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प्रश्न :
प्रश्न. “साँची स्तूप भारत की समृद्ध बौद्ध विरासत और विकसित हो रही स्थापत्य शैली का प्रमाण है।” इसके ऐतिहासिक महत्त्व, कलात्मक विशेषताओं और इसके विकास में विभिन्न राजवंशों के योगदान पर चर्चा कीजिये। (250 शब्द)
24 Mar, 2025 सामान्य अध्ययन पेपर 1 संस्कृतिउत्तर :
हल करने का दृष्टिकोण:
- साँची स्तूप के संदर्भ में जानकारी के साथ उत्तर दीजिये।
- इसके ऐतिहासिक महत्त्व और कलात्मक विशेषताओं का उल्लेख कीजिये।
- इसके विकास में राजवंशों के योगदान पर प्रकाश डालिये।
- उचित निष्कर्ष दीजिये।
परिचय
तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में सम्राट अशोक द्वारा निर्मित साँची स्तूप, भारत की सबसे पुरानी शैल संरचनाओं में से एक है और बौद्ध दर्शन, स्थापत्य शैली के विकास एवं राजवंशीय संरक्षण का एक उल्लेखनीय प्रतीक है।
- 1989 में यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के रूप में अंकित, यह कई शताब्दियों से बौद्ध धर्म और भारतीय कला इतिहास की समन्वित विरासत को दर्शाता है।
मुख्य भाग:
ऐतिहासिक महत्त्व
- इसका निर्माण अशोक (तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व) द्वारा बौद्ध धर्म अपनाने के बाद बुद्ध के अवशेषों को रखने के लिये किया गया था।
- जिसकी देखरेख अशोक की रानी देवी और बेटी विदिशा द्वारा की गई, जो प्रारंभिक राजसी और स्थानीय व्यापारिक संरक्षण को दर्शाती है।
- यह स्तूप स्मारकीय वास्तुकला के माध्यम से बुद्ध की शिक्षाओं के प्रसार के प्रयास का प्रतिनिधित्व करता है।
- 12वीं शताब्दी ई. तक यह बौद्ध शिक्षा और कला का केंद्र था, हालाँकि बुद्ध कभी यहाँ नहीं आये।
- इसमें अशोक का शिलालेख है, जो बौद्ध संघ में एकता बनाए रखने के प्रयासों का प्रतीक है
- वर्ष 1818 में ब्रिटिश अधिकारी हेनरी टेलर द्वारा इसकी पुनः खोज़ की गई; 20वीं सदी के प्रारंभ में सर जॉन मार्शल द्वारा उत्खनन और पुनरुद्धार किया गया।
कलात्मक और स्थापत्य विशेषताएँ
- स्तूप के संरचनात्मक घटक
- अण्ड: अर्द्धगोलाकार गुंबद जो मेरु पर्वत का प्रतीक है, जिसमें बुद्ध के अवशेष रखे हैं।
- हर्मिका: गुंबद के ऊपर वर्गाकार जंगला जो देवताओं के निवास का प्रतीक है।
- छत्री: यस्ती (केंद्रीय स्तंभ) के ऊपर बनी त्रि-छत्रीय संरचना, जो बौद्ध धर्म के तीन रत्नों का प्रतिनिधित्व करती है।
- मेधी और प्रदक्षिणापथ: अनुष्ठानिक गतिविधियों को सुविधाजनक बनाने के लिये उठा हुआ प्रदक्षिणा पथ और गोलाकार वेदिका।
- प्राकार (जंगला): स्तूप को एक दीवार (प्राकार) से घेरा गया था। यह दीवार बाह्य संसार से स्तूप को पृथक् कर इसे एक पवित्र स्थल के रूप में सुरक्षित करती थी।
- तोरण (प्रवेश द्वार):
- इसे सातवाहनों के शासनकाल में पहली शताब्दी ई.पू. में जोड़ा गया।
- चार प्रवेशद्वार मुख्य दिशाओं में संरेखित हैं, जिन पर समृद्ध नक्काशी की गई है:
- जातक कथाएँ और बुद्ध के जीवन की घटनाएँ (जैसे: महाप्रयाण, ज्ञान प्राप्ति)।
- प्रकृति रूपांकनों और पौराणिक आकृतियाँ (हाथी, शेर, शालभंजिका यक्षी)।
- बोधि वृक्ष, पदचिह्नों और सिंहासन जैसे प्रतीकों के माध्यम से बुद्ध का अलौकिक प्रतिनिधित्व।
- दार्शनिक चरण:
- ऊपरी बीम: सात मानुषी बुद्ध
- मध्य: महान प्रस्थान
- निचला भाग: अशोक का बोधि वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्ति।
तकनीकी और कलात्मक योग्यता
- उच्च तकनीकी कुशलता और कथा वाचन की गहनता के साथ बलुआ पत्थर पर उत्कीर्णित उत्कृष्ट आख्यान उद्भृतियाँ।
- बाद में अमरावती और गांधार में बौद्ध कला प्रभावित हुई।
इसके विकास में राजवंशों का योगदान
राजवंश/काल
योगदान
मौर्य (अशोक)
स्तूप का मुख्यतः ईंट से प्रारंभिक निर्माण, मध्य भारत में बौद्ध उपस्थिति की स्थापना।
शुंग राजवंश (दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व)
शैल विस्तार, चपटे गुंबद का निर्माण, हर्मिका, छत्री और प्रदक्षिणा पथ का निर्माण। संभवतः पुष्यमित्र शुंग के पुत्र अग्निमित्र द्वारा पुनर्निर्माण।
सातवाहन राजवंश (प्रथम शताब्दी ई.पू.)
चार शैल तोरणों का निर्माण, परिपक्व मूर्तिकला और प्रतीकात्मक कथा कारिता का उदाहरण।
गुप्त काल (चौथी-छठी शताब्दी ई.)
शंखलिपि (शंख के आकार की ब्राह्मी लिपि) में शिलालेखों का संयोजन; इस स्थल की आध्यात्मिक महत्ता में वृद्धि हुई।
भोपाल की बेगमें (19वीं सदी)
स्थल संरक्षण के लिये संरक्षण; औपनिवेशिक प्रशासन के तहत संरक्षण के लिये वित्तपोषण।
निष्कर्ष:
साँची स्तूप केवल एक धार्मिक स्मारक नहीं है, बल्कि यह भारत के सभ्यतागत लोकाचार, राजवंशीय योगदान और स्थापत्य परिष्कार का जीवंत इतिहास है। मौर्यकालीन शुरुआत से लेकर सातवाहन मूर्तियों और औपनिवेशिक संरक्षण प्रयासों तक, साँची भारतीय सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परंपराओं की निरंतरता व लचीलेपन को दर्शाता है।
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