Q2. 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था की ओर अग्रसर होने वाले भारत जैसे देश में मानव विकास को प्राप्त किये बिना, आर्थिक विकास प्राप्त करने की व्यवहार्यता का परीक्षण कीजिये। (250 शब्द)
14 Feb 2024 | सामान्य अध्ययन पेपर 3 | अर्थव्यवस्था
दृष्टिकोण / व्याख्या / उत्तर
हल करने का दृष्टिकोण:
- उत्तर की शुरुआत भारत में आर्थिक वृद्धि का परिचय देकर कीजिये।
- मानव विकास किये बिना 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था के साथ भारत की आर्थिक वृद्धि हासिल करने की व्यवहार्यता का वर्णन कीजिये।
- तद्नुसार निष्कर्ष लिखिये।
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परिचय:
भारत ने 5 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने का महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है, लेकिन मानव विकास में प्रगति के बिना इस लक्ष्य को हासिल करना महत्त्वपूर्ण चुनौतियों का सामना कर सकता है। आर्थिक विकास को प्रायः GDP जैसे संकेतकों द्वारा मापा जाता है, जबकि मानव विकास स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन की गुणवत्ता जैसे कारकों पर केंद्रित है।
मुख्य भाग:
मानव विकास के बिना आर्थिक विकास की चुनौतियाँ:
- आय असमानता:
- मानव विकास पर ध्यान दिये बिना, आर्थिक विकास से आबादी के केवल एक छोटे भाग को लाभ प्राप्त हो सकता है, जिससे आय की असमानता में वृद्धि होगी।
- इसके परिणामस्वरूप सामाजिक अशांति और राजनीतिक अस्थिरता उत्पन्न हो सकती है, जैसा कि ऑक्सफैम असमानता रिपोर्ट एवं सामाजिक न्याय व अधिकारिता मंत्रालय द्वारा सुनिश्चित किया गया है।
- स्वास्थ्य देखभाल:
- अकेले आर्थिक विकास से जनसंख्या के लिये स्वास्थ्य देखभाल परिणामों में सुधार नहीं हो सकता है।
- स्वास्थ्य देखभाल के बुनियादी ढाँचे और सेवाओं में पर्याप्त निवेश के बिना, बीमारी एवं मृत्यु दर का बोझ अधिक रह सकता है।
- शिक्षा:
- शिक्षा कम ध्यान दिया जाना कुशल श्रम और नवाचार की उपलब्धता को सीमित करके दीर्घकालिक आर्थिक विकास में बाधा बन सकता है।
- विश्व बैंक द्वारा जारी मानव पूंजी सूचकांक पहले से ही एक निराशाजनक तस्वीर प्रस्तुत करता है।
- जीवन स्तर:
- आर्थिक विकास से भौतिक संपदा में वृद्धि हो सकती है, लेकिन जीवन प्रत्याशा, साक्षरता दर और स्वच्छ जल एवं स्वच्छता तक पहुँच जैसे जीवन संकेतकों की गुणवत्ता में सुधार के बिना, जनसंख्या के समग्र हित में उल्लेखनीय सुधार नहीं हो सकता है।
- जनसांख्यिकीय विभाजन:
- पर्याप्त मानव विकास के बिना, भारत का जनसाँख्यिकीय लाभांश एक दायित्व बनने का जोखिम रखता है और 4D (विविधता, जनसाँख्यिकी, मांग एवं लोकतंत्र) का उपयोग अधूरा रहेगा।
आर्थिक विकास को मानव विकास के साथ एकीकृत करना:
- व्यवसाय और जीवनयापन को सरल बनाने के लिये निजी निवेश को बढ़ावा देना:
- विगत चार वर्षों में सरकार ने 1,300 से अधिक पुराने कानूनों को समाप्त कर दिया है। इसने कई पुरानी प्रक्रियाओं, नियमों एवं विनियमों को भी समाप्त कर दिया है।
- सुधारों की एक शृंखला के माध्यम से, भारत ने विश्व बैंक की कारोबार सुगमता सूची में 65 पायदान की छलांग लगाई है, जिसे निरंतर जारी रहना चाहिये।
- शहरीकरण - विकास का एक बड़ा चालक:
- शहर पृथ्वी के भू-भाग का 5% से भी कम हिस्सा हैं, लेकिन वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद में उनका हिस्सा 75% से अधिक है। इसलिये, शहरों में शहरीकरण महत्त्वपूर्ण है क्योंकि वे आर्थिक विकास के केंद्र हैं।
- विकास के लिये वैश्वीकरण:
- भारत एक वैश्वीकृत और अन्योन्याश्रित दुनिया में स्थित है। जापान, कोरिया और चीन की तरह, वैश्वीकरण ने आबादी के बड़े हिस्से को गरीबी रेखा से ऊपर उठाने में मदद की है।
- वैश्विक निर्यात में भारत की हिस्सेदारी 2% से भी कम है। इसलिये, भारत को वैश्विक निर्यात का लक्ष्य तय करने और उसे पूर्ण करने की कला सीखनी चाहिये।
- महिलाओं की महत्त्वपूर्ण भागीदारी :
- लैंगिक समानता के बिना भारत तीन दशक की अवधि में उच्च दर से विकास नहीं कर सका। भारत में केवल 26% महिलाएँ काम करती हैं; जबकि दुनिया भर में इसका औसत 48% है।
- यदि आबादी का इतना बड़ा हिस्सा काम नहीं करेगा और महिलाओं को सत्ता के पदों पर नहीं बिठाया जाएगा, तो भारत के लिये विकास करना बहुत मुश्किल होगा।
- महत्त्वपूर्ण कृषि सुधार:
- कृषि क्षेत्र में कुछ बड़े संरचनात्मक सुधारों के बिना लंबे समय तक विकास करना मुश्किल है क्योंकि यह भारत के लगभग 60% लोगों को रोज़गार प्रदान करता है।
- बेहतर बाज़ार सुनिश्चित किये बिना, प्रौद्योगिकी लागू किये बिना, अनुबंध कृषि आदि के बिना किसानों को सब्सिडी और सहायता प्रदान करना अर्थव्यवस्था पर दबाव डालेगा।
निष्कर्ष:
मानव विकास के बिना आर्थिक विकास सुनिश्चित करना न केवल चुनौतीपूर्ण है, बल्कि दीर्घकालिक रूप से सतत् भी नहीं है। भारत को अपने सभी नागरिकों के लिये समृद्ध और न्यायसंगत भविष्य सुनिश्चित करने के लिये आर्थिक एवं मानव विकास दोनों को प्राथमिकता देनी चाहिये।