जैव विविधता और पर्यावरण
कोसी-मेची नदी जोड़ो परियोजना
- 19 Aug 2024
- 15 min read
प्रिलिम्स के लिये:कोसी-मेची नदी जोड़ो परियोजना, नदियों को जोड़ने की राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना, कोसी नदी, महानंदा नदी, मेची नदी। मेन्स के लिये:भारत में नदियों को जोड़ने की योजना और इससे संबंधित मुद्दे। |
स्रोत: डाउन टू अर्थ
चर्चा में क्यों?
कोसी-मेची नदी जोड़ो परियोजना जो नदियों को जोड़ने की भारत की महत्त्वाकांक्षी राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना (National Perspective Plan-NPP) का हिस्सा है, विवाद का विषय बन गई है। बिहार में बाढ़ पीड़ितों ने इसके क्रियान्वयन का विरोध किया है।
- हालाँकि इस परियोजना का उद्देश्य क्षेत्र की सिंचाई प्रणाली में सुधार लाना है, लेकिन स्थानीय लोगों का तर्क है कि यह परियोजना बाढ़ नियंत्रण के महत्त्वपूर्ण मुद्दे को संबोधित करने में विफल है, जिससे वे हर साल प्रभावित प्रभावित होते हैं।
कोसी-मेची नदी जोड़ो परियोजना से संबंधित प्रमुख बिंदु क्या हैं?
- परियोजना के बारे में: इस परियोजना में कोसी नदी को महानंदा नदी की सहायक नदी मेची नदी से जोड़ना शामिल है, जिसका प्रभाव बिहार और नेपाल के क्षेत्रों पर पड़ेगा।
- इस परियोजना का लक्ष्य 4.74 लाख हेक्टेयर (बिहार में 2.99 लाख हेक्टेयर) भूमि को वार्षिक सिंचाई तथा 24 मिलियन घन मीटर (Million Cubic Meters- MCM) घरेलू एवं औद्योगिक जलापूर्ति उपलब्ध कराना है।
- परियोजना के पूरा होने पर कोसी बैराज से 5,247 क्यूबिक फीट प्रति सेकंड (क्यूसेक) अतिरिक्त जल निर्गमित होने की आशा है।
- इस परियोजना का प्रबंधन केंद्रीय जल शक्ति (जल संसाधन) मंत्रालय के तहत राष्ट्रीय जल विकास एजेंसी (National Water Development Agency- NWDA) द्वारा की जा रहा है।
- इस परियोजना का लक्ष्य 4.74 लाख हेक्टेयर (बिहार में 2.99 लाख हेक्टेयर) भूमि को वार्षिक सिंचाई तथा 24 मिलियन घन मीटर (Million Cubic Meters- MCM) घरेलू एवं औद्योगिक जलापूर्ति उपलब्ध कराना है।
- चिंताएँ: यह परियोजना मुख्य रूप से सिंचाई उद्देश्यों की पूर्ति हेतु तैयार की गई है, जिसका लक्ष्य खरीफ सीज़न के दौरान महानंदा नदी बेसिन में 2,15,000 हेक्टेयर कृषि भूमि को सिंचाई सुविधा प्रदान करना है।
- सरकारी दावों के बावज़ूद इस परियोजना में बाढ़ नियंत्रण का कोई महत्त्वपूर्ण घटक शामिल नहीं है, जो बाढ़-प्रवण क्षेत्र के लिये व्यापक चिंता का विषय है।
- इस परियोजना में बैराज से केवल 5,247 क्यूबिक फीट प्रति सेकंड (क्यूसेक) अतिरिक्त जल निर्गमित किया जाएगा, जो बैराज की 9,00,000 क्यूसेक क्षमता की तुलना में नगण्य है।
- स्थानीय लोगों का मानना है कि जल प्रवाह में मामूली कमी क्षेत्र को नुकसान पहुँचाने वाली वार्षिक बाढ़ को रोकने के लिये पर्याप्त नहीं होगी।
- बाढ़ और भूमि कटाव के कारण घर नष्ट हो गए हैं और फसलें जलमग्न हो गई हैं, जिससे तटबंधों के बीच रहने वाले स्थानीय ग्रामीण तथा उनकी आजीविका प्रभावित हुई है।
- परियोजना के तहत सिंचाई पर केंद्रित ध्यान इन तात्कालिक तथा आवर्ती चुनौतियों का समाधान नहीं करता है।
कोसी और मेची नदी के संदर्भ में मुख्य तथ्य क्या हैं?
- कोसी नदी: इसे ‘बिहार का शोक’ कहा जाता है। इसका उद्गम हिमालय में समुद्र तल से 7,000 मीटर ऊपर माउंट एवरेस्ट और कंचनजंगा के जलग्रहण क्षेत्र से होता है।
- चीन, नेपाल और भारत से होकर बहती हुई यह नदी हनुमान नगर के पास भारत में प्रवेश करती है तथा बिहार के कटिहार ज़िले में कुरसेला के पास गंगा नदी में मिल जाती है।
- कोसी नदी तीन मुख्य धाराओं सन कोसी, अरुण कोसी और तमूर कोसी के संगम से बनती है।
- कोसी नदी अपने मार्ग को बदलने और पश्चिम की ओर बहने की प्रवृत्ति के लिये प्रसिद्ध है, जो पिछले 200 वर्षों में दरभंगा, सहरसा और पूर्णिया ज़िलों में कृषि क्षेत्र को नष्ट करते हुए 112 किलोमीटर तक चली गई है।
- सहायक नदियाँ: नदी की कई महत्त्वपूर्ण सहायक नदियाँ हैं, जिनमें त्रिजंगा, भुतही बलान, कमला बलान और बागमती शामिल हैं, जो सभी मैदानी इलाकों से होकर कोसी नदी में मिलती हैं।
- मेची नदी: यह नेपाल और भारत से होकर बहने वाली एक अंतर-सीमा नदी है। यह महानंदा नदी की एक सहायक नदी है।
- मेची नदी एक बारहमासी नदी है, जो नेपाल में महाभारत पर्वतमाला में हिमालय की अंतरीय घाटी से निकलती है और फिर बिहार से होकर किशनगंज ज़िले में महानंदा में मिलती है।
महानंदा नदी
- महानंदा नदी पूर्वी हिमालयी नदी तंत्र का एक हिस्सा है। इस नदी में दो धाराएँ शामिल हैं, एक नेपाल में हिमालय से निकलकर बिहार से बहती हुई उत्तर में गंगा से मिलती है। स्थानीय रूप से इसका नाम फुलहर है।
- दूसरी नदी पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग से निकलकर बांग्लादेश में प्रवेश करती है, जो बांग्लादेश के गोदागरीघाट के पास गंगा में मिल जाती है। इसे महानंदा के नाम से जाना जाता है।
- जलग्रहण क्षेत्र: नेपाल और पश्चिम बंगाल के उप-हिमालयी क्षेत्र में फैला हुआ है, जो भारत में सर्वाधिक वर्षण क्षेत्रों में से एक है।
- बाढ़: मानसून के चरम महीनों के दौरान प्रायः नदियाँ आपस में मिल जाती हैं, जिससे बिहार और पश्चिम बंगाल में भारी बाढ़ आ जाती है। जब गंगा अपने चरम पर होती है तो बाढ़ की समस्या और भी बढ़ जाती है, जिससे बिहार में पूर्णिया व कटिहार तथा पश्चिम बंगाल में दार्जिलिंग, पश्चिमी दिनाजपुर व मालदा जैसे प्रभावित ज़िलों में व्यापक जलभराव हो जाता है।
नदियों को जोड़ने की राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना (NPP) क्या है?
- योजना के बारे में: NPP को वर्ष 1980 में सिंचाई मंत्रालय (अब जल शक्ति मंत्रालय) द्वारा जल के अंतर-बेसिन हस्तांतरण के माध्यम से जल संसाधनों को विकसित करने हेतु तैयार किया गया था।
- घटक: योजना को दो मुख्य घटकों में विभाजित किया गया है: हिमालयी नदी विकास घटक और प्रायद्वीपीय नदी विकास घटक।
- चिह्नित परियोजनाएँ: नदियों को जोड़ने से संबंधित 30 परियोजनाओं को स्वीकृति दी गई है, जिनमें से 16 परियोजनाएँ प्रायद्वीपीय घटक के अंतर्गत तथा 14 हिमालयी घटक के अंतर्गत आती हैं।
- प्रायद्वीपीय घटक के अंतर्गत प्रमुख परियोजनाएँ: महानदी-गोदावरी लिंक, गोदावरी-कृष्णा लिंक, पार-तापी-नर्मदा लिंक और केन-बेतवा लिंक (NPP के तहत कार्यान्वयन शुरू करने वाली पहली परियोजना)।
- हिमालयी घटक के तहत प्रमुख परियोजनाएँ: कोसी-घाघरा लिंक, गंगा (फरक्का)-दामोदर-सुवर्णरेखा लिंक और कोसी-मेची लिंक।
- महत्त्व: NPP का उद्देश्य गंगा-ब्रह्मपुत्र-मेघना बेसिन में बाढ़ के जोखिम का प्रबंधन करना है।
- इसका उद्देश्य राजस्थान, गुजरात, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु जैसे पश्चिमी एवं प्रायद्वीपीय राज्यों में जल की कमी को दूर करना है।
- इस योजना का उद्देश्य जल की कमी वाले क्षेत्रों में सिंचाई प्रणाली में सुधार करना, कृषि उत्पादकता को बढ़ावा देना, खाद्य सुरक्षा को प्रोत्साहित करना तथा किसानों की आय को संभवतः दोगुना करना है।
- इससे पर्यावरण अनुकूल अंतर्देशीय जलमार्गों के माध्यम से माल ढुलाई के लिये आधारिक संरचनाओं का विकास सुगम होगा।
- NPP को सतही जल का उपयोग करने के उद्देश्य से परिकल्पित किया गया है ताकि भूजल में हो रही कमी को रोका जा सके तथा समुद्र में प्रवाहित होने वाले स्वच्छ/मीठे/ताज़े जल (Fresh Water) की मात्रा को कम किया जा सके।
- चुनौतियाँ: आर्थिक, सामाजिक और पारिस्थितिक प्रभावों का आकलन करने वाले व्यापक व्यवहार्यता अध्ययन प्रायः अधूरे होते हैं या उनमें कमियाँ होती हैं।
- अपर्याप्त डेटा से परियोजना की प्रभावशीलता और संभावित अनपेक्षित परिणामों के बारे में अनिश्चितताएँ उत्पन्न हो सकती हैं।
- जल राज्य-सूची का विषय है। इसलिये राज्यों के बीच जल साझाकरण पर समझौते जटिल हो जाते हैं। यह स्थिति संभावित विवादों को जन्म देती है। उदाहरण के लिये, केरल और तमिलनाडु के बीच जल साझाकरण से संबंधित मुद्दे।
- बड़े पैमाने पर जल स्थानांतरण से बाढ़ की स्थिति और भी विकट हो सकती है। यह स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को क्षति पहुँचा सकता है। इसके अतिरिक्त जल प्रवाह में परिवर्तन से जलभराव की स्थिति उत्पन्न हो सकती तथा कृषि भूमि में लवणता बढ़ सकती है, जिससे मृदा की गुणवत्ता एवं फसल की पैदावार पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
- बाँधों, नहरों और संबंधित आधारभूत ढाँचे के निर्माण, रख-रखाव एवं संचालन हेतु व्यापक वित्तीय परिव्यय एक महत्त्वपूर्ण आर्थिक बोझ प्रस्तुत करता है।
- जलवायु परिवर्तन से वर्षण प्रतिरूप में बदलाव आ सकता है, जिससे जल की उपलब्धता एवं वितरण दोनों प्रभावित हो सकते हैं, साथ ही नदियों को जोड़ने की परियोजनाओं के अपेक्षित लाभ पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
आगे की राह
- बाढ़ के मैदानों को क्षेत्रीकरण करने, उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में महत्त्वपूर्ण अवसंरचना और बस्तियों को प्रतिबंधित करने के लिये एक व्यापक योजना विकसित की जानी चाहिये। निर्दिष्ट क्षेत्रों में बाढ़ प्रतिरोधी आवास और फसल पैटर्न को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है।
- कोसी नदी के किनारे तटबंधों को सुदृढ़ बनाने में निवेश करने की आवश्यकता है ताकि टूट-फूट को रोका जा सके और जलभराव को कम किया जा सके।
- परियोजना लाभों के न्यायसंगत वितरण को सुनिश्चित करने के लिये एक स्पष्ट तंत्र विकसित किया जाना चाहिये। बाढ़-ग्रस्त क्षेत्रों में बाढ़ नियंत्रण उपायों में महत्त्वपूर्ण निवेश होना चाहिये जबकि जल की कमी वाले क्षेत्रों को बेहतर सिंचाई अवसंरचना से लाभ होना चाहिये।
- नदियों को जोड़ने की योजना के सामने आने वाली चुनौतियों को देखते हुए राष्ट्रीय जलमार्ग परियोजना (NWP) को अपनाना एक आशाजनक विकल्प प्रदान करता है।
- NWP जल बंटवारे पर राज्य के जल-साझाकरण विवादों को रोकती है और सामान्य रूप से समुद्र में बहने वाले अतिरिक्त बाढ़ के जल का उपयोग करके कृषि और विद्युत ऊर्जा उत्पादन के लिये अधिक लागत प्रभावी समाधान प्रदान करती है।
दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न: कोसी-मेची नदी जोड़ो परियोजना के उद्देश्यों और अपेक्षित लाभों पर चर्चा कीजिये। यह नदियों को जोड़ने के लिये राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना के व्यापक लक्ष्यों के साथ किस प्रकार संरेखित है? |
UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)मेन्सप्रश्न. नदियों को आपस में जोड़ना सूखा, बाढ़ और बाधित जल-परिवहन जैसी बहु-आयामी अंतर्संबंधित समस्याओं का व्यवहार्य समाधान दे सकता है। आलोचनात्मक परीक्षण कीजिये। (2020) |