प्रश्न. "सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI) ने पारदर्शिता को बढ़ाया है, लेकिन इसके कार्यान्वयन में महत्त्वपूर्ण संस्थागत चुनौतियों का भी सामना करना पड़ा है।" RTI अधिनियम में हाल के संशोधनों के संदर्भ में इस कथन का विश्लेषण कीजिये। (250 शब्द)
उत्तर :
हल करने का दृष्टिकोण:
- सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम, 2005 के संदर्भ में जानकारी के साथ उत्तर दीजिये।
- RTI के माध्यम से पारदर्शिता बढ़ाने के समर्थन में प्रमुख तर्क दीजिये।
- RTI कार्यान्वयन को प्रभावित करने वाली प्रमुख संस्थागत चुनौतियों पर प्रकाश डालिये।
- RTI कार्यढाँचेको मजबूत करने के उपाय सुझाइये।
- उचित निष्कर्ष दीजिये।
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परिचय:
सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम, 2005 भारत के शासन में एक परिवर्तनकारी उपागम रहा है, जो निर्णय लेने में पारदर्शिता, जवाबदेही और नागरिक भागीदारी सुनिश्चित करता है।
- हालाँकि, इसकी सफलता के बावजूद, RTI के कार्यान्वयन को गंभीर संस्थागत चुनौतियों का सामना करना पड़ा है, विशेष रूप से हाल के विधायी संशोधनों और सूचना आयोगों की स्वायत्तता के कमज़ोर होने के कारण।
मुख्य भाग:
RTI के माध्यम से पारदर्शिता में वृद्धि:
- लोकतंत्र को सुदृढ़ बनाना और नागरिक सशक्तीकरण: RTI ने सरकारी नीतियों, वित्तीय आवंटन और चुनावी फंडिंग की सार्वजनिक जाँच को सक्षम किया है, जिससे भागीदारीपूर्ण शासन को बढ़ावा मिला है।
- भ्रष्टाचार से लड़ना: आदर्श हाउसिंग घोटाला और कोलगेट जैसे बड़े घोटालों को RTI का उपयोग करके उजागर किया गया, जिससे अनियमितताओं को उजागर करने में इसकी भूमिका का पता चला।
- कल्याणकारी योजनाओं में पारदर्शिता सुनिश्चित करना: RTI का उपयोग MGNREGA जैसी योजनाओं में धन के उपयोग पर नज़र रखने के लिये किया गया है, जिससे मज़दूरी भुगतान में धोखाधड़ी और फर्जी जॉब कार्डों का खुलासा हुआ है।
- मौलिक अधिकारों और सामाजिक न्याय को कायम रखना: इसने सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS), स्वास्थ्य सेवाओं और शिक्षा में भ्रष्टाचार को उजागर करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
- मीडिया और व्हिसल-ब्लोअर्स को सशक्त बनाना: RTI के माध्यम से खोज़ी पत्रकारिता और नागरिक सक्रियता को प्रबल किया गया है, जिससे मुक्त अभिव्यक्ति और जवाबदेही को बढ़ावा मिला है।
RTI कार्यान्वयन को प्रभावित करने वाली प्रमुख संस्थागत चुनौतियाँ:
- विधायी संशोधनों के माध्यम से स्वायत्तता में कमी
- RTI (संशोधन) अधिनियम, 2019 ने केंद्र सरकार को सूचना आयुक्तों के कार्यकाल और वेतन निर्धारित करने की शक्ति प्रदान की, जिससे उनकी स्वायत्तता कम हो गई।
- डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (DPDP) अधिनियम, 2023 ने RTI की धारा 8(1) में संशोधन किया, जिससे सार्वजनिक हित के मामलों में भी सभी व्यक्तिगत डेटा को प्रकटीकरण से छूट मिल गई।
- इससे सरकारी अधिकारियों, चुनावी बॉण्ड और सार्वजनिक खरीद के बारे में सूचना की सुलभता सीमित हो गई है, जिससे पारदर्शिता बाधित हुई है।
- सूचना आयोगों का कमज़ोर होना
- RTI अपीलों के लिये जिम्मेदार केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) और राज्य सूचना आयोग (SIC) गंभीर रिक्तियों, धन की कमी एवं राजनीतिक प्रभाव से ग्रस्त हैं।
- कई राज्य सूचना आयोग निष्क्रिय बने हुए हैं, जबकि CIC 11 स्वीकृत सदस्यों में से केवल 3 के साथ कार्यरत रहा है।
- प्रशासनिक प्रतिरोध और गैर-अनुपालन
- लोक सेवक प्रायः अपनी अक्षमताओं और भ्रष्टाचार के उजागर होने के डर से सूचना देने में विलंब करते हैं या उसे देने से मना कर देते हैं।
- सत्र 2023-24 में CIC के पास दायर की गई लगभग 42% RTI अपीलें बिना सुनवाई के वापस कर दी गईं, जो प्रणालीगत गैर-अनुपालन को दर्शाता है।
- RTI कार्यकर्त्ताओं और मुखबिरों को धमकियाँ
- RTI कार्यकर्त्ताओं को शारीरिक हमलों और कानूनी उत्पीड़न सहित गंभीर धमकियों का सामना करना पड़ता है, जिससे नागरिक सूचना मांगने से हतोत्साहित होते हैं।
- वर्ष 2006 से अब तक भूमि सौदों, खनन और कल्याणकारी योजनाओं में भ्रष्टाचार को उजागर करने वाले 99 RTI कार्यकर्त्ताओं की हत्या कर दी गई है और 180 पर हमला किया गया है।
- व्हिसल-ब्लोअर संरक्षण अधिनियम, 2014, जिसका उद्देश्य सुरक्षा प्रदान करना था, अब तक बड़े पैमाने पर क्रियान्वित नहीं किया गया है, जिससे कार्यकर्त्ता असुरक्षित हैं।
RTI कार्यढाँचे को सुदृढ़ करने के उपाय:
- सूचना आयोगों की स्वायत्तता बहाल करना
- सूचना आयुक्तों के लिये निश्चित कार्यकाल और स्वतंत्र वेतन संरचना बहाल करने के लिये RTI (संशोधन) अधिनियम, 2019 में संशोधन किया जाना चाहिये।
- लंबित मामलों को निपटाने के लिये केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर सूचना आयुक्तों की समय पर नियुक्ति सुनिश्चित की जानी चाहिये।
- छूट और अतिव्यापी कानूनों को लागू करना
- सरकारी गोपनीयता अधिनियम, 1923 में संशोधन कर इसे RTI सिद्धांतों के अनुरूप बनाया जाजाना चाहिये, जिससे गैर-संवेदनशील मामलों में पारदर्शिता सुनिश्चित होगी।
- RTI अधिनियम की दूसरी अनुसूची की समय-समय पर समीक्षा की जानी चाहिये तथा यह भी आकलन किया जाना चाहिये कि कौन-सी छूट प्राप्त एजेंसियाँ गैर-संवेदनशील डेटा का खुलासा कर सकती हैं।
- RTI कार्यकर्त्ताओं और मुखबिरों की सुरक्षा
- गुमनाम शिकायतों और आपातकालीन सुरक्षा तंत्र के प्रावधानों के साथ व्हिसलब्लोअर संरक्षण अधिनियम, 2014 को पूरी तरह से लागू किया जाना चाहिये।
- RTI कार्यकर्त्ताओं पर हमलों से संबंधित मामलों की त्वरित अदालती सुनवाई से सख्त रोकथाम संभव होगी।
- सार्वजनिक जागरूकता और डिजिटल अभिगम को बढ़ावा
- डिजिटल प्लेटफॉर्म, सामुदायिक रेडियो और स्थानीय शासन निकायों का उपयोग करके देशव्यापी RTI जागरूकता अभियान चलाए जाने चाहिये।
- नागरिकों को बेहतर RTI आवेदन तैयार करने और प्रतिक्रियाओं को ट्रैक करने में मदद करने के लिये AI-संचालित सहायता के साथ e-RTI पोर्टलों को सुदृढ़ किया जाना चाहिये।
निष्कर्ष:
सूचना का अधिकार अधिनियम भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला बना हुआ है, जो नागरिकों को सरकार के प्रति जवाबदेह बनाए रखने के लिये सशक्त बनाता है। RTI पारदर्शिता और सुशासन के लिये एक शक्तिशाली साधन बना रहे, इसके लिये सुदृढ़ विनियामक तंत्र, सक्रिय प्रकटीकरण और मुखबिरों की बेहतर सुरक्षा महत्त्वपूर्ण है।