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महत्त्वपूर्ण संस्थान/संगठन

विविध

आर्कटिक परिषद

  • 22 Oct 2019
  • 17 min read

आर्कटिक परिषद आर्कटिक क्षेत्र में सामान्य आर्कटिक मुद्दों, विशेषकर आर्कटिक क्षेत्र में सतत विकास और पर्यावरणीय सुरक्षा के प्रति आर्कटिक देशों, आर्कटिक के देशज समुदायों और अन्य आर्कटिक निवासियों के बीच सहयोग, समन्वय और अनुक्रिया बढ़ाने के लिये एक प्रमुख अंतर-सरकारी फोरम है।

आर्कटिक परिषद जैवविविधता में परिवर्तन, समुद्री बर्फ का पिघलना, प्लास्टिक प्रदूषण और ब्लैक कार्बन जैसे मुद्दों निपटने के लिये एक सर्वसम्मति आधारित निकाय के रूप में कार्य करती है।

आर्कटिक परिषद का इतिहास

  • आर्कटिक परिषद की रचना का मूल आर्कटिक एनवायरनमेंटल प्रोटेक्शन स्ट्रेटजी (AEPS) अर्थात् आर्कटिक पर्यावरणीय संरक्षण रणनीति 1991 की स्थापना में आर्कटिक देशों के बीच पर्यावरण संरक्षण पहलों पर अंतर-सरकारी सहयोग के लिये एक ढाँचे के रूप में पाया जाता है, जिसमें कनाडा, डेनमार्क, फिनलैंड, आइसलैंड, नार्वे, स्वीडन, रूस और अमेरिका शामिल हैं।
  • AEPS ने आर्कटिक के देशज लोगों को उनके पुश्तैनी होमलैंड पर उनके अधिकार को मान्यता देते हुए उनके साथ परामर्श करने और उन्हें आकर्षित करने की कोशिश की।
    • तीन देशज लोगों के संगठन (IPOs) जो क्रमशः इनुइट (इनुइट सरकमपोलर काउंसिल-ICC), सामी (सामी काउंसिल- SC) और रशियन इंडिजेनस पीपल्स (रशियन एसोशिएशन ऑफ इंडिजेनस पीपल्स ऑफ द नॉर्थ-RAIPON) का प्रतिनिधित्व करते हैं, को पर्यवेक्षक के तौर पर (AEPS) में शामिल किया गया।
    • आर्कटिक क्षेत्र में देशज लोगों के विशिष्ट संबंध की मान्यता में वृद्धि के परिणामस्वरूप, आर्कटिक देशों ने तीन देशज लोगों के संगठन को स्थायी भागीदारों का विशेष स्तर प्रदान किया, इस प्रकार अन्य AEPS पर्यवेक्षकों की तुलना में इन्हें विशेषाधिकार स्तर प्रदान किया।

आर्कटिक परिषद की संरचना

आर्कटिक परिषद आर्कटिक देशों साथ ही साथ आर्कटिक के देशज समुदायों और अन्य आर्कटिक निवासियों के बीच सहयोग, समन्वय और अनुक्रिया बढ़ाने के लिये एक उच्चस्तरीय अंतर-सरकारी निकाय है जिसकी स्थापना 1996 में ओटावा घोषणा से हुई।

  • इस परिषद में सदस्य राज्य के रूप में आठ परिध्रुवीय देश शामिल हैं और इसे आर्कटिक पर्यावरण की रक्षा करने और देशज लोगों जिनके संगठन परिषद में स्थायी भागीदार हैं, की अर्थव्यवस्था तथा सामाजिक और सांस्कृतिक कल्याण को प्रोन्नत करने का अधिदेश प्राप्त है।
  • आर्कटिक परिषद सचिवालय: स्टैंडिंग आर्कटिक काउंसिल औपचारिक रूप से 2013 में ट्रोम्सो, नॉर्वे में परिचालित हुई।
    • इसकी स्थापना आर्कटिक परिषद को प्रशासकीय क्षमता, संस्थानिक अनुस्मरण, संचार में वृद्धि और इस परिषद की गतिविधियों को सामान्य सहायता प्रदान करने के लिये की गई थी।
    • परिषद में सदस्य, तदर्थ पर्यवेक्षक देश और ‘स्थायी भागीदार’ शामिल हैं।
  • आर्कटिक परिषद के सदस्य: ओटावा घोषणा में कनाडा, डेन्मार्क, फिनलैंड, आइसलैंड, नॉर्वे, रूसी संघ, स्वीडन तथा अमेरिका आर्कटिक के सदस्य देश हैं।
    • स्थायी भागीदार: 1998 में स्थायी भागीदारों की संख्या दुगुनी होकर वर्तमान में छह हो गई क्योंकि अल्यूट इंटरनेशनल एसोशिएशन (AIA), और उसके पश्चात वर्ष 2000 में आर्कटिक अथबास्कान कौंसिल (AAC) और ग्विच्स’इन कौंसिल इंटरनेशनल (GGI) को स्थायी सदस्य नियुक्त किया गया।
    • पर्यवेक्षक स्तर: यह उन गैर-आर्कटिक देशों के साथ-साथ अंतर-सरकारी, अंतर-संसदीय, वैश्विक, क्षेत्रीय और गैर क्षेत्रीय संगठनों के लिये खुला है, जिन्हें परिषद चुनती है कि ये इसके कार्यों में योगदान कर सकते हैं। इनकी स्वीकृति परिषद द्वारा मंत्रिस्तरीय बैठक में दी जाती है जो प्रत्येक दो वर्षों में होती है।
  • आर्कटिक परिषद के पर्यवेक्षक मुख्य रूप से परिषद में कार्यकारी समूह के स्तर पर अपना योगदान देते हैं। उन्हें परिषद में कोई मताधिकार नहीं है।

मई, 2019 तक इन 13 गैर-आर्कटिक देशों को पर्यवेक्षक स्तर प्राप्त था- जर्मनी 1998, नीदरलैंड्स 1998, पोलैंड 1998, इंग्लैंड 1998, फ्राँस 2000, स्पेन 2006, चीन 2013, भारत 2013, इटली 2013, जापान 2013, दक्षिण कोरिया 2013, सिंगापुर 2013 तथा स्विट्जरलैंड 2017 में बतौर पर्यवेक्षक देश शामिल हुए।

पर्यवेक्षकों के प्रवेश हेतु मानदंड

किसी आवेदक की पर्यवेक्षक स्तर हेतु परिषद द्वारा उपयुक्तता निर्धारण में परिषद अन्य बातों के अलावा इस बात को ध्यान में रखेगी कि किस सीमा तक पर्यवेक्षक:

  • ओटावा घोषणा में परिभाषित आर्कटिक परिषद के उद्देश्यों को स्वीकार और समर्थन देता है।
  • आर्कटिक क्षेत्र में आर्कटिक राज्य की प्रभुसत्ता, सार्वभौम अधिकारों और क्षेत्राधिकार को मान्यता देता है।
    • भारत ने इसीलिये आर्कटिक देशों के भूभागीय क्षेत्राधिकार और सार्वभौम अधिकारों को आधिकारिक रूप से मान्यता प्रदान की है।
  • इस बात को मान्यता देता है कि आर्कटिक महासागर पर एक व्यापक वैधानिक संरचना लागू होती है जिसमें प्रमुख रूप से शामिल है समुद्र का कानून (UNCLOS), और यह संरचना इस महासागर के उत्तरदायी प्रबंधन के लिये ठोस आधार प्रदान करती है।
    • भारत ने भी आर्कटिक के प्रशासन के साधन के रूप में समुद्र के कानून को स्वीकार किया है यह ध्वनित करते हुए कि महाद्वीपीय पट्टी और समुद्री रास्ते और समुद्री संसाधनों दोनों पर क्षेत्राधिकार प्रमुख रूप से इन आठ आर्कटिक देशों का रहेगा।
  • आर्कटिक के देशज लोगों और अन्य आर्कटिक निवासियों के मूल्यों, हितों, संस्कृति और परंपरा का सम्मान करें।
  • स्थायी भागीदारों और अन्य आर्कटिक देशज लोगों के कार्यों में योगदान करने की राजनीतिक इच्छा साथ ही साथ वित्तीय सामर्थ्य का प्रदर्शन किया हो।
  • आर्कटिक परिषद के कार्यों से संबन्धित विशेषज्ञता और आर्कटिक में रुचि प्रदर्शित की हो।
  • आर्कटिक परिषद में ठोस रुचि और परिषद के कार्यों को समर्थन प्रदर्शित किया हो, जिसमें सदस्य देशों और स्थायी सहभागियों के साथ सहभागिता से आर्कटिक की चिंताओं को वैश्विक नीति निर्माण निकायों के सम्मुख रखना भी शामिल है।

परिषद की क्रियाविधि

परिषद का कार्य मुख्य रूप से छह कार्यकारी समूहों में किया जाता है:

  1. आर्कटिक संदूषक कार्रवाई कार्यक्रम (ACAP): उत्सर्जनों और अन्य प्रदूषकों के निर्मोचन को घटाने में राष्ट्रीय कार्यों को प्रोत्साहित करने हेतु यह एक दृढ़कारी और सहायक व्यवस्था के रूप में कार्य करता है।
  2. आर्कटिक निगरानी और आकलन कार्यक्रम (AMAP): यह आर्कटिक पर्यावरण, पारिस्थितिकी तंत्र और मानव जनसंख्या की निगरानी करता है और सरकारों को प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन के विपरीत प्रभावों से निपटने में सहायता देने के लिये वैज्ञानिक सलाह देता है।
  3. आर्कटिक वनस्पति और जीव-जंतु संरक्षण कार्यकारी समूह (CAFF): .आर्कटिक जैव संसाधनों की संवहनीयता सुनिश्चित कर यह आर्कटिक जैव विविधता संरक्षण के लिये कार्य करता है।
  4. आपातकाल निरोध, तैयारी और प्रतिक्रिया कार्यकारी समूह (EPPR): यह दुर्घटनावश अवमुक्त प्रदूषकों या रेडियोन्यूक्लाइड्स के असर या खतरे से आर्कटिक पर्यावरण को बचाने के लिये कार्य करता है।
  5. आर्कटिक समुद्री पर्यावरण रक्षा (PAME) कार्यकारी समूह: यह आर्कटिक परिषद की गतिविधियों का केंद्र बिन्दु है जो आर्कटिक समुद्री पर्यावरण की रक्षा और उसके संवहनीय प्रयोग से संबंधित है।
  6. सतत विकास कार्यकारी समूह (SDWG): यह आर्कटिक क्षेत्र में संवहनीय विकास और समग्र रूप से आर्कटिक समुदायों की दशा में सुधार के लिये कार्य करता है।

परिषद की कार्यप्रणाली

  • आर्कटिक परिषद के आकलन और सिफारिशें कार्यकारी समूहों द्वारा किये गए विश्लेषणों और प्रयासों का परिणाम हैं।
  • आर्कटिक परिषद के निर्णय आठ आर्कटिक देशों के बीच साथ ही साथ स्थायी भागीदारों से पूर्ण परामर्श और सहभागिता से सर्वसम्मति से किये जाते हैं।
  • आर्कटिक परिषद का अध्यक्ष पद आर्कटिक देशों के बीच प्रत्येक दो वर्ष में स्थानांतरित होता रहता है।
  • आर्कटिक परिषद का अध्यक्ष पद संभालने वाला प्रथम देश कनाडा (1996-1998) था।
  • फ़िलहाल अध्यक्ष पद सँभालने वाला देश आइसलैंड (2019-2021) है।

आर्कटिक परिषद की उपलब्धियाँ

  • आर्कटिक परिषद अपने कार्यकारी समूहों द्वारा नियमित रूप से व्यापक, अग्रणी पर्यावरणीय, पारिस्थितिकीय और सामाजिक आकलन प्रस्तुत करता है।
  • परिषद ने आठ आर्कटिक देशों के बीच कानूनी रूप से बाध्यकारी तीन महत्त्वपूर्ण समझौतों पर वार्ता के लिये फोरम प्रदान किया है:
  1. आर्कटिक में वैमानिक और समुद्री खोज एवं बचाव पर सहयोग समझौता, वर्ष 2011 की मंत्रिस्तरीय बैठक में न्यूक, ग्रीनलैंड में इस पर हस्ताक्षर हुए।
  2. आर्कटिक में समुद्री तेल प्रदूषण तैयारी और प्रतिक्रिया पर सहयोग समझौता, जिस पर किरुना, स्वीडन में वर्ष 2013 में मंत्रिस्तरीय बैठक में हस्ताक्षर हुए।
  3. अंतर्राष्ट्रीय आर्कटिक वैज्ञानिक सहयोग बढ़ाने पर समझौता, अलास्का के फेयरबैंक्स में वर्ष 2017 की मंत्रिस्तरीय बैठक में हस्ताक्षर हुए।

भारत और आर्कटिक

  • भारत ने आर्कटिक महासागर के लिये अपना प्रथम वैज्ञानिक अभियान वर्ष 2007 में शुरू किया और अंतर्राष्ट्रीय आर्कटिक अनुसंधान आधार नी-अलेसुंड, स्वालबार्ड, नार्वे में जुलाई 2008 में अपना एक अनुसंधान बेस ‘हिमाद्रि’ हिमनद विज्ञान, वायुमंडलीय विज्ञान और जैविक विज्ञान विषयों में अध्ययन कार्य के लिये खोला।
  • आर्कटिक क्षेत्र में भारतीय अनुसंधान के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं:
    • आर्कटिक ग्लेशियरों और आर्कटिक महासागर के तलछट और मूल रिकार्डों का विश्लेषण कर आर्कटिक जलवायु और भारतीय मानसून के बीच परिकल्पित टेली-कनेक्शन का अध्ययन करना।
    • सैटेलाइट डेटा का प्रयोग कर उत्तरी ध्रुवीय क्षेत्र में वैश्विक तापमान के प्रभाव का अनुमान लगाने के लिये आर्कटिक में समुद्री बर्फ के लक्षण प्रस्तुत करना।
    • समुद्री स्तर में परिवर्तन पर ग्लेशियरों के प्रभाव पर ध्यान केन्द्रित करते हुए आर्कटिक ग्लेशियरों की गतिकी और द्रव्यमान संतुलन पर अनुसंधान करना।
    • आर्कटिक की वनस्पति और जीव-जंतुओं और मानव केन्द्रित गतिविधियों पर उनकी प्रतिक्रिया का एक व्यापक आकलन करना। इसके अतिरिक्त, दोनों ध्रुवीय क्षेत्रों में जीवन के रूपों का तुलनात्मक अध्ययन करना प्रस्तावित है।
    • आर्कटिक की बर्फ के पिघलने से उत्पन्न वैश्विक तापमान के कारण अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के लिये पैदा हो रहे नए अवसर और चुनौतियों के आलोक में भारत आर्कटिक क्षेत्र की गतिविधियों पर बारीकी से ध्यान दे रहा है।
    • भारत के आर्कटिक क्षेत्र में वैज्ञानिक, पर्यावरणीय, व्यावसायिक साथ ही साथ रणनीतिक हित भी हैं।
    • जुलाई 2018 में पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ने ‘राष्ट्रीय अंटार्कटिक और समुद्र अनुसंधान केंद्र’ का नाम बदल कर ‘राष्ट्रीय ध्रुवीय और महासागर अनुसंधान केंद्र’ कर दिया।
      • यह एक नोडल संगठन है जो ध्रुवों पर केन्द्रों की अनुसंधान गतिविधियों में समन्वय करता है।
  • भारत ने नार्वे के नार्वेयाई ध्रुवीय अनुसंधान संस्थान के साथ विज्ञान में सहयोग के लिये एक सहमति पत्र पर हस्ताक्षर किये हैं और साथ ही नी-अलेसुंद में किंग्स बे (नार्वे सरकार के स्वामित्व की एक कंपनी) के साथ संभरण और अवसंरचना सुविधाओं के लिये भी हस्ताक्षर किये हैं, ताकि आर्कटिक अनुसंधान का कार्य किया जा सके और आर्कटिक क्षेत्र में भारतीय अनुसंधान आधार केंद्र की देखरेख की जा सके।
  • 2019 में भारत को परिषद में पुनः पर्यवेक्षक चुना गया है।
  • भारत की कोई आधिकारिक आर्कटिक नीति नहीं है और इसके आर्कटिक अनुसंधान का उद्देश्य पारिस्थितिकीय और पर्यावरणीय पहलुओं पर केन्द्रित है जिसमें अब तक जलवायु परिवर्तन पर ध्यान केन्द्रित किया गया है।

व्यावसायिक और रणनीतिक हित

  • आर्कटिक क्षेत्र खनिजों और तेल तथा गैस के मामले में काफी समृद्ध है। वैश्विक तापमान के कारण आर्कटिक के पिघलने से नए जहाजरानी मार्गों के खुलने की संभावना है जो कि वर्तमान दूरी को कम कर देगा।
  • क्षेत्र में मौजूद प्राकृतिक संसाधनों के व्यावसायिक दोहन में दावा करने की उम्मीद से देशों की आर्कटिक होप परियोजना में गतिविधियाँ जारी हैं।
  • आर्कटिक परिषद आर्कटिक में संसाधनों के व्यावसायिक दोहन का निषेध नहीं करती। यह केवल यह सुनिश्चित करती है कि यह कार्य संवहनीय तरीके स्थानीय लोगों के हितों को कोई नुकसान पहुंचाए बिना स्थानीय पर्यावरण से सामंजस्य के साथ किया जाए।
  • इसलिये, आर्कटिक क्षेत्र में प्रासंगिक बने रहने के लिये भारत को आर्कटिक परिषद में अर्जित पर्यवेक्षक स्तर का लाभ उठाना चाहिये और आर्कटिक में और अधिक निवेश पर विचार करना चाहिये।
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