संसद सत्र को दिल्ली से बाहर आयोजित करने की मांग | 04 Dec 2024

प्रिलिम्स के लिये:

लोकसभा, संसद, संसद सदस्य (MP), भारत का संविधान, भारत के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री 

मेन्स के लिये:

दिल्ली के बाहर संसद सत्र आयोजित करने संबंधी मुद्दा, संबंधित चिंताएँ, निहितार्थ एवं आगे की राह।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

चर्चा में क्यों?

हाल ही में YSR कॉन्ग्रेस के एक सांसद ने दिल्ली की भीषण सर्दियों और गर्मियों में सांसदों के समक्ष आवागमन एवं जलवायु संबंधी चुनौतियों का हवाला देते हुए दक्षिण भारत में प्रतिवर्ष दो संसद सत्र आयोजित करने का प्रस्ताव रखा।

  • यह विचार (जिसे बी.आर. अंबेडकर और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे प्रसिद्ध नेतृत्वकर्त्ताओं का ऐतिहासिक समर्थन प्राप्त है) अब नए सिरे से चर्चा का केंद्र बन गया है।

संसद सत्र को दिल्ली से बाहर आयोजित करने के संबंध में पूर्व में क्या मांग थी?

  • डॉ. बी.आर. अंबेडकर द्वारा समर्थित विचार:
    • संसदीय सत्रों के विकेंद्रीकरण का विचार डॉ. बी.आर. अंबेडकर (जिन्होंने दिल्ली के बाहर सत्र आयोजित करने का सुझाव दिया था) ने दिया था। 
    • डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने अपनी पुस्तक "भाषाई राज्यों पर विचार" में दो राजधानियों का प्रस्ताव दिया, जिसमें तर्क दिया गया कि दिल्ली ठंड और दूरी के कारण दक्षिण के लोगों हेतु सबसे असुविधाजनक है जिससे उन्हें उत्तर द्वारा शासित होने का एहसास होता है।
    • उन्होंने पड़ोसी देशों की बमबारी की सीमा में होने के कारण दिल्ली पर हमलों की आशंका को भी एक गंभीर रक्षा संबंधी मुद्दा बताया।
    • उन्होंने हैदराबाद को भारत की दूसरी राजधानी (विशेष रूप से गर्मियों के महीनों के लिये) के रूप में प्रस्तावित किया, क्योंकि यहाँ दिल्ली की तुलना में अनुकूल जलवायु होने से यह वर्ष भर संसदीय सत्रों हेतु उपयुक्त है। 
  • निजी सदस्य का प्रस्ताव:
    • नवंबर 1959 में गुड़गाँव के निर्दलीय सांसद प्रकाश वीर शास्त्री ने एक निजी प्रस्ताव पेश किया जिसमें दक्षिण भारत में लोकसभा का सत्र आयोजित करने का प्रस्ताव था, जिसमें हैदराबाद या बैंगलोर का सुझाव दिया गया था।
    • अटल बिहारी वाजपेयी, जो उस समय पहली बार सांसद बने थे, ने प्रस्ताव का समर्थन करते हुए कहा कि यह “देश की एकता को मज़बूत करने के लिये बनाया गया है” और इसे “राजनीतिक चश्मे” से नहीं देखा जाना चाहिये।

संसद सत्र आयोजित करने की संवैधानिक स्थिति

  • भारत के संविधान में संसदीय सत्र आयोजित करने के लिये किसी विशिष्ट स्थान का प्रावधान नहीं है।
  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 85 राष्ट्रपति को संसद के प्रत्येक सदन को ऐसे समय और स्थान पर बुलाने का अधिकार देता है, जिसे वह उचित समझे, तथा यह सुनिश्चित करता है कि दो सत्रों के बीच छह महीने से अधिक का समय का अंतराल न हो। 
  • हालाँकि, परंपरागत रूप से, सभी सत्र राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली स्थित संसद भवन में आयोजित किये जाते हैं।

संसद सत्र दिल्ली से बाहर आयोजित करने के पीछे क्या तर्क हैं?

  • क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व में वृद्धि: दक्षिण भारत में सत्र आयोजित करने से राष्ट्रीय नीति निर्माण में दक्षिणी राज्यों की दृश्यता और प्रतिनिधित्व में वृद्धि हो सकती है।
    • यह समावेशिता के प्रति प्रतिबद्धता का प्रतीक होगा, तथा यह सुनिश्चित करेगा कि सभी क्षेत्रों की आवाज सुनी जाए तथा उस पर विचार किया जाए।
  • जलवायु संबंधी विचार: दिल्ली में खराब मौसम की स्थिति प्रभावी शासन में बाधा डाल सकती है। अधिक अनुकूल जलवायु से सांसदों के स्वास्थ्य और उत्पादकता में सुधार हो सकता है, जिससे विधायी दक्षता में सुधार होगा।
  • सत्ता का विकेंद्रीकरण: यह पहल राजनीतिक सत्ता के विकेंद्रीकरण की दिशा में एक कदम हो सकता है, जो इस लोकतांत्रिक सिद्धांत के अनुरूप है कि शासन सभी नागरिकों के लिये सुलभ होना चाहिये, चाहे उनकी भौगोलिक स्थिति कुछ भी हो।
  • ऐतिहासिक मिसाल: इसी तरह के प्रस्तावों के लिये ऐतिहासिक हस्तियों से प्राप्त समर्थन वर्तमान पहल को विश्वसनीयता प्रदान करता है, तथा यह सुझाव देता है कि यह एक दीर्घकालिक चिंता का विषय है, जिस पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिये।

बदलाव से क्या चुनौतियाँ उत्पन्न हो सकती हैं?

  • रसद संबंधी बाधाएँ: संसदीय तंत्र, बुनियादी ढाँचे और कार्मिकों को दूसरे क्षेत्र में हस्तांतरित करना जटिल और संसाधन-गहन होगा।
    • आलोचकों ने इसे "थकाऊ" तथा समय एवं संसाधनों की बर्बादी बताया है।
  • राजनीतिक ध्रुवीकरण: आलोचकों का तर्क है कि यह कदम राष्ट्रीय एकता पर क्षेत्रीय पहचान को सुदृढ़ करके उत्तर-दक्षिण विभाजन को और गहरा कर सकता है।
  • संस्थागत इतिहास: संसद 75 वर्षों से अधिक समय से दिल्ली में संचालित हो रही है, लेकिन दक्षिणी राज्यों के संघ में एकीकरण पर इसका कोई असर नहीं पड़ा है। आलोचकों का सुझाव है कि क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व के लिये मौजूदा तंत्र पर्याप्त हैं।

विभिन्न राजधानियों वाले देश कौन-से हैं?

  • दक्षिण अफ्रीका: दक्षिण अफ्रीका तीन राजधानियों के साथ संचालित होता है- प्रिटोरिया (प्रशासनिक), केप टाउन (विधायी) और ब्लोमफोंटेन (न्यायिक)। यह विभाजन भौगोलिक दृष्टि से सत्ता का विकेंद्रीकरण करता है, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व को बढ़ावा देता है और देश के विविध सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक संदर्भों को दर्शाता है।
  • मलेशिया की दोहरी राजधानियाँ: मलेशिया की प्रशासनिक राजधानी कुआलालंपुर है, प्रशासनिक एवं न्यायिक केंद्र पुत्रजय है। एक नियोजित शहर के रूप में पुत्रजय के विकास ने कुआलालंपुर में भीड़भाड़ को कम किया है, जो सरकारी कार्यों के लिये अधिक संगठित वातावरण प्रदान किया है।
  • स्विट्ज़रलैंड का विकेंद्रीकृत मॉडल: स्विट्ज़रलैंड ने विकेंद्रीकृत राजनीतिक संरचना को बनाए रखते हुए बर्न को अपना संघीय शहर घोषित किया है। यह प्रणाली महत्त्वपूर्ण क्षेत्रीय स्वायत्तता सुनिश्चित करती है, जो अपने विविध भाषाई और सांस्कृतिक समूहों के हितों को संतुलित करती है तथा राष्ट्रीय सद्भाव को बढ़ावा देती है।
  • ऑस्ट्रेलिया की उद्देश्यपूर्ण राजधानी: कैनबरा उद्देश्यपूर्ण रूप से निर्मित और सिडनी एवं मेलबर्न के बीच रणनीतिक रूप से स्थित, ऑस्ट्रेलिया की राजधानी के रूप में कार्य करता है। इस निर्णय ने दो सबसे बड़े शहरों के बीच तटस्थता और एकता सुनिश्चित की, जो राष्ट्रीय शासन के लिये विचारशील योजना को दर्शाता है।

आगे की राह 

  • पायलट क्षेत्रीय सत्र: रसद संबंधी चुनौतियों और जनता की प्रतिक्रिया का आकलन करने के लिये बंगलूरू या हैदराबाद जैसे दक्षिणी शहरों में कभी-कभी संसदीय समिति की बैठकें या शीतकालीन सत्र आयोजित करने की आवश्यकता है।
    • दिल्ली के बाहर आयोजित सत्रों की आवृत्ति धीरे-धीरे बढ़ाई जाए।
  • क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व को सुदृढ़ करना: जनगणना सुधारों के बाद दक्षिणी राज्यों के लिये संसदीय सीटों में वृद्धि के माध्यम से अल्प प्रतिनिधित्व की समस्या को दूर करने से, बिना किसी व्यवधान के क्षेत्रीय समता को संतुलित किया जा सकता है।
  • सुगम्यता में वृद्धि: बेहतर संचार प्रौद्योगिकी और सुव्यवस्थित लॉजिस्टिक्स में निवेश से सभी क्षेत्रों के सांसदों के लिये सुगम एकीकरण सुनिश्चित हो सकता है, जिससे यात्रा और जलवायु संबंधी चुनौतियों में कमी आएगी।

निष्कर्ष

दक्षिण भारत में संसदीय सत्र आयोजित करने का प्रस्ताव क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व और राजनीतिक विकेंद्रीकरण से संबंधित चल रही परिचर्चा को रेखांकित करता है। हालाँकि यह समावेशिता और जलवायु संबंधी चुनौतियों के बारे में वैध चिंताओं को उज़ागर करता है, लेकिन इसकी व्यवहार्यता पर सवाल उठाए जाते हैं। मौज़ूदा प्रणालियों को सुदृढ़ करने, प्रौद्योगिकी का लाभ उठाने और क्षेत्रीय पायलट सत्रों के आयोजन के साथ एक संतुलित दृष्टिकोण दक्षता से समझौता किये बगैर इन मुद्दों को प्रभावी ढंग से संबोधित कर सकता है। यह परिचर्चा एक समावेशी और लचीले भारत के लिये प्रशासनिक संरचनाओं की पुनः कल्पना करने का अवसर है।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न: दक्षिण भारत में संसद सत्र आयोजित करने के पक्ष और विपक्ष में तर्कों का मूल्यांकन कीजिये। इससे राष्ट्रीय एकीकरण और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व पर क्या प्रभाव पड़ सकता है?

  UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न  

प्रिलिम्स

प्रश्न. निम्नलिखित में से कौन-सी लोकसभा की अनन्य शक्तियाँ हैं? (2022)

  1. आपात की उद्घोषणा का अनुसमर्थन करना।
  2. मंत्रिपरिषद के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पारित करना।
  3. भारत के राष्ट्रपति पर महाभियोग चलाना।

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:

(a) 1 और 2 
(b) केवल 2 
(c) 1 और 3 
(d) केवल 3

उत्तर: (b)


मेन्स:

प्रश्न. आपकी दृष्टि में भारत में कार्यपालिका की जवाबदेही को निश्चित करने में संसद कहाँ तक समर्थ है? (2021)