनुरूप एक अनुकूलित प्रणाली को विकसित करना है।
- प्रौद्योगिकी वर्द्धन शिक्षा पर राष्ट्रीय कार्यक्रम (NPTEL) :
- NPTEL भारतीय विज्ञान संस्थान बंगलूरू के साथ सात भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (आईआईटी) द्वारा शुरू की गई MHRD की एक परियोजना है।
राष्ट्रीय समाज रक्षा संस्थान (NISD)
परिचय:
- NISD एक स्वायत्त निकाय है और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCT), दिल्ली सरकार के साथ 1860 के सोसायटी अधिनियम XXI के तहत पंजीकृत है।
- यह सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय हेतु एक केंद्रीय सलाहकार निकाय है। यह सामाजिक रक्षा के क्षेत्र में नोडल प्रशिक्षण और अनुसंधान संस्थान है।
- यह सामाजिक रक्षा के क्षेत्र में नोडल प्रशिक्षण और अनुसंधान संस्थान है। यह राज्य, राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सरकार व गैर-सरकारी संगठनों के बीच समन्वय तथा संपर्क का कार्य भी करता है।
केंद्र:
- संस्थान वर्तमान में नशीली दवाओं के दुरुपयोग की रोकथाम, वरिष्ठ नागरिकों के कल्याण, भिक्षावृत्ति रोकथाम, ट्रांसजेंडर और अन्य सामाजिक रक्षा संबंधी मुद्दों के क्षेत्र में मानव संसाधन विकास पर केंद्रित है।
शासनादेश:
- संस्थान का अधिदेश प्रशिक्षण, अनुसंधान और प्रलेखन के माध्यम से भारत सरकार के सामाजिक रक्षा कार्यक्रमों हेतु जानकारी प्रदान करना है।
स्रोत: पीआईबी
भारतीय राजनीति
राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग
प्रिलिम्स के लिये:राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग मेन्स के लिये:राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग का दायित्व और अल्पसंख्यकों से संबंधित मुद्दे |
चर्चा में क्यों?
हाल ही में दिल्ली उच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को 30 सितंबर, 2021 तक राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग (NCM) में सभी रिक्त पदों पर व्यक्तियों को नामित करने का निर्देश दिया।
- इससे यह सुनिश्चित होगा कि आयोग कुशलतापूर्वक कार्य करे और राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम (NCM), 1992 के तहत परिकल्पित आयोग के उद्देश्य को भी पूरी तरह से प्राप्त किया जा सके।
प्रमुख बिंदु:
पृष्ठभूमि:
- वर्ष 1978 में गृह मंत्रालय द्वारा पारित एक संकल्प में अल्पसंख्यक आयोग (Minorities Commission- MC) की स्थापना की परिकल्पना की गई थी।
- वर्ष 1984 में अल्पसंख्यक आयोग को गृह मंत्रालय से अलग कर दिया गया और इसे नव-निर्मित कल्याण मंत्रालय (Ministry of Welfare) के अधीन रखा गया, जिसने वर्ष 1988 में भाषायी अल्पसंख्यकों को आयोग के अधिकार क्षेत्र से बाहर कर दिया।
- वर्ष 1992 में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम, 1992 के अधिनियमन के साथ ही अल्पसंख्यक आयोग एक सांविधिक/वैधानिक (Statutory) निकाय बन गया और इसका नाम बदलकर राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग (NCM) कर दिया गया।
- वर्ष 1993 में पहले वैधानिक राष्ट्रीय आयोग का गठन किया गया और पाँच धार्मिक समुदायों- मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध तथा पारसी को अल्पसंख्यक समुदायों के रूप में अधिसूचित किया गया।
- वर्ष 2014 में जैन धर्म मानने वालों को भी अल्पसंख्यक समुदाय के रूप में अधिसूचित किया गया।
- संरचना:
- NCM में एक अध्यक्ष, एक उपाध्यक्ष और पाँच सदस्य होते हैं तथा इन सभी का चयन अल्पसंख्यक समुदायों में से किया जाता है।
- केंद्र सरकार द्वारा नामित किये जाने वाले इन व्यक्तियों को योग्य, क्षमतावान और सत्यनिष्ठ होना चाहिये।
- कार्यकाल: प्रत्येक सदस्य का कार्यकाल पद धारण करने की तिथि से तीन वर्ष की अवधि तक होता है।
कार्य:
- संविधान में संसद तथा राज्य विधानसभाओं द्वारा अधिनियमित कानूनों में अल्पसंख्यकों के लिये सुरक्षा उपायों के कार्यान्वयन की निगरानी करना।
- आयोग अल्पसंख्यकों के कल्याण के लिये प्रधानमंत्री का 15 सूत्री कार्यक्रम लागू करने और अल्पसंख्यक समुदायों के लिये कार्यक्रमों के क्रियान्वयन को सुनिश्चित करता है।
- केंद्र या राज्य सरकारों द्वारा अल्पसंख्यकों के हितों की सुरक्षा के लिये सुरक्षा उपायों के प्रभावी कार्यान्वयन हेतु सिफारिशें करना।
- अल्पसंख्यकों को उनके अधिकारों और सुरक्षा उपायों से वंचित करने से संबंधित विशिष्ट शिकायतों को देखना और ऐसे मामलों को उपयुक्त प्राधिकारियों के समक्ष रखना।
- सांप्रदायिक संघर्ष और दंगों के मामलों की जाँच करता है।
- उदाहरण के लिये 2011 के भरतपुर सांप्रदायिक दंगों के साथ-साथ असम में 2012 के बोडो-मुस्लिम संघर्षों की जाँच आयोग द्वारा की गई और उनके निष्कर्ष सरकार को सौंपे गए।
- प्रत्येक वर्ष 18 दिसंबर को अल्पसंख्यक अधिकार दिवस मनाया जाता है जो 1992 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा "राष्ट्रीय या जातीय, धार्मिक और भाषायी अल्पसंख्यकों के अधिकारों की घोषणा" को अपनाने का प्रतीक है।
अल्पसंख्यकों से संबंधित संवैधानिक और कानूनी प्रावधान:
- राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम (NCM Act) अल्पसंख्यकों को "केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित एक समुदाय" के रूप में परिभाषित करता है।
- भारत सरकार द्वारा देश में छह धर्मों मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, पारसी (पारसी) और जैन को धार्मिक अल्पसंख्यक घोषित किया गया है।
- राष्ट्रीय अल्पसंख्यक शिक्षा संस्थान अधिनियम' (NCMEIA), 2004:
- यह अधिनियम सरकार द्वारा अधिसूचित छह धार्मिक समुदायों के आधार पर शैक्षणिक संस्थानों को अल्पसंख्यक का दर्जा प्रदान करता है।
- भारतीय संविधान में "अल्पसंख्यक" शब्द को परिभाषित नहीं किया गया है। हालाँँकि संविधान धार्मिक और भाषायी अल्पसंख्यकों को मान्यता देता है।
- अनुच्छेद 15 और 16:
- ये अनुच्छेद धर्म, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर नागरिकों के साथ भेदभाव का निषेध करते हैं।
- राज्य के अधीन किसी भी कार्यालय में रोज़गार या नियुक्ति से संबंधित मामलों में नागरिकों को 'अवसर की समानता' का अधिकार है, जिसमें धर्म, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर किसी भी प्रकार का भेदभाव निषेध है।
- अनुच्छेद 25 (1), 26 और 28:
- यह लोगों को अंत:करण की स्वतंत्रता और स्वतंत्र रूप से धर्म का प्रचार, अभ्यास और प्रसार करने का अधिकार प्रदान करता है।
- संबंधित अनुच्छेदों में प्रत्येक धार्मिक संप्रदाय या वर्ग को धार्मिक और धर्मार्थ उद्देश्यों हेतु धार्मिक संस्थानों को स्थापित करने का अधिकार तथा अपने स्वयं के धार्मिक मामलों का प्रबंधन, संपत्ति का अधिग्रहण एवं उनके प्रशासन का अधिकार शामिल है।
- राज्य द्वारा पोषित संस्थानों में धार्मिक शिक्षा या धार्मिक कार्यों में हिस्सा लेने या अनुदान सहायता प्राप्त करने की स्वतंत्रता होगी।
- अनुच्छेद 29:
- यह अनुच्छेद उपबंध करता है कि भारत के राज्य क्षेत्र या उसके किसी भाग के निवासी नागरिकों के किसी अनुभाग को अपनी विशेष भाषा, लिपि या संस्कृति को बनाए रखने का अधिकार होगा।
- अनुच्छेद-29 के तहत प्रदान किये गए अधिकार अल्पसंख्यक तथा बहुसंख्यक दोनों को प्राप्त हैं।
- हालाँकि सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि इस अनुच्छेद का दायरा केवल अल्पसंख्यकों तक ही सीमित नहीं है, क्योंकि अनुच्छेद में 'नागरिकों के वर्ग' शब्द के उपयोग में अल्पसंख्यकों के साथ-साथ बहुसंख्यक भी शामिल हैं।
- अनुच्छेद 30:
- धर्म या भाषा पर आधारित सभी अल्पसंख्यक वर्गों को अपनी रुचि की शिक्षा, संस्थानों की स्थापना और प्रशासन का अधिकार होगा।
- अनुच्छेद 30 के तहत संरक्षण केवल अल्पसंख्यकों (धार्मिक या भाषायी) तक ही सीमित है और नागरिकों के किसी भी वर्ग (जैसा कि अनुच्छेद 29 के तहत) तक विस्तारित नहीं किया जा सकता।
- अनुच्छेद 350 B:
- मूल रूप से भारत के संविधान में भाषायी अल्पसंख्यकों के लिये विशेष अधिकारों के संबंध में कोई प्रावधान नहीं किया गया था। इसे 7वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम, 1956 द्वारा संविधान में अनुच्छेद 350B के रूप में जोड़ा गया।
- यह भारत के राष्ट्रपति द्वारा भाषायी अल्पसंख्यकों के लिये एक विशेष अधिकारी की नियुक्ति का प्रावधान करता है।
स्रोत: द हिंदू
शासन व्यवस्था
आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (AB PM-JAY)
प्रिलिम्स के लिये:आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना मेन्स के लिये:आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना का महत्त्व |
चर्चा में क्यों?
आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (AB PM-JAY) के तहत अप्रैल 2020 से जुलाई 2021 तक लगभग 20.32 लाख कोविड-19 परीक्षण और 7.08 लाख उपचार अधिकृत किये गए।
प्रमुख बिंदु
परिचय:
- यह माध्यमिक देखभाल (जिसमें सुपर विशेषज्ञ शामिल नहीं है) के साथ-साथ तृतीयक देखभाल (जिसमें एक सुपर विशेषज्ञ शामिल है) हेतु प्रति परिवार 5 लाख रुपए की बीमा राशि प्रदान करता है।
- PMJAY के तहत लाभार्थियों को सेवा के बिंदु पर कैशलेस और पेपरलेस सेवाओं तक पहुँच प्रदान की जाती है।
- स्वास्थ्य लाभ पैकेज में सर्जरी, चिकित्सा और देखभाल, उपचार, दवाओं की लागत तथा निदान शामिल है।
- पैकेज़्ड दरें (दरें जिनमें सब कुछ शामिल है ताकि प्रत्येक उत्पाद या सेवा के लिये अलग से शुल्क न लिया जाए)।
- ये दरें लचीली होती हैं, लेकिन वे अस्पतालों द्वारा एक बार तय होने के बाद लाभार्थी से अतिरिक्त शुल्क नहीं ले सकते।
- इस योजना में चिकित्सा प्रबंधन के लिये एक दैनिक सीमा भी निर्धारित की गई है।
लाभार्थी:
- यह एक पात्रता-आधारित योजना है जो नवीनतम सामाजिक-आर्थिक जाति जनगणना (एसईसीसी) डेटा द्वारा पहचाने गए लाभार्थियों को लक्षित करती है।
- एक बार डेटाबेस द्वारा पहचाने जाने के बाद लाभार्थी को बीमाकृत माना जाता है और वह किसी भी सूचीबद्ध अस्पताल में मान्य हो सकता है।
वित्तीयन:
- इस योजना के लिये वित्तपोषण संयुक्त रूप से किया जाता है- सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के लिये अपनी विधायिका के साथ 60:40, पूर्वोत्तर राज्यों और जम्मू-कश्मीर, हिमाचल तथा उत्तराखंड में 90:10 एवं विधायिका के बिना केंद्रशासित प्रदेशों हेतु 100% केंद्रीय वित्तपोषण।
नोडल एजेंसी:
- राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण (NHA) को राज्य सरकारों के साथ संयुक्त रूप से पीएम-जेएवाई के प्रभावी कार्यान्वयन हेतु सोसायटी पंजीकरण अधिनियम, 1860 के तहत एक स्वायत्त इकाई के रूप में गठित किया गया है।
- राज्य स्वास्थ्य एजेंसी (SHA) राज्य में AB PM-JAY के कार्यान्वयन के लिये ज़िम्मेदार राज्य सरकार का शीर्ष निकाय है।
चुनौतियाँ:
- राज्यों का सहयोग
- चूँकि ‘स्वास्थ्य’ राज्य का विषय है और राज्यों द्वारा इस योजना के लिये 40% वित्तपोषण का योगदान दिया जाएगा, इसलिये मौजूदा ‘राज्य स्वास्थ्य बीमा योजनाओं’ का ‘आयुष्मान भारत- प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना’ के साथ समन्वय स्थापित करना महत्त्वपूर्ण होगा।
- पश्चिम बंगाल, तेलंगाना, ओडिशा और दिल्ली ने इस योजना को लागू नहीं किया है।
- चूँकि ‘स्वास्थ्य’ राज्य का विषय है और राज्यों द्वारा इस योजना के लिये 40% वित्तपोषण का योगदान दिया जाएगा, इसलिये मौजूदा ‘राज्य स्वास्थ्य बीमा योजनाओं’ का ‘आयुष्मान भारत- प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना’ के साथ समन्वय स्थापित करना महत्त्वपूर्ण होगा।
- लागत का बोझ
- देखभाल प्रदाताओं और केंद्र के बीच लागत एक विवादित क्षेत्र है तथा कई लाभकारी अस्पताल सरकार के प्रस्तावों को अव्यवहारिक मानते हैं।
- अपर्याप्त स्वास्थ्य क्षमताएँ:
- आवश्यक उपकरणों की कमी से जूझ रहे सार्वजनिक क्षेत्र की स्वास्थ्य क्षमताएँ निजी क्षेत्र के प्रदाताओं के साथ आवश्यक भागीदारी और गठबंधन की मांग करती हैं।
- ऐसी परिस्थितियों में सेवाओं का प्रावधान तभी सुनिश्चित किया जा सकता है जब प्रदाताओं को उनकी सेवाओं के लिये जवाबदेह ठहराया जाए।
- अनावश्यक उपचार:
- ‘राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति-2017’ ने माध्यमिक और तृतीयक अस्पतालों से एक विशिष्ट शुल्क पर सेवाओं की ‘रणनीतिक खरीद’ का प्रस्ताव रखा है।
- स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं के साथ अनुबंध, जिससे वित्तीय मुआवज़ा प्राप्त किया जाता है, के माध्यम से अधिसूचित दिशा-निर्देशों और मानक उपचार प्रोटोकॉल का सख्ती से पालन सुनिश्चित किया जाना आवश्यक है, ताकि अनावश्यक उपचार की संभावना को रोका जा सके।
उपलब्धियांँ:
- गरीबों के लिये फायदेमंद:
- योजना के कार्यान्वयन के पहले 200 दिनों में PM-JAY के तहत 20.8 लाख से अधिक गरीब और वंचित लोगों को लाभान्वित किया गया है, इसके तहत 5,000 करोड़ रुपए से अधिक का मुफ्त इलाज कराया गया है।
- कोविड -19 के समय PM-JAY का क्रियान्वयन:
- योजना की शुरुआत से पीएम-जेएवाई की एक प्रमुख विशेषता पोर्टेबिलिटी है, जो यह सुनिश्चित करने में मदद करती है कि पीएम-जेएवाई-योग्य प्रवासी कार्यकर्त्ता देश भर के किसी भी अस्पताल में योजना की सेवाओं का उपयोग कर सकते हैं, भले ही उनके निवास की स्थिति कुछ भी हो।
संबंधित योजनाएँ:
- भारत कोविड-19 आपातकालीन प्रतिक्रिया और स्वास्थ्य प्रणाली की तैयारी पैकेज: चरण- II (ECRP-II पैकेज):
- यह योजना कुछ केंद्रीय क्षेत्र के घटकों के साथ एक केंद्र प्रायोजित योजना है।
- इसे हाल ही में लॉन्च किया गया है। इसका उद्देश्य बाल चिकित्सा देखभाल सहित स्वास्थ्य बुनियादी ढांँचे के विकास पर ध्यान केंद्रित करने और मापने योग्य परिणामों के साथ प्रारंभिक रोकथाम, पहचान व प्रबंधन के लिये तत्काल प्रतिक्रिया हेतु स्वास्थ्य प्रणाली की तैयारी में तेज़ी लाना है।
आगे की राह:
- भारत के अपने सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (UHC) के लक्ष्यों को पूरा करने में AB-PMJAY कार्यक्रम बड़े स्तर पर महत्त्वाकांक्षी प्रणालीगत सुधार का अवसर प्रस्तुत करता है।
- इसके लिये लंबे समय से कम वित्तपोषित स्वास्थ्य प्रणाली में संसाधनों को शामिल करने की आवश्यकता होगी, यद्यपि यह योजना भारत को UHC की ओर निरंतर गति प्रदान करने के लिये है अतः इसके साथ शासन, गुणवत्ता नियंत्रण और प्रबंधन के परस्पर संबंधित मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिये ।
- भारत में स्वास्थ्य देखभाल पर सार्वजनिक व्यय वैश्विक स्तर पर सबसे निम्न है।
- प्रौद्योगिकी और नवाचार का अच्छा उपयोग करने से स्वास्थ्य सेवा की समग्र लागत को और कम किया जा सकता है। एआई-पावर्ड मोबाइल एप्लीकेशन (AI-Powered Mobile Applications) उच्च गुणवत्तापूर्ण , कम लागत, स्मार्ट वेलनेस समाधान प्रदान कर सकते हैं। आयुष्मान भारत हेतु स्केलेबल (scalable) और इंटर-ऑपरेबल (Inter-Operable) आईटी प्लेटफॉर्म इस दिशा में एक सकारात्मक कदम है।
स्रोत: द हिंदू
शासन व्यवस्था
जनगणना 2021
प्रिलिम्स के लियेजनगणना अधिनियम, 1948, राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर, जनसांख्यिकीय लाभांश मेन्स के लियेजनगणना- चुनौतियाँ और महत्त्व |
चर्चा में क्यों?
हाल ही में गृह मंत्रालय ने लोकसभा में कहा है कि कोविड-19 महामारी के प्रकोप के कारण जनगणना 2021 और जनगणना से संबंधित अन्य क्षेत्रीय गतिविधियों को अगले आदेश तक के लिये स्थगित कर दिया गया है।
- भारत में हर दशक में जनगणना की जाती है तथा 2021 की जनगणना देश की 16वीं राष्ट्रीय जनगणना होगी।
प्रमुख बिंदु
पृष्ठभूमि :
- प्राचीनतम साहित्य 'ऋग्वेद' से पता चलता है कि 800-600 ईसा पूर्व के दौरान कुछ विधियों द्वारा जनगणना को बनाए रखा गया था।
- मुगल बादशाह अकबर के शासन काल में प्रशासनिक रिपोर्ट 'आईन-ए-अकबरी' में जनसंख्या, उद्योग, धन और कई अन्य विशेषताओं से संबंधित व्यापक आँकड़े शामिल थे।
- भारत में पहली जनगणना गवर्नर-जनरल लॉर्ड मेयो के शासन काल में वर्ष 1872 में की गई थी। हालाँकि देश की पहली जनगणना प्रक्रिया को गैर-समकालिक (देश के विभिन्न भागों में अलग-अलग समय पर) रूप से पूर्ण किया गया।
- रजिस्ट्रार जनरल और जनगणना आयुक्त के नव स्थापित कार्यालय ने वर्ष 1881 में भारत में पहली बार जनगणना पूरी की।
- 130 से अधिक वर्षों के इतिहास के साथ यह एक विश्वसनीय अभ्यास साबित हुआ है जो प्रत्येक 10 वर्षों में आयोजित किया जाता है।
- जनगणना अधिनयम को वर्ष 1948 में लागू किया गया और इस अधिनियम के माध्यम से जनगणना के लिये एक स्थायी योजना की रूपरेखा के साथ जनगणना अधिकारियों के उत्तरदायित्वों का निर्धारण किया गया।
- जनगणना अधिनियम, 1948 के तहत जनगणना में एकत्र किये गए व्यक्तिगत डेटा को अधिनियम में निहित प्रावधानों के अनुसार सार्वजनिक नहीं किया जाता है।
- व्यक्तिगत डेटा का उपयोग राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) सहित किसी अन्य डेटाबेस को तैयार करने के लिये नहीं किया जाता है। विभिन्न प्रशासनिक स्तरों पर केवल समेकित जनगणना के आँकड़े ही जारी किये जाते हैं।
परिचय :
- औपनिवेशिक राज की कई विरासतें 1947 के बाद भी भारत में रहीं। भारत की जनगणना उनमें में से एक है। जनगणना शब्द लैटिन शब्द 'Censere' से लिया गया है, जिसका अर्थ है- 'आकलन करना'।
- जनगणना में जनसांख्यिकीय और विभिन्न सामाजिक-आर्थिक मापदंडों जैसे- शिक्षा, अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति, धर्म, भाषा, विवाह, प्रजनन क्षमता, विकलांगता, व्यवसाय और व्यक्तियों के प्रवासन पर डेटा एकत्र किया जाता है।
- आगामी जनगणना (Census 2021) पहली डिजिटल जनगणना होगी और इसमें स्व-गणना का प्रावधान है। जनगणना गृह मंत्रालय द्वारा कराई जाएगी।
- डेटा संग्रह के लिये एक मोबाइल एप्लीकेशन और जनगणना से संबंधित विभिन्न गतिविधियों के प्रबंधन एवं निगरानी हेतु एक जनगणना पोर्टल विकसित किया गया है।
जनगणना 2021 vs पिछला संस्करण:
- डिजिटल डेटा:
- यह पहली बार है कि ऑफ़लाइन मोड में काम करने के प्रावधान के साथ डेटा को मोबाइल एप्लीकेशन (गणक के फोन पर स्थापित) के माध्यम से डिजिटल रूप से एकत्र किया जाएगा।
- यह विलंबता को कम करने और परिणाम तुरंत प्राप्त करने में मदद करेगा, पहले के मामलों के विपरीत जहाँ डेटा का विश्लेषण करने और रिपोर्ट प्रकाशित होने में कई साल लगते थे।
- जनगणना निगरानी और प्रबंधन पोर्टल:
- यह बहु-भाषा सहायता प्रदान करने हेतु जनगणना गतिविधियों में शामिल सभी अधिकारियों के लिये एकल स्रोत के रूप में कार्य करेगा।
- कोई जाति डेटा नहीं:
- नवीनतम जनगणना (मौजूदा योजना के अनुसार) जाति डेटा एकत्र नहीं करेगी। जबकि सामाजिक-आर्थिक जाति जनगणना (एसईसीसी) 2011 की जनगणना के साथ आयोजित की गई थी, जाति जनगणना के परिणाम को अभी तक सार्वजनिक नहीं किया गया है।
- ट्रांसजेंडर:
- यह पहली बार है जब ऐसे परिवारों और परिवार में रहने वाले सदस्यों की जानकारी एकत्र की जाएगी, जिनका मुखिया ट्रांसजेंडर समुदाय से संबंधित कोई व्यक्ति है। पहले केवल पुरुष और महिला के लिये एक कॉलम था।
जनगणना का महत्त्व:
- डेटा का व्यापक स्रोत:
- यह राष्ट्र के जनसांख्यिकीय लाभांश के बारे में जानकारी एकत्र करता है जो स्वास्थ्य सर्वेक्षण, शिक्षा सर्वेक्षण, कृषि सर्वेक्षण आदि जैसे कई उद्देश्यों के लिये महत्त्वपूर्ण है।
- निर्णय लेना:
- साक्ष्य-आधारित निर्णय लेने के लिये किसी भी देश के लिये जनगणना महत्त्वपूर्ण है।
- नीति निर्माण:
- जनगणना एक आवासीय इकाई से एकत्रित जानकारी को वितरण इकाई तक ले जाने के लिये ज़िम्मेदार है। यह सुसंगत नीति-निर्माण और वैज्ञानिक योजना को बढ़ावा देगी, जिसके परिणामस्वरूप संसाधनों का अनुकूलन होगा।
- सीमांकन:
- जनगणना के आँकड़ों का उपयोग निर्वाचन क्षेत्रों के सीमांकन और संसद, राज्य विधानसभाओं तथा स्थानीय निकायों को प्रतिनिधित्व के आवंटन के लिये भी किया जाता है।
- अनुदान:
- वित्त आयोग जनगणना से उपलब्ध जनसंख्या के आँकड़ों के आधार पर राज्यों को अनुदान देता है।
चुनौतियाँ:
- त्रुटियाँ:
- सांख्यिकीय कार्य के दौरान मुख्यतः दो प्रकार की त्रुटियाँ होती है: सामग्री त्रुटि और कवरेज त्रुटि, जिन्हें कम करने की आवश्यकता होती है।
- झूठी जानकारी प्रस्तुत करना:
- विभिन्न योजनाओं के इच्छित लाभों या नागरिकता खोने के डर से और शिक्षा की कमी के कारण लोग प्रायः झूठी जानकारी प्रदान कर देते हैं।
- संबद्ध लागत
- इस अभ्यास के दौरान सरकार द्वारा भारी व्यय (हज़ारों करोड़) किया जाता है।
- सुरक्षा
- डेटा एकत्र करने के डिजिटल मोड की ओर बढ़ना विश्लेषण की प्रक्रिया को गति देने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है।
- हालाँकि एकत्र किये जा रहे डेटा की सुरक्षा (विशेषकर एप्लीकेशन पर) और ऐसे डेटा के लिये पर्याप्त बैकअप तंत्र पर भी ध्यान दिया जाना आवश्यक है।
- डेटा का दुरुपयोग
- क्षेत्रीय अधिकारियों के पास इस प्रकार के डेटा की उपलब्धता इसके दुरुपयोग की संभावना को बढ़ा देती है, क्योंकि संबंधित प्राधिकरण के पास एक विशेष परिवार (स्वामित्व, जाति, वित्तीय पहलू, व्यवसाय, जीवन शैली, आदि) के बारे में सभी जानकारी मौजूद होती है, जिसका उपयोग अनुचित कार्यों के लिये किया जा सकता है।
- सामाजिक भागीदारी का अभाव
- समुदाय की भागीदारी का अभाव और सटीक डेटा एकत्र करने के लिये प्रगणकों का अपर्याप्त प्रशिक्षण जनगणना के संचालन में एक बड़ी चुनौती है।
आगे की राह
- डेटा गुणवत्ता को मज़बूत करना काफी महत्त्वपूर्ण है, जो कि कवरेज त्रुटि और सामग्री त्रुटि को कम करके किया जा सकता है।
- प्रगणकों (डेटा संग्रहकर्त्ताओं) और आयोजकों को उचित रूप से प्रशिक्षित किया जाना चाहिये। साथ ही प्रगणकों को प्रेरित करने के लिये उन्हें बेहतर भुगतान भी किया जाना चाहिये, क्योंकि वे डेटा संग्रह का केंद्रबिंदु हैं और डेटा सटीकता सुनिश्चित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकते हैं।
- जीवन में जनगणना के महत्त्व के बारे में लोगों को जागरूक करने के लिये सार्वजनिक अभियान शुरू किये जाने चाहिये।
स्रोत: द हिंदू
जैव विविधता और पर्यावरण
राष्ट्रीय जीन बैंक
प्रिलिम्स के लिये:राष्ट्रीय जीन बैंक, राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद मेन्स के लिये:नवीनीकृत-अत्याधुनिक राष्ट्रीय जीन बैंक का कृषि क्षेत्र में महत्त्व |
चर्चा में क्यों?
हाल ही में केंद्रीय कृषि और किसान कल्याण मंत्री ने राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो (NBPGR) में दुनिया के दूसरे सबसे बड़े नवीनीकृत-अत्याधुनिक राष्ट्रीय जीन बैंक का उद्घाटन किया।
- जीन बैंक एक प्रकार का बायो रिपोज़िटरी है जो आनुवंशिक सामग्री को संरक्षित करता है (बीज पौधों, ऊतक संवर्द्धन आदि का संग्रह)।
- एक जीन आनुवंशिकता की बुनियादी भौतिक और कार्यात्मक इकाई है। जीन डीऑक्सीराइबोन्यूक्लिक एसिड (DNA) से बने होते हैं।
राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो (NBPGR)
- यह भारत में पादप आनुवंशिक संसाधनों के प्रबंधन के लिये एक नोडल संगठन है और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के नियंत्रण में कार्य करता है।
- यह अपने राष्ट्रीय जीन बैंक (NGB) में दीर्घकालिक संरक्षण (-20 डिग्री सेल्सियस पर) के लिये बीज जर्मप्लाज़्म का संरक्षण कर रहा है।
- यह स्वदेशी और विदेशी पौधों के आनुवंशिक संसाधनों के अन्वेषण और संग्रह की योजना, आयोजन, संचालन और समन्वय करता है। इसका मुख्यालय नई दिल्ली में है और इसके 10 क्षेत्रीय स्टेशन हैं।
प्रमुख बिंदु
- नेशनल जीन बैंक की स्थापना वर्ष 1996 में पादप आनुवंशिक संसाधनों (पीजीआर) के बीजों को भावी पीढ़ियों के लिये संरक्षित करने हेतु की गई थी और इसमें बीजों के रूप में लगभग एक मिलियन जर्मप्लाज़्म को संरक्षित करने की क्षमता है।
- जर्मप्लाज़्म जीवित ऊतक है जिससे नए पौधे उगाए जा सकते हैं।
- NBPGR देश में दिल्ली मुख्यालय और 10 क्षेत्रीय स्टेशनों के माध्यम से इन-सीटू और एक्स-सीटू जर्मप्लाज़्म संरक्षण की आवश्यकता को पूरा कर रहा है।
- इन-सीटू और एक्स सीटू संरक्षण क्रमशः अपने प्राकृतिक आवास के भीतर या बाहर प्रजातियों की विविधता के रखरखाव पर केंद्रित है।
महत्त्व:
- वर्तमान में यह 4.52 लाख परिग्रहणों की रक्षा कर रहा है, जिनमें से 2.7 लाख भारतीय जनन द्रव्य हैं और शेष अन्य देशों से आयात किये गए हैं।
- परिग्रहण एक एकल, एकत्रित किस्म या जंगली पौधे की किस्म, भूमि या एक पौधे की किस्म है जिसका उत्पादन चयनात्मक प्रजनन द्वारा किया गया है, जिसे आमतौर पर एक कल्टीवेटर के रूप में जाना जाता है।
कार्य-प्रणाली:
- लंबी अवधि तथा मध्यम अवधि की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये ‘राष्ट्रीय जीन बैंक’ में मुख्यतः चार प्रकार की सुविधाएँ शामिल हैं- बीज जीन बैंक (-18 डिग्री सेल्सियस), क्रायो जीन बैंक (-170 डिग्री सेल्सियस से -196 डिग्री सेल्सियस), इन विट्रो जीन बैंक (25 डिग्री सेल्सियस) और फील्ड जीन बैंक।
- यह विभिन्न फसल समूहों जैसे- अनाज, बाजरा, औषधीय और सुगंधित पौधों तथा नशीले पदार्थों आदि का भंडारण करता है।
अन्य सुविधाएँ
- नॉर्वे में ‘स्वालबार्ड ग्लोबल सीड वॉल्ट’ में दुनिया का सबसे बड़ा बीज संग्रह मौजूद है।
- भारत का ‘सीड वॉल्ट’ हिमालय में ‘चांग ला’ (लद्दाख) में स्थित है।
- ‘राष्ट्रीय पशु आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो’ (NBAGR- करनाल, हरियाणा) में स्थापित ‘राष्ट्रीय पशु जीन बैंक’ का उद्देश्य स्वदेशी पशुधन जैव विविधता का संरक्षण करना है।
- NBAGR भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) संस्थानों में से एक है।
पादप आनुवंशिक संसाधन
- वे खाद्य सुरक्षा के जैविक आधार हैं और प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पृथ्वी पर प्रत्येक व्यक्ति की आजीविका का समर्थन करते हैं।
- इन्हें पौधों की आनुवंशिक सामग्री के रूप में परिभाषित किया जाता है, जो वर्तमान और भविष्य की पीढ़ियों के लिये एक संसाधन के रूप में मूल्यवान है।
- इनमें पौधों की वे सभी सामग्रियाँ शामिल हैं, जिनसे पौधे उगाए जा सकते हैं, जैसे कि बीज, फल, पराग और अन्य अंग एवं ऊतक।
- खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में इनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका है। ये तकरीबन 10,000 वर्ष पूर्व शुरू होने वाली कृषि पद्धति के विकास की नींव रहे हैं।