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ट्रांसजेनिक अनुसंधान

  • 01 Apr 2025
  • 2 min read

स्रोत: द हिंदू

पारजीनी अथवा ट्रांसजेनिक अनुसंधान ने महत्त्वपूर्ण रूप से चर्चा का विषय बन गया है, विशेष रूप से वैज्ञानिक अध्ययनों में ट्रांसजेनिक चूहों के उपयोग के संबंध में, जिसमें वैज्ञानिक अनुसंधान में प्रगति करने में उनके उपयोग और महत्त्व पर ध्यान केंद्रित किया गया है।

  • ट्रांसजेनिक अनुसंधान: इसमें प्रायः प्रयोगशाला में एक विशिष्ट जीव में किसी अन्य प्रजाति के बाह्य डीऑक्सीराइबोन्यूक्लिक एसिड (DNA) अनुक्रमों को शामिल कर जीव के जीनोम में परिवर्तन करना शामिल है। 
    • "ट्रांसजेनिक" शब्द इसके मूल शब्द "ट्रांस" से प्राप्त हुआ है जिसका अर्थ है "पार" या "एक से दूसरे तक", और "जेनिक", जो जीन को संदर्भित करता है।
    • इस अनुसंधान क्षेत्र में आनुवंशिक अध्ययन, रोग मॉडलिंग और जैव प्रौद्योगिकी प्रगति के लिये ट्रांसजेनिक जंतुओं, पौधों और सूक्ष्मजीवों का निर्माण शामिल है।
    • ट्रांसजेनिक चूहों का उपयोग सामान्यतः आनुवंशिक अध्ययनों में जीन के कार्यों, रोग तंत्रों और कैंसर अनुसंधान, आनुवंशिक विकारों और प्रजनन स्वास्थ्य में उनकी भूमिका का पता लगाने के लिये किया जाता है, जिसका जैव प्रौद्योगिकी और कृषि की प्रगति में योगदान है।
  • भारत में ट्रांसजेनिक अनुसंधान: कपास एकमात्र ट्रांसजेनिक फसल है जिसकी भारत में व्यावसायिक रूप से कृषि की जा रही है।
    • आनुवंशिक इंजीनियरिंग मूल्यांकन समिति (GEAC) पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अंतर्गत सर्वोच्च निकाय है, जो परिसंकटमय सूक्ष्मजीवों और पुनः संयोजकों के अनुसंधान तथा औद्योगिक उपयोग के पर्यावरणीय प्रभाव का मूल्यांकन करता है।

Transgenic

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