बच्चे का उपनाम तय करने का माँ का अधिकार | 06 Aug 2022
प्रिलिम्स के लिये:भारत में संरक्षकता कानून। मेन्स के लिये:संरक्षकता पर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले |
चर्चा में क्यों?
हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि जैविक पिता (पति) की मृत्यु के बाद बच्चे की एकमात्र नैसर्गिक अभिभावक होने के नाते माँ को बच्चे का उपनाम तय करने का अधिकार है।
- अदालत जनवरी 2014 में आंध्र प्रदेश के उच्च न्यायालय द्वारा पारित एक फैसले को चुनौती देने वाली एक याचिका पर विचार कर रही थी, दायर याचिका में बच्चे के उपनाम को अपने पहले दिवंगत पति का उपनाम हटाकर दूसरे पति के उपनाम को दर्ज करने के लिये कहा गया था।
सर्वोच्च न्यायालय के नए नियम:
- उपनाम न केवल वंश का संकेत है और न ही इसे केवल इतिहास, संस्कृति और वंश के संदर्भ में समझा जाना चाहिये, बल्कि इससे भी महत्त्वपूर्ण भूमिका यह है कि यह सामाजिक वास्तविकता के साथ-साथ अपने विशेष वातावरण में बच्चों की भावना के संबंध में भूमिका निभाता है।
- उपनाम की एकरूपता 'परिवार' बनाने, उसे बनाए रखने और प्रदर्शित करने की एक विधा के रूप में उभरती है।
- सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि एकमात्र नैसर्गिक अभिभावक होने के नाते माँ अपने दूसरे पति को बच्चे को गोद लेने का अधिकार भी दे सकती है।
भारत में संरक्षकता से संबंधित कानून:
- हिंदू अप्राप्तवयता और संरक्षकता अधिनियम:
- भारतीय कानून नाबालिग (18 वर्ष से कम आयु) की संरक्षकता के मामले में पिता को वरीयता प्रदान करते हैं।
- हिंदुओं के धार्मिक कानून या हिंदू अल्पसंख्यक और संरक्षकता अधिनियम, (HMGA) 1956 के तहत नाबालिग या संपत्ति के संबंध में एक हिंदू नाबालिग का प्राकृतिक अभिभावक पिता होता है तथा उसके बाद माता का अधिकार है।
- बशर्ते कि एक नाबालिग जिसकी पांँच वर्ष की उम्र पूरी नहीं हुई है, की कस्टडी सामान्यत माँ के पास होगी।
- संरक्षक और प्रतिपाल्य अधिनियम, 1890 (GWA):
- यह बच्चे और संपत्ति दोनों के संबंध में एक व्यक्ति को बच्चे के 'अभिभावक' के रूप में नियुक्त करने से संबंधित है।
- माता-पिता के बीच चाइल्ड कस्टडी, संरक्षकता और मुलाकातों के मुद्दों को GWA के तहत निर्धारित किया जाता है, अगर नैसर्गिक अभिभावक अपने बच्चे के लिये एक विशेष अभिभावक के रूप में घोषित होना चाहते हैं।
- GWA के तहत एक याचिका में माता-पिता के बीच विवाद होने पर इसे HMGA के साथ जोड़कर पढ़ा जाता है, अभिभावकता और कस्टडी एक माता-पिता के साथ दूसरे माता-पिता के मिलने या मुलाकात के अधिकारों के साथ निहित हो सकती है।
- ऐसा करने में नाबालिग या "बच्चे के सर्वोत्तम हित" का कल्याण सर्वोपरि होगा।
"बच्चे के सर्वोत्तम हित" का आशय:
- भारत बाल अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन (UNCRC) का एक हस्ताक्षरकर्त्ता है।
- किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015 में UNCRC में मौजूद ‘बच्चे के सर्वोत्तम हितों’ की परिभाषा को शामिल किया गया है।
- "बच्चे के सर्वोत्तम हित" का अर्थ है "बच्चे के संबंध में लिये गए किसी भी निर्णय का आधार उसके मूल अधिकारों और ज़रूरतों, पहचान, सामाजिक कल्याण एवं शारीरिक, भावनात्मक व बौद्धिक विकास की पूर्ति सुनिश्चित करने के लिये" तथा किसी भी हिरासत की लड़ाई/ कस्टडी बेटल (custody battle) में सर्वोपरि है।
- मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) अनुप्रयोग अधिनियम, 1937:
- मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) अनुप्रयोग अधिनियम [The Muslim Personal Law (Shariat) Application Act, 1937] के अनुसार, संरक्षकता के मामले में शरीयत या धार्मिक कानून लागू होगा, जिसके अनुसार जब तक बेटा सात साल की उम्र पूरी नहीं कर लेता है और बेटी प्रौढ़ अवस्था को प्राप्त नहीं कर लेती है तब तक पिता प्राकृतिक अभिभावक है, हालांँकि पिता को सामान्य पर्यवेक्षण एवं नियंत्रण का अधिकार प्राप्त है।
- मुस्लिम कानून में अभिरक्षा या 'हिजानत' (Hizanat) की अवधारणा में कहा गया है कि बच्चे का कल्याण सर्वोपरि है।
- यही कारण है कि मुस्लिम कानून बाल्यावस्था (Tender Years) में बच्चों की कस्टडी के मामले में पिता के स्थान पर माता को वरीयता प्रदान करता है।
- सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय:
- वर्ष 1999 में गीता हरिहरन बनाम भारतीय रिज़र्व बैंक मामले में सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक फैसले ने आंशिक राहत प्रदान की।
- इस मामले में HMGA को भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत लैंगिक समानता की गारंटी के उल्लंघन के लिये चुनौती दी गई थी।
- अनुच्छेद 14 कहता है कि किसी भी व्यक्ति को भारत के क्षेत्र में कानून के समक्ष समानता या कानूनों के समान संरक्षण से वंचित नहीं किया जाएगा।
- न्यायालय ने माना कि "बाद" शब्द का अर्थ "पिता के जीवनकाल के बाद" नहीं होना चाहिये, बल्कि "पिता की अनुपस्थिति में" होना चाहिये।
- हालाँकि निर्णय माता-पिता दोनों को समान अभिभावक के रूप में मान्यता देने में विफल रहा, जिससे माता की भूमिका पिता की भूमिका के अधीन हो गई।
- हालाँकि यह फैसला न्यायालयों के लिये मिसाल कायम करता है, लेकिन इससे HMGA में कोई संशोधन नहीं हुआ है।
आगे की राह
- बाल-केंद्रित मानव अधिकार न्याय प्रणाली जो समय के साथ विकसित हुआ है, इस सिद्धांत पर स्थापित किया गया है कि सार्वजनिक भलाई बच्चे के उचित विकास की मांग करती है, जो कि राष्ट्र का भविष्य है।
- इसलिये समान अधिकारों के साथ साझा या संयुक्त पालन-पोषण बच्चे के इष्टतम विकास के लिये व्यवहार्य, व्यावहारिक, संतुलित समाधान हो सकता है।
- भारत के विधि आयोग ने मई 2015 में "भारत में संरक्षकता और अभिरक्षा कानूनों में सुधार" पर अपनी 257वीं रिपोर्ट में सिफारिश की थी कि "एक माता-पिता की दूसरे पर श्रेष्ठता को हटा दिया जाना चाहिये"।
- माता और पिता दोनों को एक साथ अवयस्क बच्चें के प्राकृतिक संरक्षक/अभिभावक के रूप में माना जाना चाहिये।
- HMGA में संशोधन किया जाना चाहिये ताकि "पिता और माता दोनों को संयुक्त रूप से प्राकृतिक अभिभावक के रूप में स्थापित किया जा सके तथा नाबालिग एवं उसकी संपत्ति के संबंध में समान अधिकार हो।