मुख्य परीक्षा
कृषि उपज से किसानों की आय: RBI
- 01 Mar 2025
- 5 min read
स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस
चर्चा में क्यों?
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने रबी फसलों में उपभोक्ता मूल्यों में किसानों की हिस्सेदारी पर एक अखिल भारतीय सर्वेक्षण किया।
- इसमें 18 राज्यों की मंडियों और गाँवों को शामिल किया गया, जिसमें 12 रबी फसलों का विश्लेषण किया गया तथा किसानों, व्यापारियों और खुदरा विक्रेताओं से प्राप्त इनपुट भी शामिल किये गए।
कृषि उपज से किसानों की आय पर सर्वेक्षण के मुख्य निष्कर्ष क्या हैं?
- उपभोक्ता मूल्यों में किसानों की हिस्सेदारी: सर्वेक्षण में शामिल प्रमुख रबी फसलों के लिये किसानों को अंतिम उपभोक्ता मूल्य का 40-67% प्राप्त हुआ।
- गेहूँ किसान: गेहूँ किसानों को उपभोक्ता मूल्य का 67% प्राप्त हुआ, जो सर्वेक्षण की गई फसलों में सर्वाधिक है , तथा 25% किसानों ने सुनिश्चित बाज़ार के लिये MSP पर अपनी फसल बेची।
- चावल और अन्य अनाज: खुदरा कीमतों में चावल किसानों की हिस्सेदारी वर्ष 2024 में 52% थी जो पिछले कुछ वर्षों में स्थिर रही, अर्थात वर्ष 2022 में 45% और वर्ष 2018 में 49%।
- दलहन और तिलहन: मसूर किसानों को उपभोक्ता मूल्य का लगभग 66% प्राप्त हुआ, जबकि चना किसानों को उपभोक्ता मूल्य का 60% प्राप्त हुआ।
- सरसों किसानों को 52% प्राप्त हुआ, जो वर्ष 2021 के अध्ययन में दर्ज 55% से थोड़ा कम है।
- शीघ्र नष्ट होने वाली फसलें: फलों और सब्जियों में किसानों की हिस्सेदारी 40-63% के बीच थी, जो अनाज और दालों की तुलना में काफी कम है।
- अधिकांश शीघ्र नष्ट होने वाली फसलों (टमाटर को छोड़कर) के लिये उपभोक्ता कीमतों में व्यापारियों और खुदरा विक्रेताओं की संयुक्त हिस्सेदारी 50% से अधिक थी।
- शीघ्र नष्ट होने वाली फसलों (फल और सब्जियाँ) में किसानों की हिस्सेदारी गैर-जल्दी खराब होने वाली फसलों (जैसे गेहूँ और दालें) की तुलना में कम थी।
- शीघ्र नष्ट होने वाले उत्पादों की शेल्फ लाइफ कम होती है, इनका उत्पादन मौसमी होता है, इनकी गुणवत्ता भिन्न होती है, विशेष लॉजिस्टिक्स, सख्त मानक, मांग में उतार-चढ़ाव, जलवायु पर निर्भरता और आपूर्ति शृंखला अनिश्चितताएँ होती हैं।
- डिजिटल लेनदेन: कृषि में नकद लेनदेन अभी भी हावी है, लेकिन वर्ष 2018 और वर्ष 2022 की तुलना में वर्ष 2024 के सर्वेक्षण में इलेक्ट्रॉनिक भुगतान में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
- आपूर्ति शृंखला चुनौतियाँ:
- अनेक मध्यस्थों वाली असंगठित आपूर्ति शृंखला, उत्पाद की आवाजाही, वित्त और मूल्य निर्धारण में पारदर्शिता को सीमित करती है, जिससे उपभोक्ता कीमतों में किसानों का हिस्सा कम हो जाता है।
- किसानों की कम हिस्सेदारी अनाज के अलावा फसल विविधीकरण को हतोत्साहित करती है।
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