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सामाजिक न्याय

दिव्यांग (divyang) होने के मायने

  • 29 Dec 2018
  • 9 min read

वर्तमान संदर्भ

  • दिव्यांगों की स्थिति में सुधार लाकर उन्हें मुख्य धारा से जोड़ने के उद्देश्य से राज्यसभा ने ‘निःशक्त व्यक्ति अधिकार विधेयक, 2014 पारित कर दिया है। इस विधेयक में दिव्यांग जनों के हित में कई प्रावधान किये गए हैं।
  • विधेयक में दिव्यांग जनों की श्रेणियों को सात से बढ़ाकर 21 कर दिया गया है। अब एसिड हमले के पीडि़त सहित पार्किंसन, सेरेब्रल पाल्सी, ऑटिज्म जैसे रोगों के शिकार व्यक्ति भी निशक्तजनों में शामिल हो जाएंगे। साथ ही दिव्यांगजनों के स्वाभिमान को बनाए रखने के लिये यह प्रावधान किया गया है कि उनसे किसी भी प्रकार का भेदभाव करने पर दो साल की जेल और अधिकतम पांच लाख रूपए का ज़ुर्माना लगाया जाएगा। इसके अतिरिक्त उनके लिये आरक्षण की सीमा भी 4 प्रतिशत कर दी गई है।
  • यद्यपि ये कानूनी प्रावधान काफी सशक्त हैं किंतु जब तक आम जनमानस इन वर्गों के प्रति संवेदनशील नहीं होगा तब तक समाधान का कोई भी प्रयास प्रभावी नहीं हो पाएगा। हमें यह समझना बहुत ज़रूरी है कि आखिर यह निशक्तता की अवधारणा है क्या? इसका विकास के प्रारूप से क्या संबंध है?

विकास की प्रक्रिया और दिव्यांगता

  • दरअसल, हमारी सामाजिक सहमति इस प्रकार की बनी है कि हम उनके प्रति दयाभाव रखते हैं और यह मानकर चलते हैं कि चूँकि वे हमारी तरह सक्षम नहीं है; इसलिये गाहे बगाहे इन ‘बेचारों’ की मदद कर इंसानियत पर एहसान कर दिया जाए। हमारी दृष्टि ‘एक अलग’ से दिखने वाले इंसान के लिये कारुणिक हो जाती है और उस पूरे समूह को मानव संसाधन से अलग कर निशक्तजन की श्रेणी में डाल दिया जाता है, जबकि वास्तविकता इससे अलग है।
  • हमारे मन में ऐसा भाव इसलिये आता है क्योंकि हमारी धारणा कुछ इस तरह की है कि ये ‘सशक्तों’ की तुलना में ‘निशक्त’ है। ऐसी धारणा इसलिये भी बनती है क्योंकि हम में से अधिकांश लोग इस शक्ति के स्रोत से अनभिज्ञ होते हैं और हमें नहीं पता होता है कि ऐसा विभाजन क्यों है?
  • दरअसल, मानव ने अपने विकास क्रम के दौरान अपने आस-पास के परिवेश को अपने अनुकूल बदलना प्रारंभ किया।मनुष्य ने हर उस चीज़ को बदलना चाहा जो उसे कठिन लगती थी। सामान्यीकृत तौर पर हम ये कह सकते हैं कि सुख-सुविधा हमेशा से मानव सभ्यता के विकास का एक आवश्यक अंग रहा है और इंसानों द्वारा किये जाने वाले हर परिवर्तन के मूल में यही छिपा होता है कि कैसे जीवन को आसान बनाया जाए। पहले आग की खोज हुई, जिससे एक तो जंगली जानवरों से सुरक्षा प्राप्त हुई और दूसरे भोजन को भी पकाकर खाया जाने लगा। फिर उसके बाद पहिये की खोज से मानव जीवन में गति आई और फिर परिवर्तन का यह सिलसिला चलते हुए आज क्वांटम कम्प्यूटर तकनीकी के विकास तक पहुंच गया है। ये सारे बदलाव या यूं कहें मानव विकास की यह प्रक्रिया जीवन को आसान बनाने के लिये ही तो हुई। लेकिन अब सवाल यह है कि इससे किसका जीवन आसान हुआ? या फिर इन बदलावों के केंद्र में मानव का कौन सा ढाँचा स्थित था?
  • जाहिर है कि हमारे मन में मानव कहने के साथ जो तस्वीर उभरती है वो है दो हाथ, दो पैर, दो आंख आदि। अतः जो भी परिवर्तन जीवन को आसान बनाने के लिये हुए उनके केंद्र में मानव शरीर का यही ढाँचा था और जो अल्पसंख्यक समूह किसी कारणवश इस ढाँचे से अलग था उनके लिये ये सारे बदलाव कोई महत्त्व के नहीं रहे। इस तरह परिवहन के साधनों से लेकर मनोरंजन की विधियों तक, सब उन्हीं ‘स्वस्थ’ मानवों के अनुकूल थी, जिसे स्वाभाविक रूप से होना भी था, किंतु इस स्वाभाविक परिवर्तन का लाभ उन लोगों को नहीं मिल पाया जो हमारे निर्धारित शारीरिक स्वास्थ्य के पैमाने के अनुसार अस्वस्थ हैं।
  • वस्तुतः चूँकि समग्र रूप से इस विकासक्रम में यह वर्ग कहीं शामिल था ही नहीं इसलिये जो परिवर्तन दूसरों के लिये आसानी बनकर आए वही इनके लिये मुश्किल बन गये क्योंकि सम्पादित परिवर्तन इनके शरीर के अनुकूल था ही नहीं। चाहे गाड़ी-मोटर का निर्माण हो या फिर साइकिल, सड़क हो या पैदलपथ, रेलवे प्लेटफॉर्म हो या बस अड्डा सभी का संयोजन बहुसंख्यक मानव समुदाय ने अपने अनुसार ही किया।
  • चूँकि इन नए साधनों का उपयोग करने में एक वर्ग असमर्थ है इसलिये हम इन्हें विकलांग/दिव्यांग या फिर निशक्तजन कहने लगे। दरअसल, कोई सशक्त इसलिये है क्योंकि संसाधनो का विकास इस प्रकार हुआ है कि वह उसका उपयोग कर पा रहा है और कोई निशक्त इसलिये है क्योंकि संसाधनों का विकास उनके अनुकूल नहीं किया गया है। कहने का तात्पर्य यह है कि ये अशक्त और निशक्त जैसी शब्दावलियाँ भ्रामक हैं। इससे केंद्र में शरीर आ जाता है, जबकि आना चाहिये विकास के स्वरूप को। कुछ सुसंगत उदाहरणों के माध्यम से इसे समझा जा सकता है। जैसे यदि हरेक प्लेटफॉर्म पर ऐसी सुविधा हो कि व्हीलचेयर बिना किसी सहारे के ट्रेन के डिब्बे में प्रवेश कर जाए तो कोई अक्षम क्यों कहलायेगा? उसी तरह यदि सीढि़यों के साथ लिफ्ट भी हो तो किसी ठीक से न चल पाने वाले व्यक्ति के लिये भी ऊपर चढ़ना आसान हो जाएगा। ठीक ऐसे ही यदि पढ़ने के लिये ‘देखना’ अनिवार्य न हो तो किसी नेत्रहीन के लिये समस्या क्यों होगी? अर्थात यदि ज्ञान के स्रोतों को देखने के साथ साथ हाथ से छूकर पढ़ने (ब्रेल लिपि) तथा किसी अन्य श्रव्य विधा (सीडी/कैसेट) के माध्यम से प्रस्तुत किया जाए तो अभी इससे महरूम रहने वाला वर्ग भी आसानी से पढ़ पाएगा।इस तरह के उदाहरण अन्य क्षेत्रों में भी देखे जा सकते हैं।

निष्कर्ष


निष्कर्ष यही है कि कोई निशक्त इसलिये है क्योंकि हम उनके लिये वैसे सुविधाओं का निर्माण नहीं कर पाए हैं जो उनके लिये सहज हों। यदि हम उन्हें, उनके अनुकूल सुविधा उपलब्ध करा पाते हैं तो वो भी एक संसाधन बन जाएंगे। मानव सभ्यता के इतने लम्बे विकास क्रम के बाद अब ये उम्मीद तो की ही जानी चाहिये कि अब विकास का स्वरूप उन अल्पसंख्यक समूहों को भी अपने दायरे में शामिल करेगा जो अब तक किसी कारणवश संभव न हो सका। हमारा मुख्य ध्येय होना चाहिये उन्हें मुख्य धारा में शामिल करना और यह तभी हो पाएगा जब उन तक अवसरों की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए। हर मानव अपने आप में विशिष्ट होता है बस ज़रूरत है उस विशिष्टता को उभारने की। कोई भी समुदाय कभी भी समरूपी नहीं रहा है, इसलिये विकास के स्वरूप को भी एकांगी न होकर बहुआयामी होना चाहिये।

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