प्रश्न. "पारंपरिक कला रूपों के व्यावसायीकरण ने भारत की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित और विकृत दोनों किया है।" चर्चा कीजिये। (150 शब्द)
उत्तर :
हल करने का दृष्टिकोण:
- भारत के पारंपरिक कला रूपों के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए उत्तर दीजिये।
- पारंपरिक कला रूपों के संरक्षण में व्यावसायीकरण के योगदान को बताइये।
- भारत की सांस्कृतिक विरासत पर व्यावसायीकरण के नकारात्मक प्रभावों पर गहन अध्ययन प्रस्तुत कीजिये।
- “संतुलन बनाना: विरूपण के बिना संरक्षण” पर प्रकाश डालिये।
- उचित निष्कर्ष दीजिये।
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परिचय:
भारत के पारंपरिक कला रूप, जैसे मधुबनी चित्रकारी, कथक, पट्टचित्र और चिकनकारी कढ़ाई, सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत, क्षेत्रीय पहचान एवं आध्यात्मिक महत्त्व को दर्शाते हैं।
- हाल के दशकों में, व्यावसायीकरण ने उनकी दृश्यता और आर्थिक व्यवहार्यता को बढ़ा दिया है, फिर भी इसने सांस्कृतिक मंदन, प्रामाणिकता की हानि तथा शोषण जैसी चुनौतियों को भी जन्म दिया है।
मुख्य भाग:
पारंपरिक कला रूपों के संरक्षण में व्यावसायीकरण का योगदान
- कारीगरों का आर्थिक सशक्तीकरण: व्यावसायीकरण ने कारीगरों को निरंतर आजीविका प्रदान की है, जिससे आधुनिक अर्थव्यवस्था में पारंपरिक शिल्प आर्थिक रूप से व्यवहार्य बन गए हैं।
- उदाहरण: बनारसी रेशम और पश्मीना शॉल जैसे हथकरघा क्षेत्रों ने वैश्विक बाज़ार हासिल कर लिया है, जिससे हज़ारों कारीगरों को आर्थिक जीविका सुनिश्चित हुई है।
- लुप्त होती कलाओं का पुनरुद्धार: विलुप्त होने के कगार पर पहुँची कई कलाओं को बाज़ार की मांग और लक्षित सरकारी सहायता के कारण पुनर्जीवित किया गया है।
- उदाहरण: महाराष्ट्र की वारली कला का प्रयोग फैशन, गृह सज्जा और वैश्विक प्रदर्शनियों में किया जाता है।
- वैश्विक मान्यता और सांस्कृतिक आदान-प्रदान: वैश्वीकरण ने भारतीय कला रूपों को अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त करने का अवसर दिया है, तथा अंतर-सांस्कृतिक प्रशंसा और सहयोग को बढ़ावा दिया है।
- उदाहरण: काँचीपुरम साड़ियों, जयपुर की ब्लू पॉटरी की GI टैगिंग उनकी विशिष्टता और प्रामाणिकता के संरक्षण को सुनिश्चित करती है।
- आधुनिक डिज़ाइन और उपयोगिता के साथ एकीकरण: आधुनिक रुचियों को अपनाकर और उपयोगिता को शामिल करके, पारंपरिक कला रूपों ने समकालीन जीवन शैली में प्रासंगिकता पाई है।
- उदाहरण: पारंपरिक गोंड कला अब भित्ति चित्र कला, स्टेशनरी और वस्त्रों में देखी जा रही है, जो इसे शहरी उपभोक्ताओं से जोड़ती है।
- सरकारी और निजी क्षेत्र का समर्थन: "एक ज़िला, एक उत्पाद" (ODOP) पहल जैसी योजनाएँ और ट्राइब्स इंडिया जैसे मंच कारीगरों के अधिकारों और लाभों को सुनिश्चित करते हुए वैश्विक स्तर पर पारंपरिक कलाओं को बढ़ावा देते हैं।
भारत की सांस्कृतिक विरासत पर व्यावसायीकरण के नकारात्मक प्रभाव
- प्रामाणिकता और पारंपरिक तकनीकों की हानि: उपभोक्ता की प्राथमिकताओं और बड़े पैमाने पर उत्पादन की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये, पारंपरिक तरीकों, प्रतीकों एवं रूपांकनों को प्रायः बदल दिया जाता है या प्रतिस्थापित कर दिया जाता है।
- उदाहरण: हथकरघा बुनाई में प्राकृतिक रंगों का स्थान सिंथेटिक रंगों ने ले लिया है, जिससे पर्यावरणीय संवहनीयता और सांस्कृतिक प्रामाणिकता से समझौता हो रहा है।
- समरूपीकरण और मानकीकरण: कारीगरों को बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिये एक समान डिज़ाइन बनाने के लिये मजबूर किया जाता है, जो हस्तनिर्मित वस्तुओं की विशिष्टता और विविधता को कमज़ोर करता है।
- उदाहरण: पारंपरिक कथाओं से रहित मानकीकृत मधुबनी डिज़ाइन अब हैंडबैग पर बड़े पैमाने पर मुद्रित किये जाते हैं, जिससे उनका सांस्कृतिक सार मंद पड़ता जा रहा है।
- सांस्कृतिक वस्तुकरण: पारंपरिक कला रूप, जो आध्यात्मिकता, अनुष्ठानों और सामाजिक पहचान में गहन रूप से निहित थे, अब बिक्री के लिये वस्तुओं के रूप में वस्तुकृत हो गए हैं, जिससे उनका अंतर्निहित सांस्कृतिक मूल्य समाप्त सा हो गया है।
- उदाहरण: भरतनाट्यम जैसे नृत्य रूप, जो पवित्र मंदिर प्रदर्शन थे, अब पर्यटकों के लिये लघु मंच शो के रूप में व्यावसायीकृत हो गए हैं।
- कारीगरों का शोषण और हाशिए पर जाना: बिचौलिये प्रायः मुनाफे का एक बड़ा हिस्सा हड़प लेते हैं, जिससे कारीगरों को बहुत कम मुनाफा मिलता है। इससे युवा पीढ़ी पारंपरिक शिल्प को अपनाने से हतोत्साहित होती है।
- उदाहरण: बनारसी साड़ियों का बाज़ार मूल्य अधिक होने के बावजूद वाराणसी के हथकरघा बुनकरों को उचित मजदूरी पाने के लिये संघर्ष करना पड़ता है।
- नकल के माध्यम से सांस्कृतिक क्षरण: विशेष रूप से चीन जैसे देशों से पारंपरिक शिल्प की सस्ती नकल और मशीन-निर्मित प्रतिकृतियों का उदय, प्रामाणिक भारतीय कला के मूल्य और पहचान को कमज़ोर करता है।
- उदाहरण: मशीन से बने कश्मीरी शॉल प्रायः बाज़ार में हाथ से बुने हुए शॉल को पछाड़ देते हैं, जिससे वास्तविक कारीगरों का अस्तित्व खतरे में पड़ जाता है।
- क्षेत्रीय विविधताओं की उपेक्षा: विपणन योग्य कला रूपों पर ध्यान केंद्रित करने से कम ज्ञात लेकिन समान रूप से महत्त्वपूर्ण क्षेत्रीय शिल्पों की उपेक्षा होती है।
- उदाहरण: ओडिशा की सौरा चित्रकला जैसी जनजातीय कलाओं को मधुबनी जैसे मुख्यधारा के शिल्पों की तुलना में बहुत कम ध्यान मिलता है।
संतुलन बनाना: विरूपण के बिना संरक्षण
- कारीगरों के सशक्तीकरण को मज़बूत करना: सीधे उपभोक्ता तक पहुँचने वाले प्लेटफॉर्म और ई-कॉमर्स मार्केटप्लेस को बढ़ावा दिये जाने की आवश्यकता है, जिससे बिचौलियों को नियंत्रित किया जा सके और कारीगरों को उचित मुआवज़ा मिलना सुनिश्चित हो सके।
- उदाहरण: क्राफ्ट्सविला और गाथा जैसे प्लेटफॉर्मों ने कारीगरों को वैश्विक बाज़ारों से सफलतापूर्वक जोड़ा है।
- नैतिक व्यावसायीकरण को बढ़ावा देना: गैर सरकारी संगठनों, सहकारी समितियों और नैतिक ब्रांडों के साथ सहयोग किये जाने की आवश्यकता है जो पारंपरिक तकनीकों एवं निष्पक्ष व्यापार प्रथाओं को प्राथमिकता देते हैं।
- उदाहरण: फैबइंडिया ग्रामीण कारीगरों के साथ सीधे तौर पर काम करता है ताकि उनके उत्पादों को बाज़ार योग्य बनाते हुए पारंपरिक तरीकों को संरक्षित किया जा सके।
- नीतिगत हस्तक्षेप: सरकार को राष्ट्रीय हथकरघा विकास कार्यक्रम (NHDP) और अंबेडकर हस्तशिल्प विकास योजना (AHVY) जैसी योजनाओं के तहत वित्तीय सहायता, रियायती कच्चा माल एवं विपणन सहायता प्रदान करनी चाहिये।
- प्रामाणिकता की रक्षा और नकली उत्पादों को रोकने के लिये GI टैगिंग का उचित प्रवर्तन सुनिश्चित किया जाना चाहिये।
- सांस्कृतिक प्रशंसा के लिये जागरूकता अभियान: उपभोक्ताओं को पारंपरिक शिल्प के सांस्कृतिक महत्त्व और बड़े पैमाने पर उत्पादन की तुलना में प्रामाणिकता को महत्त्व देने की आवश्यकता के बारे में शिक्षित किया जाना चाहिये।
- युवाओं की भागीदारी को प्रोत्साहित करना: कौशल विकास कार्यक्रमों को पारंपरिक तकनीकों की निरंतरता सुनिश्चित करने के लिये युवा कारीगरों को लक्ष्य बनाना चाहिये।
- व्यावसायिक प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से पारंपरिक कलाओं को स्कूल पाठ्यक्रमों और उच्च शिक्षा में एकीकृत किया जाना चाहिये।
- सांस्कृतिक पर्यटन: पारंपरिक कला रूपों को उनके मूल सांस्कृतिक संदर्भ में प्रदर्शित करने के लिये विरासत गाँवों और शिल्प मेलों जैसी पर्यटन पहलों को बढ़ावा दिया जाना चाहिये।
- उदाहरण के लिये, हरियाणा में सूरजकुंड मेला कारीगरों को खरीदारों के साथ सीधे सौदाकारी करने के लिये एक मंच प्रदान करता है, जिससे सांस्कृतिक आदान-प्रदान और आर्थिक लाभ सुनिश्चित होता है।
निष्कर्ष
भारत में पारंपरिक कला रूपों का व्यावसायीकरण दोधारी तलवार की तरह रहा है। यह सुनिश्चित करने के लिये कि भारत की सांस्कृतिक विरासत जीवंत और प्रामाणिक बनी रहे, एक संतुलित दृष्टिकोण आवश्यक है– जो नैतिक व्यावसायीकरण, मज़बूत सरकारी नीतियों, उपभोक्ता जागरूकता और कारीगरों की सक्रिय भागीदारी को एकीकृत करता है। ऐसे उपायों के साथ, व्यावसायीकरण विकृति के कारण के बजाय स्थायी संरक्षण के लिये एक साधन के रूप में कार्य कर सकता है।