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एथिक्स

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विदेशी सहायता का जटिल नैतिक परिदृश्य

  • 25 Mar 2025
  • 13 min read

विदेशी सहायता लंबे समय से वैश्विक कूटनीति की आधारशिला रही है जिसे कमज़ोर समुदायों के उत्थान एवं अंतर्राष्ट्रीय एकजुटता को बढ़ावा देने के क्रम में नैतिक दायित्व के रूप में तैयार किया गया है। विदेश नीति के एक उपकरण के रूप में इसकी भूमिका ने गहन नैतिक विमर्श को जन्म दिया है। USAID को भंग करने की मांग, भारत में चुनाव में हेराफेरी के आरोप या युद्धकालीन सहायता के लिये प्रमुख खनिज पहुँच से संबंधित यूएस-यूक्रेन वार्ता जैसे हालिया विवाद मानवतावाद तथा रणनीतिक स्वार्थ के बीच अस्पष्ट सीमा पर प्रकाश डालते हैं।

ये उदाहरण विदेशी सहायता के जटिल नैतिक परिदृश्य को रेखांकित करते हैं, जहाँ सहायता को राजनीतिक लाभ या आर्थिक प्रभुत्व के साधन के रूप में देखा जा सकता है।

वैश्विक कूटनीति में विदेशी सहायता की क्या भूमिका है?

  • सामरिक गठबंधन: विदेशी सहायता का उपयोग अक्सर राजनयिक संबंध बनाने या उन्हें मज़बूत करने के लिये किया जाता है। आर्थिक या सैन्य सहायता प्रदान करके दाता देश अपने हित में गठबंधन सुरक्षित कर सकते हैं या प्राप्तकर्त्ता देशों के साथ राजनीतिक गठबंधन को प्रोत्साहित कर सकते हैं, जिससे उनका भू-राजनीतिक प्रभाव बढ़ सकता है। उदाहरण के लिये, यूक्रेन को अमेरिका की सहायता।
  • स्थिरता एवं सुरक्षा को बढ़ावा: विदेशी सहायता से निर्धनता को समाप्त करने के साथ बुनियादी ढाँचे की ज़रूरतों को पूरा करके नाजुक या संघर्ष-ग्रस्त क्षेत्रों को स्थिर करने में मदद मिल सकती है। इससे अशांति या उग्रवाद का जोखिम कम हो जाता है जो दाता देश के सुरक्षा हितों के अनुरूप हो सकता है। उदाहरण के लिये भारत द्वारा अफगानिस्तान को सहायता। 
  • शर्तें और नीतिगत प्रभाव: दाता देश बाज़ार पहुँच के साथ व्यापार समझौते सुरक्षित करने या प्राप्तकर्त्ता देशों में अपने व्यवसाय को बढ़ावा देने के लिये सहायता का उपयोग कर सकते हैं। उदाहरण के लिये अमेरिका और यूक्रेन के बीच खनिज समझौता।
  • सॉफ्ट पाॅवर प्रोजेक्शन: आपदाओं या संकटों के दौरान सहायता प्रदान करना किसी देश की करुणा और नेतृत्व को दर्शाता है, जिससे उसकी वैश्विक प्रतिष्ठा को बढ़ावा मिलता है। यह सॉफ्ट पाॅवर, वैश्विक मंच पर कूटनीतिक सद्भावना तथा नैतिक अधिकार में परिवर्तित हो सकती है। उदाहरण के लिये भारत ने हरिकेन राफेल के विनाशकारी प्रभाव के बाद क्यूबा को मानवीय सहायता प्रदान की।

विदेशी सहायता से संबंधित नैतिक चिंताएँ क्या हैं?

  • राजनीतिक मैनीपुलेशन के साथ संप्रभुता का क्षरण: विदेशी सहायता से कभी कभी देशों की राजनीतिक संप्रभुता कमज़ोर हो सकती है। इसमें ऐसी सहायता शामिल हो सकती है जिससे सत्तावादी शासन को समर्थन मिलने के साथ घरेलू राजनीति में हस्तक्षेप होता हो, जैसे कि विभिन्न देशों में चुनावों में हस्तक्षेप करने के क्रम में विभिन्न गैर सरकारी संगठनों के खिलाफ आरोप। ये प्रथाएँ राष्ट्रों को ऐसी नीतियाँ अपनाने के लिये मज़बूर कर सकती हैं जो उनकी प्राथमिकताओं के अनुरूप नहीं होती हैं।
  • आत्मनिर्भरता में कमी आना: लंबे समय तक विदेशी सहायता से निर्भरता की संस्कृति को बढ़ावा मिल सकता है, जिससे स्थानीय शासन एवं आर्थिक आत्मनिर्भरता के विकास में बाधा उत्पन्न हो सकती है। यह अफ्रीकी देशों में स्पष्ट है जो खाद्य सहायता पर अत्यधिक निर्भर हैं, जिससे इनके स्थानीय कृषि विकास और आत्मनिर्भरता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
  • भ्रष्टाचार और अक्षमता: विदेशी सहायता में अक्सर भ्रष्टाचार के कारण उचित आवंटन नहीं हो पाता है , जैसा कि सीरियाई शरणार्थी सहायता (जहाँ धन ज़रूरतमंदों तक नहीं पहुँच पाया) के मामले में देखा गया। इसके अतिरिक्त कई सहायता कार्यक्रमों में कुप्रबंधन देखने को मिलता है जिससे इनका समग्र प्रभाव सीमित हो जाता है।
  • शर्तें, दबाव और पारदर्शिता का अभाव: नीतिगत बदलावों से जुड़ी सहायता से प्राप्तकर्त्ता की स्वायत्तता कमज़ोर हो सकती है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) जैसी वित्तीय संस्थाएँ अक्सर ऋण शर्तों के रूप में संरचनात्मक समायोजन नीतियाँ (SAP) लागू करती हैं जिसमें मितव्ययिता, निजीकरण और व्यापार उदारीकरण शामिल हैं, जिससे देश की स्वतंत्र आर्थिक नीतियाँ निर्धारित करने की क्षमता सीमित हो जाती है। 
    • इसके अतिरिक्त अपारदर्शी सौदों में प्राप्तकर्त्ता की आवश्यकताओं की अपेक्षा दाता के हितों को प्राथमिकता दी जा सकती है, जैसा कि चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव में देखा गया है, जिसके कारण कुछ देशों में ऋण की स्थिति उत्पन्न हो गई है।

विदेशी सहायता से संबंधित दार्शनिक दृष्टिकोण क्या हैं?

  • उपयोगितावाद और रॉल्सियन न्याय: दोनों दर्शनों के तहत विदेशी सहायता का समर्थन (यदि इससे समग्र लाभ होता है और वैश्विक असंतुलन कम होता है) किया गया है। उपयोगितावाद में सहायता को उचित ठहराया गया है यदि इससे अधिकतम कल्याण हो, जैसे कि अकालग्रस्त क्षेत्रों में जीवन बचाना। रॉल्सियन न्याय के तहत ऐतिहासिक असमानताओं को दूर करने के नैतिक दायित्व पर बल दिया गया है, जैसे कि औद्योगिक देशों द्वारा पर्यावरणीय क्षति से पीड़ित विकासशील देशों का समर्थन करना।
  • कर्त्तव्यपरायण नैतिकता एवं कांटियन नैतिकता: कर्त्तव्यपरायण नैतिकता का तर्क है कि अमीर देशों का नैतिक कर्त्तव्य है कि वे राजनीतिक हितों की परवाह किये बिना ज़रूरतमंदों की सहायता करें। इसी तरह कांटियन नैतिकता के तहत इस बात पर बल दिया गया है कि सहायता प्राप्त करने वालों की स्वायत्तता का सम्मान किया जाना चाहिये, जिसका अर्थ है कि सशर्त सहायता उचित नहीं है।
  • उदारवाद: उदारवाद के तहत मानव अधिकारों एवं लोकतंत्र जैसे सार्वभौमिक मूल्यों को बढ़ावा देने के क्रम में सहायता का समर्थन किया गया है तथा यह सुनिश्चित करने पर बल दिया गया है कि प्रत्येक व्यक्ति को शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा तक पहुँच प्राप्त हो।
  • यथार्थवाद: यथार्थवादी दृष्टिकोण के तहत विदेशी सहायता को शक्तिशाली देशों द्वारा अपने राष्ट्रीय हितों को पूरा करने हेतु उपयोग किये जाने वाले रणनीतिक उपकरण के रूप में देखा जाता है। उदाहरण के लिये, इजरायल को दी जाने वाली अमेरिकी सहायता को विशुद्ध रूप से मानवीय दृष्टिकोण के बजाय मध्य पूर्व को स्थिर करने एवं भू-राजनीतिक प्रभाव बढ़ाने के संदर्भ में समझा जा सकता है।
  • उत्तर-औपनिवेशिक आलोचना: इसके तहत तर्क दिया गया है कि विदेशी सहायता से अक्सर नव-औपनिवेशिक पदानुक्रम बना रहता है। इसके तहत शक्ति गतिशीलता की आलोचना की गई है जहाँ पश्चिमी गैर सरकारी संगठन तथा सरकारें ग्लोबल साउथ पर नीतियाँ थोपते हैं, जिससे इनकी स्वायत्तता में कमी आती है। उदाहरण के लिये, कई अफ्रीकी देश पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए संरचनात्मक समायोजन को अपनाते हैं जिससे स्थानीय आबादी की ज़रूरतों की तुलना में आर्थिक सुधारों को प्राथमिकता दी जाती है। 

सहायता वितरण में देश नैतिकता को किस प्रकार संतुलित कर सकते हैं?

  • मानवीय प्राथमिकता और दीर्घकालिक लक्ष्य: वैश्विक समुदाय को अकाल, स्वास्थ्य आपात स्थिति तथा प्राकृतिक आपदाओं जैसे संकटों की गंभीरता के आधार पर मानवीय आवश्यकताओं को प्राथमिकता देनी चाहिये। नैतिक सहायता वितरण के तहत दीर्घकालिक विकास पर भी बल देना चाहिये। आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने और विदेशी सहायता पर निर्भरता को कम करने के क्रम में कृषि प्रौद्योगिकी हस्तांतरण जैसी स्थायी पहलों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिये।
  • बहुपक्षीय सहयोग और फ्रेमवर्क: एकतरफा एजेंडा को रोकने तथा न्यायसंगत आवंटन सुनिश्चित करने के क्रम में संयुक्त राष्ट्र या विश्व बैंक जैसे बहुपक्षीय ढाँचों के माध्यम से सहायता वितरित की जानी चाहिये। उदाहरण के लिये, एड्स एवं टीबी हेतु वैश्विक कोष राष्ट्रीय हितों के साथ नैतिक दायित्वों को संरेखित करते हुए वैश्विक स्वास्थ्य चुनौतियों का समाधान करने के क्रम में सहकारी प्रयास का परिचायक है।  
  • पारदर्शिता और जवाबदेही तंत्र: पारदर्शी एवं जवाबदेह सहायता तंत्र यह सुनिश्चित करने के लिये आवश्यक है कि धन का उपयोग प्रभावी और नैतिक रूप से किया जाए। नैतिक सिद्धांतों और राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के साथ संरेखण सुनिश्चित करने के क्रम में दाता और प्राप्तकर्त्ता दोनों देशों को वैश्विक समुदाय के प्रति जवाबदेह ठहराया जाना चाहिये।
  • नैतिक दिशा-निर्देश और स्थानीय भागीदारी: नैतिक मानकों को बनाए रखने के लिये, प्राप्तकर्त्ता के स्वामित्व और नैतिक प्रतिबद्धताओं के साथ संरेखण को सुनिश्चित करने के क्रम में फ्रेमवर्क अपनाया जाना चाहिये। इसके अलावा, सहायता डिज़ाइन प्रक्रिया में स्थानीय ज़मीनी स्तर के संगठनों को शामिल (जैसा कि केरल के विकेंद्रीकृत सहायता मॉडल में देखा गया है) करने से समुदायों को सशक्त बनाया जा सकता है जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि सहायता द्वारा स्थानीय आवश्यकताओं को प्रभावी ढंग से पूरा किया जा सके।

निष्कर्ष

विदेशी सहायता में निस्संदेह विभिन्न समस्याओं का समाधान करने के साथ विकास तथा एकजुटता को बढ़ावा देने की क्षमता है लेकिन राष्ट्रीय हितों के साथ इसका संघर्ष इसकी नैतिक वैधता को जटिल बना देता है। 

मानवीय ज़रूरतों को केंद्र में रखकर, स्थानीय समुदायों को सशक्त बनाकर और पारदर्शी भागीदारी को बढ़ावा देकर, वैश्विक समुदाय इस जटिल परिदृश्य का लाभ उठा सकते हैं। अंततः, विदेशी सहायता के तहत न्याय एवं स्वायत्तता को बढ़ावा देने के साथ रणनीतिक हितों को सुसंगत बनाने का प्रयास करना चाहिये।

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