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Sambhav-2025

  • 25 Feb 2025 सामान्य अध्ययन पेपर 2 अंतर्राष्ट्रीय संबंध

    दिवस- 74: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की वर्तमान संरचना द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की शक्ति संतुलन को प्रतिबिंबित करती है, जो वर्तमान वैश्विक भू-राजनीतिक परिदृश्य के साथ असंगत मानी जाती है। इस संदर्भ में विश्लेषण कीजिये। (150 शब्द)

    उत्तर

    हल करने का दृष्टिकोण: 

    • संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) और वैश्विक शांति एवं सुरक्षा बनाए रखने में इसकी भूमिका का संक्षिप्त परिचय दीजिये।
    • भू-राजनीतिक वास्तविकताएँ किस प्रकार विकसित हुई हैं, इस पर प्रकाश डालिये।
    • संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार का सुझाव दीजिये।
    • उचित रूप से निष्कर्ष दीजिये।

    परिचय: 

    संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की स्थापना वर्ष 1945 में वैश्विक शांति और सुरक्षा बनाए रखने की प्राथमिक ज़िम्मेदारी के साथ की गई थी। इसकी संरचना द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के युग की शक्ति गतिशीलता को दर्शाने के लिये डिज़ाइन की गई थी, जिसमें पाँच स्थायी सदस्यों (P5) - संयुक्त राज्य अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम, फ्राँस, सोवियत संघ (अब रूस) और चीन को वीटो शक्ति प्रदान की गई थी। हालाँकि तब से वैश्विक शक्ति संरचनाएँ काफी विकसित हुई हैं, जिससे समकालीन भू-राजनीतिक चुनौतियों का समाधान करने में UNSC की वैधता, प्रभावशीलता और प्रतिनिधित्व के बारे में चिंताएँ बढ़ गई हैं।

    मुख्य भाग: 

    बदलती वैश्विक शक्ति गतिशीलता में UNSC की आलोचना

    • प्रतिनिधित्व का अभाव:
      • भारत, ब्राज़ील, दक्षिण अफ्रीका और जापान जैसे देशों ने महत्त्वपूर्ण आर्थिक, सैन्य एवं कूटनीतिक प्रभाव प्राप्त कर लिया है।
      • विश्व की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और परमाणु शक्ति संपन्न भारत संयुक्त राष्ट्र शांति स्थापना में महत्त्वपूर्ण योगदान देता है, फिर भी उसे सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता प्राप्त नहीं है। इस असमानता पर विचार करें।
      • 54 सदस्य देशों वाला अफ्रीका, जो गंभीर सुरक्षा चुनौतियों का सामना कर रहा है, अभी भी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी प्रतिनिधित्व से वंचित है। इस असमानता पर विचार करें।
    • यूरो-केंद्रित से भारत-प्रशांत फोकस की ओर बदलाव:
      • चीन, भारत और आसियान देशों के उदय के कारण भू-राजनीतिक प्रभाव का केंद्र अटलांटिक से हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थानांतरित हो गया है।
      • अमेरिका-चीन सामरिक प्रतिद्वंद्विता P5 से परे एक व्यापक सुरक्षा ढाँचे की आवश्यकता को उजागर करती है।
    • वीटो शक्ति का दुरुपयोग:
      • P5 राष्ट्र अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिये संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में वीटो शक्ति का उपयोग करके प्रस्तावों को रोकते हैं।
      • उदाहरण:
        • यूक्रेन पर आक्रमण की निंदा करने वाले प्रस्तावों पर रूस का वीटो (2022) 
        • मध्य पूर्व में फिलिस्तीनी मुद्दों पर अमेरिका का वीटो।
    • वैश्विक संघर्षों का प्रभावी ढंग से समाधान करने में विफलता:
      • प्रमुख मानवीय संकटों में निष्क्रियता के लिये संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की आलोचना की गई है, जैसे:
        • सीरियाई गृह युद्ध (रूसी वीटो के कारण गतिरोध)।
        • म्याँमार में रोहिंग्या संकट (म्याँमार के लिये चीन का वीटो संरक्षण)।
        • इज़रायल-फिलिस्तीन संघर्ष, जहाँ बार-बार अमेरिकी वीटो के कारण समाधान अवरुद्ध हो गया है।
    • नई सुरक्षा चुनौतियाँ:
      • साइबर सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन, अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद और महामारी जैसे समकालीन खतरों के लिये अधिक समावेशी तथा प्रतिनिधि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की आवश्यकता है।

    संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद सुधार के लिये प्रमुख प्रस्ताव

    • स्थायी सदस्यता का विस्तार:
      • भारत, ब्राज़ील, जर्मनी, जापान और अफ्रीकी देशों जैसी उभरती शक्तियों को शामिल करना।
      • भारत के पास मज़बूत साख है: दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र, परमाणु शक्ति, और प्रमुख संयुक्त राष्ट्र शांति स्थापना योगदानकर्त्ता
    • वीटो शक्ति को सीमित या समाप्त करना:
      • P5 की एकतरफा प्रस्तावों को अवरुद्ध करने की क्षमता को कम करना
      • मानवीय संकटों में वीटो को रद्द करने के लिये दो-तिहाई बहुमत प्रणाली को अपनाना।
    • बेहतर क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व:
      • क्षेत्रीय चिंताओं को प्रतिबिंबित करने के लिये अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और मध्य पूर्व के लिये स्थायी सीटें आवंटित करना।
      • उदाहरण: अफ्रीकी संघ (AU) ने लगातार अधिक प्रतिनिधित्व की मांग की है।
    • संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाना:
      • निर्णय लेने में संयुक्त राष्ट्र महासभा के साथ अधिक परामर्श।
      • संकटों पर समयबद्ध और प्रभावी प्रतिक्रिया सुनिश्चित करने हेतु सुधार आवश्यक हैं।

    निष्कर्ष:

    वर्तमान UNSC संरचना पुरानी हो चुकी है और बहुध्रुवीय दुनिया की वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित नहीं करती है। यदि सुधार नहीं किये गए, तो UNSC वैश्विक सुरक्षा चुनौतियों के समाधान में अपनी विश्वसनीयता और प्रभावशीलता खोने का खतरा उठाएगी। हालाँकि सुधार हासिल करना कठिन है, लेकिन वैश्विक शांति, स्थिरता और अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था में निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिये एक अधिक समावेशी एवं लोकतांत्रिक UNSC अनिवार्य है।

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