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प्रश्न :
प्रश्न. भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका में न्यायिक समीक्षा के सिद्धांतों और प्रथाओं का परीक्षण कीजिये। इन दोनों लोकतंत्रों के संवैधानिक दृष्टिकोण अपनी न्यायपालिकाओं को सशक्त बनाने में किस प्रकार भिन्न हैं? (250 शब्द)
25 Mar, 2025 सामान्य अध्ययन पेपर 2 राजव्यवस्थाउत्तर :
हल करने का दृष्टिकोण:
- न्यायिक समीक्षा के संदर्भ में संक्षिप्त जानकारी के साथ उत्तर प्रस्तुत दीजिये।
- संयुक्त राज्य अमेरिका और भारत में न्यायिक समीक्षा के सिद्धांत एवं अभ्यास पर चर्चा कीजिये।
- संवैधानिक दृष्टिकोण में भिन्नताओं पर प्रकाश डालिये।
- उचित निष्कर्ष दीजिये।
परिचय:
न्यायिक समीक्षा न्यायपालिका की विधायी और कार्यकारी कार्यों की संवैधानिकता की समीक्षा करने की शक्ति है। यद्यपि भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका दोनों ही संवैधानिक लोकतंत्र की आधारशिला के रूप में न्यायिक समीक्षा को बनाए रखते हैं, फिर भी दायरे, अभ्यास और संवैधानिक आधार के संदर्भ में दोनों राष्ट्रों के दृष्टिकोण काफी भिन्न हैं।
मुख्य भाग:
भारत में न्यायिक समीक्षा के सिद्धांत और अभ्यास
- संवैधानिक आधार: भारतीय संविधान में अनुच्छेद 13, 32, 131-136, 143, 226 और 227 के तहत न्यायिक समीक्षा का प्रावधान है।
- विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया: भारतीय न्यायपालिका ‘विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया’ का पालन करती है, तथा केवल मूल आधारों (जैसे: विधायिका की क्षमता, मौलिक अधिकारों का उल्लंघन) पर ही समीक्षा की अनुमति देती है, न कि कानून की तर्कसंगतता या बुद्धिमत्ता के आधार पर।
- मूल संरचना सिद्धांत: केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (वर्ष 1973) मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि संसद संविधान के 'मूल संरचना' में परिवर्तन नहीं कर सकती है, जिससे संवैधानिक संशोधनों पर न्यायिक समीक्षा का दायरा बढ़ जाता है।
- न्यायिक सक्रियता पर अंकुश: यद्यपि भारतीय न्यायालयों ने ओल्गा टेलिस और विशाखा जैसे मामलों में सक्रिय भूमिका निभाई है, न्यायपालिका एक सर्वोच्च विधायिका के रूप में कार्य नहीं करती है। यह कानून बनाने से बचती है तथा व्याख्या एवं प्रवर्तन पर ध्यान केंद्रित करती है।
संयुक्त राज्य अमेरिका में न्यायिक समीक्षा के सिद्धांत और अभ्यास:
- उत्पत्ति और आधार: यद्यपि अमेरिकी संविधान में स्पष्ट रूप से प्रावधान नहीं किया गया है, लेकिन मुख्य न्यायाधीश जॉन मार्शल द्वारा मार्बरी बनाम मैडिसन (वर्ष 1803) मामले में न्यायिक समीक्षा को दृढ़ता से स्थापित किया गया था।
- विधि की उचित प्रक्रिया: अमेरिकी संविधान 5वें और 14वें संशोधन के माध्यम से, ‘विधि की उचित प्रक्रिया’ का प्रावधान करता है, जिससे न्यायालयों को कानूनों की मूल एवं प्रक्रियात्मक निष्पक्षता दोनों की जाँच करने का अधिकार मिलता है।
- न्यायिक सर्वोच्चता: अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय व्यवहार में 'सुपर लेजिस्लेटिव' के रूप में कार्य करता है। यह संघीय और राज्य कानूनों को रद्द कर सकता है और कानून (न्यायाधीश द्वारा बनाए गए कानून) के बल पर निर्णय भी कर सकता है।
- सशक्त न्यायिक समीक्षा: अमेरिका में न्यायिक समीक्षा प्रायः सशक्त और सक्रिय होती है, जो सामाजिक-आर्थिक एवं अल्पसंख्यक अधिकारों की रक्षा करती है। मिरांडा बनाम एरिज़ोना और यूनाइटेड स्टेट्स बनाम निक्सन जैसे मामले इस अभ्यास के उदाहरण हैं।
संवैधानिक दृष्टिकोण में अंतर: भारत बनाम अमेरिका
पहलू
संयुक्त राज्य अमेरिका
भारत
अस्तित्व
निहित (मारबरी बनाम मैडिसन)
प्रावधान (अनुच्छेद 13, 32, 226 आदि)
दायरा
व्यापक– प्रक्रियात्मक और मूल दोनों
सीमित– केवल मूल आधार
संशोधनों की समीक्षा
किसी भी कानून या संशोधन को रद्द कर सकते हैं
बुनियादी अवसंरचना का उल्लंघन करने तक सीमित
न्यायिक सर्वोच्चता
न्यायपालिका 'तृतीय सदन' के रूप में कार्य करती है
संसदीय संप्रभुता के साथ संतुलित
कानून बनाना
न्यायाधीश द्वारा बनाए गए कानून आम हैं
कानून बनाने का काम विधायिका पर छोड़ा गया
निष्कर्ष:
यद्यपि भारत और अमेरिका दोनों ही न्यायिक समीक्षा को संवैधानिक शासन की एक अनिवार्य विशेषता के रूप में मान्यता देते हैं, फिर भी इनके दर्शन और व्यवहार में काफी अंतर है। अमेरिका सख्त समीक्षा के साथ न्यायिक सर्वोच्चता के मॉडल का पालन करता है, जबकि भारत संवैधानिक सीमाओं के आधार पर एक संतुलित दृष्टिकोण का पालन करता है।
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