भारतीय राजनीति
मंत्रियों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
- 14 Jan 2023
- 9 min read
प्रिलिम्स के लिये:सर्वोच्च न्यायालय, मौलिक अधिकार, मंत्रियों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सर्वोच्च न्यायालय मेन्स के लिये:महत्त्वपूर्ण निर्णय, मंत्रियों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता |
चर्चा में क्यों?
हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय की एक संविधान पीठ ने सर्वसम्मति और उचित तरीके से मंत्रियों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर किसी भी अतिरिक्त प्रतिबंध से इनकार कर दिया।
पृष्ठभूमि:
- यह मामला (कौशल किशोर बनाम उत्तर प्रदेश राज्य) 2016 की बुलंदशहर बलात्कार की घटना से संबंधित है, जिसमें राज्य के तत्कालीन मंत्री ने इस घटना को 'राजनीतिक साजिश और कुछ नहीं' करार दिया था।
- सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष पीड़ितों द्वारा एक रिट याचिका दायर की गई थी तथा न्यायालय ने एक महत्त्वपूर्ण सवाल उठाया: "क्या एक सार्वजनिक पदाधिकारी की बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है?"
न्यायालय का निर्णय:
- बहुमत निर्णय:
- उचित प्रतिबंधों पर:
- अन्य नागरिकों की तरह, मंत्रियों को भी अनुच्छेद 19(1)(A) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी दी गई है, जो अनुच्छेद 19(2) में निर्धारित उचित प्रतिबंधों द्वारा शासित है, और वे पर्याप्त हैं।
- क्योंकि "न्यायालय की भूमिका वैध प्रतिबंधों द्वारा सीमित मौलिक अधिकारों की रक्षा करना है, न कि प्रतिबंधों की रक्षा करना और अधिकारों को अवशिष्ट विशेषाधिकार बनाना।"
- सामूहिक उत्तरदायित्त्व पर:
- बहुमत के फैसले ने अपने मंत्रियों द्वारा किये गए गलत निर्णय या घृणित टिप्पणियों के लिये सरकार की परोक्ष ज़िम्मेदारी पर भी एक वैध अंतर किया।
- सामूहिक उत्तरदायित्त्व में धारा का प्रवाह मंत्रिपरिषद से लेकर व्यक्तिगत मंत्रियों तक होता है।
- प्रवाह विपरीत दिशा में नहीं है, अर्थात् व्यक्तिगत मंत्रियों से मंत्रिपरिषद तक।
- सामूहिक उत्तरदायित्त्व के विचार को "लोकसभा अथवा विधानसभा के बाहर किसी मंत्री द्वारा मौखिक रूप से दिये गए प्रत्येक भाषण" पर लागू नहीं किया जा सकता है।
- बहुमत के फैसले ने अपने मंत्रियों द्वारा किये गए गलत निर्णय या घृणित टिप्पणियों के लिये सरकार की परोक्ष ज़िम्मेदारी पर भी एक वैध अंतर किया।
- किसी मंत्री द्वारा दिया गया वक्तव्य:
- न्यायालय ने इस मुद्दे की भी जाँच की कि क्या एक नागरिक के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करने वाले किसी भी मंत्री के भाषण को संवैधानिक अपकृत्य माना जा सकता है।
- संवैधानिक अपकृत्य (Constitutional Tort) एक कानूनी उपकरण है जिसमें राज्य को अपने अभिकर्त्ताओं के कार्यों के लिये वैकल्पिक रूप से जवाबदेह ठहराया जाता है।
- यहाँ तक कि अगर कोई मंत्री ऐसी टिप्पणी करता है जो किसी के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है, इस संबंध में विधिक कार्रवाई तब तक नहीं हो सकती जब तक कि यह वास्तव में किसी की चोट या नुकसान का कारण नहीं बनता है।
- न्यायालय ने इस मुद्दे की भी जाँच की कि क्या एक नागरिक के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करने वाले किसी भी मंत्री के भाषण को संवैधानिक अपकृत्य माना जा सकता है।
- उचित प्रतिबंधों पर:
- असहमतिपूर्ण निर्णय:
- विभाजनकारी सार्वजनिक संवाद के संदर्भ में:
- अल्पमत निर्णय में विभाजनकारी सार्वजनिक संवाद पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा गया है कि "घृणास्पद भाषण (Hate Speech) के तहत चाहे कुछ भी कहा गया हो, वह लोगों की गरिमा के प्रतिकूल है"।
- यह सार्वजनिक अधिकारियों और अन्य प्रभावशाली लोगों द्वारा ज़िम्मेदारीपूर्वक और संयमित शब्दों के माध्यम से संवाद करने से संबंधित विशिष्ट उत्तरदायित्त्व का उल्लेख करता है।
- सामूहिक उत्तरदायित्त्व के संबंध में:
- यदि कोई मंत्री सरकार के दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्त्व करता है और यह समसामयिक मामलों के लिये प्रासंगिक है, तो सरकार को वैकल्पिक रूप से उत्तरदायी माना जा सकता है।
- इस तरह के बयान के लिये स्वयं मंत्री ज़िम्मेदार होता है यदि यह सरकार की विचारधारा के विपरीत है।
- मंत्री का व्यक्तिगत वक्तव्य:
- यह विचार है कि उन कृत्यों और चूकों को परिभाषित करने के लिये एक उचित कानूनी ढाँचा होना चाहिये जो 'संवैधानिक अपराध' के बराबर होते हैं।
- विभाजनकारी सार्वजनिक संवाद के संदर्भ में:
अनुच्छेद 19:
- भारत के संविधान का अनुच्छेद 19 भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी देता है तथा आमतौर पर राज्य के खिलाफ लागू किया जाता है।
- 1949 में भारत के संविधान के अनुच्छेद 19(1) में सभी नागरिकों को अधिकार होगा
(a) भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का।
(b) शांतिपूर्वक और बिना हथियारों के इकट्ठा होना।
(c) संघ या समिति का गठन करना।
(d) पूरे भारत राज्यक्षेत्र में स्वतंत्र रूप से आवागमन करना।
(e) भारत के राज्यक्षेत्र के किसी भी हिस्से में निवास करना और बसना।
(f) निरसित (Ommited)
(g) किसी भी पेशे या व्यवसाय को अपनाना।
- 1949 में भारत के संविधान के अनुच्छेद 19(1) में सभी नागरिकों को अधिकार होगा
- भारतीय संविधान 1949 में अनुच्छेद 19 (2),
- खंड (1) के उपखंड (a) में दी गई स्वतंत्रता किसी भी मौजूदा कानून के संचालन को प्रभावित नहीं करेगी, या राज्य को कोई कानून बनाने से नहीं रोकेगी, जब तक कि ऐसा कानून भारत की संप्रभुता और अखंडता के हितों में उक्त उपखंड द्वारा प्रदत्त अधिकार के प्रयोग पर राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध, सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता या अदालत की अवमानना, मानहानि या किसी अपराध के लिये उकसाने के संबंध में उचित प्रतिबंध लगाता हो।
आगे की राह
- नफरत और हिंसा भड़काने वाले या दूसरों की स्वतंत्रता को प्रतिबंधित करने वाले वाक् से निपटने के लिये कानून में पर्याप्त प्रावधान हैं।
- घृणा वाक् पर कार्रवाई करने के लिये सरकारों की राजनीतिक इच्छाशक्ति और राजनीतिक संकल्प की कमी, विशेष रूप से जब इसमें उनका अपना कोई हित हो, प्रमुख समस्या है तथा इसे दूर करने के लिये कोई कानूनी प्रावधान नहीं हैं।
- सरकार उन्हीं कानूनी प्रावधानों को साधन बना सकती है जो असहमत नागरिकों के खिलाफ घृणास्पद वाक् को रोकने के लिये बनाए गए हैं।
- संसद के सुचारु कामकाज़ के लिये सदस्यों को संसदीय विशेषाधिकार प्रदान किये जाते हैं लेकिन ये अधिकार हमेशा मौलिक अधिकारों के अनुरूप होने चाहिये क्योंकि ये हमारे प्रतिनिधि हैं और हमारे कल्याण के लिये काम करते हैं।
- यदि विशेषाधिकार मौलिक अधिकारों के अनुरूप नहीं होंगे, तो नागरिकों के अधिकारों की रक्षा का लोकतंत्र का सार ही खो जाएगा।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्नप्रश्न: आप वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ की संकल्पना से क्या समझते हैं? क्या इसकी परिधि में घृणा वाक् भी आता है? भारत में फिल्में अभिव्यक्ति के अन्य रूपों से तनिक भिन्न स्तर पर क्यों हैं? चर्चा कीजिये। (मुख्य परीक्षा, 2014) |